राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८४ राजतरंगिणी यद्यहिंसाऽऽग्रहेणेमं क्षितिपाल न रक्षसि । एतद्विपत्तौ तत्कोऽन्यो निमित्तं प्रतिभाति मे ॥ ८४ ॥ ८४. 'हे क्षितिपाल ! यदि अहिंसा के आग्रह से इसकी रक्षा नहीं करते हो, तो इसकी विपत्ति में दूसरा और कौन कारण है। निर्णयो वर्णगुरुणा त्वयैवैष प्रदीयताम् । ब्राह्मणस्य पशोर्वा स्यात्प्राणानां कियदन्तरम् ॥ ८५ ॥ ८५. 'वर्ण गुरु' आप ही इसका निर्णय दें कि, ब्राह्मण और पशु के प्राण में कितना अन्तर है'। तपःस्थानपि ये जघ्नुर्ब्राह्मणप्राणलब्धये । हा मातस्तेऽधुना भूमे प्रजापालास्तिरोहिताः ॥ ८६ ॥ ८६. “हा भूमि माता ! तुम्हारे वे भूमिपाल (अद्य) तिरोहित हो गये, जिन्होंने ब्राह्मण प्राणोपलब्धि हेतु तपस्वियों२ का भी वध किया।" आदि दुर्गा देवी सम्बन्धी ग्रन्थों से ही यहाँ तात्पर्य है। दरा मजरी पूजा के दिन दुर्गा को इरा पुष्प अर्पित किया जाता था । (नी० 668-78) पाठभेद : श्लोक संख्या ८५ मे 'प्राणाना' का पाठभेद 'प्राणिना' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ८५ (१) वर्णगुरुः इस शब्द का यहाँ अर्थ राजा है । एक अनुवादक ने वर्ण गुरु का अर्थ चारों वर्ण का रक्षक किया है । यहा वर्ण गुरु शब्द भूपाल, पृथ्वी- पति, क्षितिपाल आदि के समान राजा का विशेषण है जिसका अर्थ राजा होता है । पाठभेद : श्लोक संख्या ८६ मे 'तपःस्था' का 'उपस्तथा' तथा 'भूमे' का 'भूमे' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ८६ (१) भूमि माताः कल्हण ने वैदिक सिद्धान्त का यहाँ प्रतिपादन किया है । वैदिक साहित्य में पृथ्वी को माता कहा है । ऋग्वेद में पृथ्वी माता तथा देवी रूप उसे सम्बोधित किया गया है । पृथ्वी का अर्थ भूमि है। तैत्तिरीय ब्राह्मण कहता है—'इयं वै माता' ( ३:८:९:१ ) 'तन्माता पृथ्वी तद् द्यौः' ( तै० ब्रा० २:७:१६:३०) 'धेनुरिव वा इयं मनुष्येभ्यः सर्वान् कामान् दुहे माता धेनुर्मातेव वा इयं मनुष्यान् विभर्ति' ( श० ब्रा० २:३:१:२१ ) मोहन्दो जोरो तथा अनेक प्राचीन वैदिक किंवा अर्धवैदिक कालीन स्थानो के खनन में पृथ्वी को माता के रूप मे मृत्तिका टेबलेट आदि पर चित्रित किया गया है । ( इण्डियन एण्ड इन्डोनीशियन आर्ट ) कुमार स्वामी प्लेट ३० आकृति १०५ । पृथ्वी को माता कहने का भाव भी बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय के आनन्द मठ में निहित गान 'वन्देमातरम्' मे आ जाता है । रा० तरं० ८:१२३६ श्लोक भी द्रष्टव्य है । (२) तपस्वी - कल्हण का अभिप्राय यहाँ रामायण की प्रसिद्ध कथा शम्बूक से है। ब्राह्मण बालक की मृत्यु के कारण जानने पर तपस्वी होने पर भी शम्बूक की हत्या कर राम ने ब्राह्मण बालक को जीवित किया था । शम्बूक एक शूद्र थे