भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 639, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 639

४८६ राजतरंगिणी इति संचिन्त्य सुचिरं देहदानोद्यतो नृपः । श्वः प्रियं तव कर्ताऽस्मीत्युक्त्वा विप्रं व्यसर्जयत् ॥ ९२ ॥ ९२. देह दान के लिये उद्यत नृप ने चिरकाल तक इस प्रकार सोचा। "कल मैं तुम्हारा प्रिय (कार्य) करूँगा"- ऐसा कहकर विप्र को विसर्जित किया। क्षपायां क्ष्मापतिमथ स्वमुपाहर्तुमुद्यतम् । निषिध्य दुर्गा व्यधित प्रकृतिस्थं द्विजन्मजम् ॥ ९३ ॥ ९३. रात्रि में दुर्गा ने अपने को उपहार करने हेतु उद्यत नृपति को निषिद्ध कर, द्विज पुत्र को प्रकृतिस्थ (नीरोग) कर दिया। इत्याद्यद्यतनस्यापि चरितं तस्य भूपतेः । पृथग्जनेष्वसंभाव्यं वर्णयन्तस्त्रपामहे ॥ ९४ ॥ ९४. अन्य लोगों में असम्भव, उस विगत भूपति के चरित का वर्णन करते, हम लज्जित हो रहे हैं। अथवा रचनानिर्विशेषमार्गेण वर्त्मना । प्रस्थिता नानुरुन्धन्ति श्रोतृचित्तानुवर्तनम् ॥ ९५ ॥ ९५. अथवा आर्ष मार्ग से प्रस्थित रचना में निर्विशेष श्रोता के चित्तानुवर्तन का अनुरोध नहीं करते हैं। तस्मिंस्तं गते भुक्त्वा क्ष्मा चतुस्त्रिंशतं समाः । अनादित्यमिवाऽशेषं निरालोकमभूज्जगत् ॥ ९६ ॥ ९६. पृथ्वी का चातीस वर्ष भोग करने के पश्चात्, राजा के अस्त हो जाने पर, सम्पूर्ण जगत् बिना सूर्य के प्रकाश रहित जैसा हो गया। पादटिप्पणियाँ : बात उठाकर अपने काव्य को पवित्र कहने का ९५ (१) आर्ष. श्री रणजीत सीताराम पण्डित प्रयास करता है । श्लोक ९४ तथा ९५ पर टिप्पणी करते अपना मत ९६ (१) मूल्यांकन : मेघवाहन शान्त शासक प्रकट करते हैं कि कल्हण ने अपने समय के पाठकों था। वह तपस्वी था। योगी था। महान् आत्मा के मनोभाव को परख लिया था। वे रहस्यमय तथा था। आध्यात्मिक प्राणी या। तथापि वह शक्ति- काव्यमय गाथा को बिना उसका उपहास किये शाली राजा था। चतुर शासक था। आदर्श राज्य सुनने के लिये तैयार नहीं थे। अतएव कल्हण ने की उसने कल्पना की। उसने राज्य का आधार यहाँ स्वयं स्पष्टीकरण किया है। वह यही स्पष्टीकरण शक्ति तथा दण्डनीति की अपेक्षा प्रेम एवं मन करता है कि उसने प्राचीन काव्यपरम्परा का परिवर्तन (र महात्मा गान्धी की तरह विश्वास निर्वाह तथा अनुसरण किया है। कल्हण यहाँ पर किया। उसने मनुष्य को कृतघ्न, क्रूर, आततायी, आर्ष शब्द का प्रयोग कर ऋषिकृत, प्रयुक्त एवं निर्भय प्राणी नहीं माना। उसने मनुष्य में मानवता वैदिक परम्परा क्रिया मार्ग के अनुकरण करने की देखने का प्रयास किया और उसे पाया। उसने