भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 629, कुल 984 में से

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पृष्ठ 629

राजतरंगिणी ४६७ स तं दिव्यस्तदाऽवादीन्मां त्वं सत्त्ववशीकृतम् । विद्धि मध्यमलोकेन्दो वरुणं करुणानिधे ॥ ५३ ॥ ५३. उस समय उस दिव्य (व्यक्ति) ने उससे कहा—'हे मध्यमलोकेन्दु ! करुणानिधे ! ! तुम मुझे सत्त्व वशीकृत वरुण' जानो। यदेतत्त्वामुपास्तेऽद्य छत्रं तन्मत्पुरात्पुरा । महाबलोऽहरद्भौमः पुराणश्वशुरस्तव ॥ ५४ ॥ ५४. 'आज यह जो छत्र तुम्हारी सेवा में है, उसे पहले मेरे नगर से तुम्हारे पुराण श्वशुर महाबली भीम' ने अपहृत कर लिया था। रसातलेकतिलकं माहात्म्यवदिदं विना । उपद्रवाः प्राणहराः पौराणां नः पदे पदे ॥ ५५ ॥ ५५. 'रसातल' का एक मात्र तिलक माहात्म्यशाली इस (छत्र) के विना मेरे पुरवासियों के पद-पद पर प्राणहारी उपद्रव होते हैं। श्लोक संख्या ५३ में 'त्वं' का पाठभेद 'स्वा' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ५३ ( १ ) वरुण : पाद टिप्पणी 'वरुण' रा० त० २।५८ द्रष्टव्य है। वरुण सूर्य के नव ग्रहों में एक ग्रह भी है। यह बहुत बड़ा पिण्ड है। अत्यन्त दूरस्थ होने के कारण दूरदर्शी के बिना नहीं देखा जा सकता था। सन् १८४६ में प्रथम बार दूरदर्शी द्वारा इसकी वास्तविक स्थिति ज्ञात हुई थी। किन्तु अविष्कार बहुत पूर्व ही विना दूर- दर्शी के हो चुका था। भारतीयों को इसका ज्ञान सुदूर पूर्व काल से था। वरुण का व्यास लगभग ३३,००० मील है। सूर्य से २७९ करोड़ मील पर स्थित है। यह साड़े तीन मील प्रति सेकण्ड घसकर १६५ वर्षों में सूर्य की परिक्रमा करता है। नेपचून शब्द के लिये वरुण शब्द का प्रयोग किया गया है। शतपथ ब्राह्मण में कूर्म को वरुण का सहायक माना गया है। (७.५.१.९) नीलमत पुराण में वरुण को मरुत ( 619, ), आदित्य (607) तथा, जलदेवता ( 384 ) के रूप में चित्रित किया गया है। उसका सम्बन्ध नरक से भी जोड़ा गया है। ( 1381 ) "जलाधिपेन शातस्य नरके पतनं कृत." इसी पुराण के अनुसार वरुण तीर्थ की बलि तथा प्रतिमा की स्थापना पुलहस्त्य ने की थी। ( 1004 —1006 ) कार्तिक पूर्णिमा को वरुण पूजा का भी उल्लेख नीलमत पुराण में मिलता है। ( 435— 437 ) वरुण पंचमी की विशेष रूप से पूजा कश्मीर में होती थी। ( 755 ) वरुण यात्रा उत्सव का विधान भी नीलमत पुराण में अन्य यात्रोत्सव के साथ रखा गया है। ( 804-865 ) नीलमत वरुणलोक का भी उल्लेख करता है। ५४ ( १ ) भौम : इस दैत्य का दूसरा नाम 'नरक' है। उसे 'नरकासुर' भी कहते हैं। ५५ ( १ ) रसातल : सप्त अधोलोकों में से एक लोक है। पाताल के पाँच लोक यथा-अधोभुवन पाताल, बलि सद्मन, रसातल तथा नागलोक हैं।

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