राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ४५९ कल्पद्रुमाश्च सन्तश्च नार्हन्ति समशीर्षिकाम् । अर्थिनां प्रार्थिताः पूर्वे फलन्त्यन्ये स्वयं यतः¹ ॥ ६४ ॥ ६४. “कल्पद्रुम एवं सन्त सम कोटि में होने योग्य नही । क्योकि प्रथम ( कल्पद्रुम ) आकांक्षी के प्रार्थना करने पर तथा अन्य ( सन्त ) स्वतः फल देते हैं । अत्रालम्बिष्यत छत्रं कथं नः पुण्यपण्यताम् । तत्रार्थयिष्यत न चेदार्तोपकृतये भवान् ॥ ६५ ॥ ६५. "छत्र हमारे पुण्य पण्यता को कैसे प्राप्त करता, यदि आप आर्त के उपकार हेतु न प्रार्थित होते ।” वदान्यः संविभागेभ्यः पूर्णं कुर्यादनुग्रहम् । छाययाऽऽप्याययन्दद्यात्फलान्यपि महीरुहः¹ ॥ ६६ ॥ ६६. वदान्य² संविभाग ( दान ) पूर्वक अनुग्रह पूर्ण करता है, क्योंकि महीरुह ( वृक्ष ) छाया द्वारा सन्तुष्ट करता हुआ, फल प्रदान करता है । तदेवं विहितोदात्तसंभागाभिचोदितः । जनोऽयं भगवन्किञ्चिद्वरं प्रार्थयतेऽपरम् ॥ ६७ ॥ ६७. 'भगवन् ! आपके इस प्रकार के उदात्त व्यवहार से प्रोत्साहित, यह जन एक अन्य वर की प्रार्थना करता है । पादटिप्पणियाँ : 'भागेभ्यः' का 'भागेभ्यः' तथा 'वदण्यत्' का ६४(१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का पाठभेद 'दध्यात्' मिलता है । ५८ वाँ श्लोक है । पादटिप्पणियाँ : ६६ (१) राज तरंगिणी सूक्ति संग्रह का मेघवाहन वरुण को प्रार्थना आरम्भ ५९ वां श्लोक है । करता है । सम शीर्षिकाम् शब्द का यहाँ कल्हण ने प्रयोग किया है । सम का अर्थ समान ( २ ) वदान्य : सबको दान देने के लिये जो तथा शीर्ष का अर्थ शिर होता है । इसका शाब्दिक कहता है, उसे वदान्य कहते हैं । अर्थ सन्तुलित मस्तिष्क लगाया जा सकता है । इस पाठभेद : शब्द का उल्लेख पुनः कल्हण ने ३:१३५ में श्लोक संख्या ६७ में 'तदेवं' का 'तदेव' और किया है । 'अपरम्' का पाठभेद 'परम्' मिलता है । पाठभेद : पादटिप्पणियाँ श्लोक संख्या ६५ में 'न' का पाठभेद 'न' ६७ (१) वर : वरुण के द्वारा छत्र स्वीकार मिलता है । कर लेने पर उत्साहित होकर, अपने उपकार का प्रत्युपकार पाने की अभिलाषा,-से राजा वर की श्लोक संख्या ६६ में 'वदान्य' का 'वदन्यः' आकाँक्षा करता है ।