भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 640, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 640

तृतीय तरंग ४८७ अथ क्ष्माभृदरक्षत् क्ष्मां श्रेष्ठसेनस्तदात्मजः । प्राहुः प्रवरसेनं यं तुञ्जीनं चाञ्जसा जनाः ॥ ९७ ॥ श्रेष्ठसेन ( प्रवरसेन प्रथम तुञ्जीन द्वितीय ) ९७. अथ ( अनन्तर ) उसके पुत्र राजा श्रेष्ठसेन ने पृथ्वी की रक्षा की जिसे लोग प्रवरसेन एवं तुंजीन कहते हैं। अपने में, प्रजा में, तपस्वी में तथा विरोधी प्रवृत्ति वालो के मध्य भेद पाटने का स्तुत्य प्रयास सर्वदा किया । और उसमें सफल रहा । अशोक ने भेरी घोष के स्थान पर धर्म घोष किया था। प्रजातुरक्त मेघवाहन ने अहिंसा को सार्वजनिक रूप देने के लिए, दिग्विजय की कल्पना की । दिग्विजय द्वारा उसने अहिंसा को व्यापक बनाने का प्रयास किया । उसकी दिग्विजय यात्रा में उसके विचारों को जिसने स्वीकार किया उसे उसने उनके राज्य तथा शक्ति से च्युत नहीं किया । उसने व्यर्थ हिंसा का आश्रय नहीं लिया । उसका चरित्र निखर उठता है। कल्हण ने उसे इस प्रकार चित्रित किया है कि वह अपने पवित्र व्यक्तिगत व्यवहार, विचारों के कारण भारतवर्ष के नृपतियों की श्रेणी में अशोक से भी ऊँचा स्थान पाने का पात्र है। किसी मत-मतान्तर का खण्डन किंवा मण्डन न कर उसने एक सरल, सीधा, मर्यादित पथ का अनुकरण किया । वह पथ निराला था । अनुपम था । शान्त था । उसका आशय प्रिय था । वह राज मद से दूर था । परन्तु वह जानता था । राज्य की शक्ति सेना भी है। उस सैनिक शक्ति को शिथिल होने नहीं दिया। उस शक्ति को मजबूत बना कर उसका प्रयोग अत्यन्त उत्तम उदात्त अहिंसा सिद्धान्त को क्रियात्मक रूप देने का प्रयास किया। अहिंसा के कारण कसाइयों किंवा पशु हरण पर जीवित रहने वालों को बेकारी का अनुभव कर उनको जीविका का भी प्रबन्ध किया। वह दूरदर्शी, व्यावहारिक एवं प्रजाप्रिय राजा था। उसने भगवान् बुद्ध के उपदेशों को अपने व्यक्तिगत चरित्र, त्याग, तपस्या एवं राज्य की सैनिक शक्ति से भारत में प्रचारित किया । उपदेश एवं सिद्धान्त को मानसिक स्तर से उतार कर जीवन दर्शन में उतारा । पाठभेद : श्लोक संख्या ९७ में 'प्राहुः' का पाठभेद 'आहुः' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ९७ (१) श्री विल्सन अभिषेक काल सन् ५७ ई० ९ मास तथा राज्य काल सन् ३० वर्ष २ मास देते हैं । श्री एस. पी. पण्डित यह समय सन् ८८ ई० तथा राज्य काल ३० वर्ष देते हैं । श्री स्टीन अभिषेक काल लौकिक संवत् ३१३२ तथा राज्य काल ३० वर्ष देते हैं । श्री वाली यह समय सप्तर्षि संवत् ४००९ तथा सन् २३९ ई० देते हैं। कलि गताब्द ३१८४ वर्ष ४ मास आता है। ड्रायर यह समय सन् ५८ वर्ष ६ मास देते हैं। कनिंघम के मत से यह काल सन् ४०० ई० होना चाहिए । आइने अकबरी ने 'सरेशमेन' नाम दिया है । बिदउद्दीन श्रेष्ठसेन की गाथा में बहुत कुछ परिवर्धन करता है। उसका कहना है कि राजा ने खोट के साथ राजसिंहासन पर अपनी माता को बैठा दिया। उसने अपने साम्राज्य की सीमा खतई, चीन तथा मचोन तक फैला ली, बिदउद्दीन कोई प्रमाण उपस्थित नहीं करता कि उसने इस घटना का वर्णन कहाँ से प्राप्त किया है। यह गलत है। हसन कहता है-संवत् विक्रमी ६८ में राजा श्रेष्ठसेन बाप के इन्तकाल के बाद तख्त नशीन हुआ। मुल्क की रस्म जब्त्त और अदल व इन्साफ काम लेने में हद से ज्यादा कोशिश की। मातृ चक्र