भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 630, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 630

तृतीय तरंग ४७९ तदिदं प्राप्तुकामेन त्वदौदार्यं परीक्षितुम् । कारुण्यमय मायेयं निर्मायि मयेदृशी ॥ ५६ ॥ ५६. 'हे करुणामय ! ! इसे (छत्र) प्राप्त करने की इच्छा से तुम्हारे औदार्य की परीक्षा हेतु, इस प्रकार की यह माया निर्मित की। त्वदादिर्यो व्यधाज्जन्तून्व्यसून्वसुकुलात्मजः । प्रायश्चित्तममारेण चरसीव तदेनसः ॥ ५७ ॥ ५७. 'तुम्हारे पूर्ववर्ती वसुकुलात्मज' जिसने प्राणियों का वध किया था, उसके पाप का इस अहिंसा द्वारा (अब) प्रायश्चित्त कर रहे हैं। भयस्पृहाजनकयोर्धरणीधारणोचिते । शेषदेहे विषोद्गारफणारत्नौघयोरिव ॥ ५८ ॥ ५८. 'धरणी धारण हेतु शेष शरीर में जैसे क्रमशः भय एवं अभिलाष (स्पृहा) उत्पन्न कारक विषोद्गार तथा फणरत्न समूह रहते हैं। सुभाषित रत्नाकर में इसका अर्थ पृथ्वी किया गया है। रसातल शब्द साधारणतया नरक के लिये प्रयुक्त होता है। प्राग्ज्योतिष तथा वरुण लोक रसातल नहीं है। पाठभेद : श्लोक संख्या ५६ में 'कारुण्यमय' का पाठभेद 'करुणामय' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ५७ (१) वसुकुलात्मज : कल्हण मेघ- वाहन को मिहिरकुल का वंशज यहाँ बताता है। द्रष्टव्य है रा. त. १:२८८-३२५ पृष्ठ २१२-३३३ । दक्ष कन्या एवं धर्म की पत्नी का नाम वसु था। उससे आठ वसु हैं। उन्हें अष्ट वसु कहा जाता है। हरिवंश, स्कन्द एवं विष्णु पुराणों में इनका नाम—धर, ध्रुव, सोम, अप, अनल, अनिल प्रत्यूष तथा प्रभास हैं। नीलमत पुराण भी आठ वसुओं की तालिका देता है। उससे यह तालिका मिलती है । (603) नीलमत नव संवत्सर अर्थात् चैत्र शुक्ल एक को वसुपूजा का माहात्म्य उपस्थित करता है। भागवत में उनका नाम—द्रोण, प्राण, ध्रुव, अर्क, अग्नि, दोष, वसु तथा विभावसु दिया गया है। महाभारत में 'अप्' के स्थान में 'अहः' तथा शिव पुराण में 'अयज' नाम दिया गया है। अष्ट वसुओं के नायक अग्नि हैं। ऋग्वेद में वसु गण पृथ्वी निवासी देवता है। वसु नाम के अनेक वैदिक एवं पौराणिक देवताओं का उल्लेख मिलता है। पाठभेद : श्लोक संख्या ५८ में 'पारणांचिते' का पाठ भेद 'धरणोचिते' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ५८ (१) चकलम् : कतिपय अनुवादकों ने श्लोक संख्या ५८-६१ श्लोकों का अनुवाद एक साथ चार श्लोकों को 'चवस्कलम्' चारपद का मान कर किया है। यहाँ अनुवाद प्रत्येक श्लोक का अलग-अलग दिया गया है। निस्सन्देह कुछ प्रति में चवक्कलम होने का निर्देश किया गया है।

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास) · पृष्ठ 630, कुल 984 में से · BharatKosha