भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 635

४८२ राजतरंगिणी स्वशिरःप्रतिच्छन्दैः स्थिरप्रणतिसूचकैः । सनाथशिखरान्प्रादात्तस्मै रक्षःपतिर्ध्वजान् ॥ ७७ ॥ ७७. राक्षसपति ने उसे स्थिर प्रणय सूचक राक्षस शिर की आकृतियों से युक्त शिखर वाले ध्वजाओं को दिया । पाराद्वारिनिधेः प्राप्ताः कश्मीरेष्वधुनापि ये । राज्ञां यात्रासु निर्यान्ति ख्याताः पारध्वजाः पुरः ॥ ७८ ॥ ७८. वारिनिधि पार से प्राप्त वे ख्यात 'पारध्वज' कश्मीर में आज भी राज- यात्राओं में निकाले जाते हैं। इत्थंमाराक्षसकुलं प्राणहिंसां निषिध्य सः । स्वमण्डलं प्रति कृती न्यवर्त्तत नराधिपः ॥ ७९ ॥ ७९. इस प्रकार समस्त राक्षस कुल में प्राण हिंसा निषिद्ध करके वह कृती राजा स्वमण्डल को लौटा। ततःप्रभृति तस्याज्ञा मार्वभौमस्य भूपतेः । हिंसाविरतिरूपा सा न कैश्चिददलङ्घ्यत ॥ ८० ॥ ८०. तब से लेकर इस सार्वभौम राजा की उस हिंसा विरति आज्ञा का किसी ने उल्लंघन नहीं किया । क्षुद्रैरुद्रादिभिर्नाप्सु सिहार्थैर्गहने न च । न श्येनप्रमुखैर्व्योम्नि तद्राज्ये जन्तवो हताः ॥ ८१ ॥ ८१. उसके राज्य में क्षुद्र जल मार्जारादि जल में, सिंहादि वन में, श्येनादि आकाश में, जीव हत्या नहीं करते थे ।

श्लोक संख्या ७८ में 'कश्मीरे' का पाठभेद 'काश्मीरे' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ७८ (१) पारध्वज : विजय में प्राप्त शत्रुओं के ध्वजो को विजय यात्रा किंवा उत्सवों पर जलूस में निकाला जाता है। यह प्रायः रोम सम्राट् के प्रदर्शनी तथा यूरोप में भी प्रचलित रहा है। कश्मीर में भी इस प्रकार की शोभा यात्रा प्रचलित रही होगी। कल्हण के समय तक यह निकाले जाते थे और लंका विजय की स्मृति हरी करके कश्मीर के सैनिकों का मस्तक गौरव से ऊँचा करते थे। इस पारध्वज का पुनः कहीं उल्लेख नही मिलता। पाठभेद : श्लोक संख्या ८१ में 'रुद्रा' का पाठभेद 'रुध्रा' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ८१ (१) उद्र : उद्र किस प्रकार का जलीय जन्तु था कहना कठिन है। अंग्रेजी अनुवादको ने उसका अनुवाद 'ओट्टर' अर्थात् ऊदबिलाव किंवा जलमार्जार किया है।