राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजतरंगिणी ४७८ तमःप्रकाशावहयोस्तेजःक्रान्तदिगन्तरे । उपर्बुधे धूमजालज्वालापल्लवयोरिव ॥ ५६ ॥ ५९. 'तेज से दिगन्तरव्यापी अग्नि में जैसे अन्धकार तथा प्रकाशप्रद धूम पुञ्ज एवं ज्वाला पल्लव रहते हैं। क्रमाप्यायक्रियाभाजो रुद्धतेजस्विमण्डले । प्रावृट्पयोदच्छन्नेऽह्नि संतापासारयोरिव ॥ ६० ॥ ६०. आवृत रवि मण्डल एवं प्रावृट् पयोद से आच्छन्न दिन में जैसे क्रम (खेद और शान्तिदायी सन्ताप तथा वृष्टि होते हैं— द्वयोरालोकितं चित्रं जन्मैकस्मिन्महाकुले । तस्य त्रिकोटिहन्तुश्च तवाऽहिंस्रस्य च प्रभोः ॥ ६१ ॥ ६१. 'उसी तरह एक ही महाकुल में त्रिकोटिहन्ता१ (मिहिर कुल) उसका एवं अहिंसक प्रभु आप दोनों का विचित्र जन्म देखा।' नम्रः सम्राडथैवं स वदतो यादसां प्रभोः । चकार पूजां स्तोत्रेण छत्रेण च कृताञ्जलिः ॥ ६२ ॥ ६२. यादस् पति (वरुण)१ के इस प्रकार कहने पर, विनम्र उस सम्राट् ने अंजलि-बद्ध होकर, स्तोत्र एवं छत्र से उनकी पूजा की। तं च स प्रतिगृह्णन्तं प्रणयादुष्णवारणम् । जगाद गुणिनामग्र्यो वरुणं धरणीधवः ॥ ६३ ॥ ६३. सप्रणय छत्र ग्रहण करते वरुण से गुणियों में अग्रणी धरणीपति ने कहा—
पाठभेदः श्लोक संख्या ५९ में 'क्रान्त' का पाठभेद 'समावृत' मिलता है। श्लोक संख्या ६१ में 'हन्तुश्च' का 'हर्तृश्च' 'हन्तुंश्च' तथा 'अहिंस्र' का पाठभेद 'अहिंस्र' मिलता है। श्लोक में 'चतुर्भिः 'कुलकम्' किंवा 'चवक्लकम्' जोडने का सुझाव दिया गया है।
पादटिप्पणियाँ : ६१ ( १ ) त्रिकोटिहन : कल्हण ने मिहिर-कुल के लिये त्रिकोटिहन्ता एवं त्रिकोटिहन शब्द का उल्लेख रा. त. १:३१०, ३२२ तथा ८:३४१५ में किया है। पाठभेद : श्लोक संख्या ६२ में 'प्रभोः' का पाठभेद 'परः' मिलता है।