भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 633

४८० राजतरंगिणी वशीकृतेयं पृथिवी कृत्स्ना भवदनुग्रहात् । जेतुं द्विपान्कथ्यतां तु युक्तिः पाथोघिलङ्घने ॥ ६८ ॥ ६८. 'आपकी कृपा से मैंने समस्त पृथिवी को वशीकृत किया है। (अब) द्वीपों को जीतने के लिये, समुद्र लंघन हेतु कोई उपाय बतायें'। इत्यर्थ्यमानोऽकथयद्भूमिपालं जलेश्वरः । तितीर्षौ भवति स्तम्भं नीयतेऽम्भो मयाऽम्बुधेः ॥ ६९ ॥ ६९. इस प्रकार भूमिपाल के प्रार्थना करने पर जलेश्वर ने कहा, —"जब आप समुद्र पार करने की इच्छा करेंगे तो मैं जल स्तम्भित कर दूंगा।" ततो महान्प्रसादोऽयमित्युक्ते पृथिवीभुजा । तिरोबभूव भगवान्वरुणः सोष्णवारणः ॥ ७० ॥ ७०. तदुपरान्त राजा के 'आपका यह महान् प्रसाद है'—यह कहने पर, भगवान् वरुण छत्र सहित तिरोहित हो गये । अन्येद्युर्विस्मयस्मेरैर्बलैः सीमन्तयञ्जलम् । प्रभावस्तम्भितक्षोभं प्रोत्ततार स वारिधिम् ॥ ७१ ॥ ७१. दूसरे दिन (वरुण के) प्रभाव से जल स्तम्भित हो गया। तब उसने जल को 'सीमन्तित' करते हुए, विस्मित तथा सम्मित सैनिकों के साथ समुद्र पार किया। गुणरत्नाकरः शैलं स रत्नाकरशेखरम् । नानारत्नाकरं सैन्यैरारुरोहाऽथ रोहणम् ॥ ७२ ॥ लंका विजय— ७२. गुणरत्नाकर उसने ससैन्य, नाना रत्नों की खान एवं रत्ननिधियों का शेखर रोहण पर्वत पर आरोहण किया । पाठभेद : श्लोक संख्या ६९ में 'तितीर्षौ' का पाठभेद 'तितीर्षोः' मिलता है। श्लोक संख्या ७१ में 'क्षोभं' का पाठभेद 'जलं' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ७१( १ ) सीमन्तित : कल्हण की उपमा यहाँ अनुपम है सीमन्त का अर्थ माँग होना है। शिर पर बाल काले होते हैं। भूरे होते हैं। माँग काढ़ने पर बाल दोनो ओर घूमते हट जाते हैं। मध्य में सीधी पवित्र ललाट से उठती पीछे चली जाती है। सीमन्त अर्थात् माँग के मध्य का भाग त्वचा वर्ण के अनुसार उज्ज्वल किंवा भूरा लगता है । दोनो ओर जल हट जाने पर सीमन्त के समान दिखायी पड़ा होगा । जल उछल कर दोनों ओर हो जाएगा । सीमन्त तुल्य रेखा बन जाएगी । इसी प्रकार बाल मस्तक त्वचा से उठकर दोनों ओर गिर कर बालों से मिल जाता है । जल का तल नीला होता है । बाल का रंग काला उसके वर्ण के निकट होता है । ७२ ( १ ) रत्नाकर शब्द पर यहाँ जोर दिया गया है। रत्नाकर समुद्र को कहा जाता है। कल्हण ने यहाँ राजा के लिये गुणरत्नाकर विशेषण का प्रयोग कर उसे रत्न के साथ गुणों से भी विभूषित किया है। ( २ ) रोहण : श्रीलंका के पर्वत 'आदमस्

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