भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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तृतीय तरंग ४८१ तत्र , तालीतरुवनच्छायाध्यामितसैनिकम् । प्रीत्या लङ्काधिराजस्तमुपतस्थे विभीषणः ॥ ७३ ॥ ७३. जब कि उसके सैनिक वहाँ ताल वृक्ष वनच्छाया में बैठे थे, लंकाधिपति १विभीषण प्रेम पूर्वक उसके पास आया । समागमः स शुशुभे नरराक्षसराजयोः । वन्दिनादाश्रुतान्योन्यप्रथमालापसंभ्रमः ॥ ७४ ॥ ७४. नर एवं राक्षसराज का यह समागम सुशोभित हुआ । किन्तु वन्दिगणों के नाद से उनका परस्पर उद्वेग पूर्ण (प्रथम) संलाप सुनायी नहीं पड़ा । अथ रक्षःपतिर्लङ्कां नीत्वाऽलंकरणं चितेः । अमर्त्यसुलभाभिस्तं विभूतिभिरुपाचरत् ॥ ७५ ॥ ७५. राक्षसपति पृथ्वीभूषण (मेघवाहन) को लेकर लंका गया । वहाँ अमर्त्य सुलभ विभूतियों से उसका उपचार किया । यदासीत्पिशिताशा इत्यन्वर्थं नाम रक्षसाम् । तदा तदाज्ञाग्रहणे प्राप तद्रूढिशब्दताम् ॥ ७६ ॥ ७६. राक्षसों का 'पिशिताश' (मांसभक्षी) नाम चरितार्थ था, परन्तु (उसकी) आज्ञा ग्रहण करने पर, वह शब्द रूढ हो गया । कीट' अथवा श्रीपाद पर्वत का नाम है। द्रष्टव्य है पाद टिप्पणियां तरंग १:२९४ तथा २९९ आदम पीक को ही रामायण वर्णित सुवेलाद्रि कुछ लोग मानते हैं। आदम पीक को रहु अथवा रहून मुसलमान लोग कहते हैं। रोहण का अर्थ ही चढ़ना अथवा आरोहण करना होता है। रोहण अथवा आरोह सीढ़ियो तथा आदम पर्वत की लोह शृंखला को पकड़ कर किया जाता है। श्रीपाद पर्वत शिखर ७३६० फीट तथा पिदुरु तलागल शिखर ८२९६ फीट ऊँची है। पूर्व काल में श्रीपाद पर्वत ही सबसे ऊँचा माना जाता था। परन्तु आधुनिक ऊँचाई माप साधन मे श्रीपाद कम ऊँचा श्री लंका में ठहरा है। उससे भी ऊँची चोटी किरिगिल पोत की है। यह ७८५७ फीट है इन्हीं तीन शिखरो ६१ के कारण श्री तुलसीदास ने रामायण में लिखा है—'गिरि त्रिकूट पर बस जहँ लंका। ७३ (१) विभीषण : लंका में विभीषण को भक्त रूप में चित्रित किया गया है न कि राक्षसेन्द्र रावण भ्राता रूप में राक्षस । राम ने लंका का राज्य विभीषण को दिया था। विभीषण चिरंजीवी माना जाता है। एकमत उसे अब तक लंका का राजा मानता है। मैं समझता हूँ। कालान्तर में 'विभीषण' शब्द लंका के राजा का पद वाचक हो गया था। पाठभेद : श्लोक संख्या ७६ में 'प्राप' का पाठभेद 'प्रावि' मिलता है।