भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 638

तृतीय तरंग ४८५ इति ब्रुवति साक्षेपं शोकरूक्षाक्षरं द्विजे। आपन्नार्तिहरो राजा चिरमेवं व्यचिन्तयत् ॥ ८७ ॥ ८७. इस प्रकार द्विज के आक्षेप पूर्वक शोक से कटु भाषण करने पर, दुःखियों के दुःख का हरण कर्ता (परार्तिहर) राजा चिरात् इस प्रकार सोचा— न वध्याः प्राणिन इति प्राङ्मया समयः कृतः । विप्रार्थमपि किं कुर्यां संप्रतिज्ञातविप्लवम् ॥ ८८ ॥ ८८. “प्राणी वध्य नहीं हैं।” पूर्व में मैंने ऐसा प्रण किया है, अब क्या विप्र के लिये भी मैं प्रतिज्ञा भंग करूँ। निमित्तीकृत्य मामद्य विपद्येत द्विजो यदि । तत्राऽप्यत्यन्तपापीयानर्थः संकल्पविप्लवः ॥ ८९ ॥ ८९. मुझे निमित्त बनाकर, यदि द्विज मृत हो गया, तो यहाँ भी अत्यन्त पापभय संकल्प विप्लव होगा। नैति मे संशयभ्रान्तमेकपक्षावलम्बनम् । संभेदावर्तपतितं प्रसूनमिव मानसम् ॥ ९० ॥ ९०. ‘संशय भ्रान्त मेरा मन उसी प्रकार किसी एक पक्ष का अवलम्बन नहीं कर पा रहा है, जैसे संगम के आवर्त में पतित कुसुम । तत्स्वदेहोपहारेण दुर्गां तोषयता मया । प्रतिज्ञया समं न्याय्यं रक्षितुं जीवितं द्वयोः ॥ ९१ ॥ ९१. 'तो दुर्गा को अपने देह के उपहार से सन्तुष्ट करके, प्रतिज्ञा के साथ दोनो की प्राण रक्षा न्याय्य है।' शाखा में शिर नीचा और पैर ऊपर कर शाखा पाठभेद : में लटकता तपस्या कर रहा था। (वाल्मीकि श्लोक संख्या ८८ में 'प्राङ्मया समयः कृतः' रामायण उत्तर काण्ड सर्ग ७५ तथा ७६ ) का 'प्राग्योऽस्मि समकल्पयम्' तथा 'संप्रति' का रामायण की इस कथा का उल्लेख भवभूति के पाठभेद 'स प्रति' मिलता है । प्रसिद्ध नाटक उत्तररामचरित के प्रथम अंक में श्लोक संख्या ९१ में 'जीवितं' का पाठभेद मिलता है। 'जीवितु' मिलता है।