राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४९० राजतरंगिणी ईशो नृपाणां निश्शेषक्ष्माकेदारकुटुम्बिनाम् । स समास्त्रिंशतं भूपृदनिस्त्रिंशाशयोऽभवत् ॥ १०१ ॥ १०१. समस्त पृथ्वी क्षेत्र को कुटुम्बी१ समझने वाले नृपों का अधीश्वर निष्क्रूर राजा ने तीस वर्ष शासन किया। हिरण्यतोरमाणाख्यौ व्यधत्तामथ तत्सुतौ । साम्राज्ययुवराजत्वभाजने रञ्जनं क्षितेः ॥ १०२ ॥ १०२. साम्राज्य एवं युवराज पद के पात्र हिरण्य तथा तोरमाण१ संज्ञक उसके दोनों पुत्रों ने क्षिति का रंजन किया।
त्रिगर्त के ६ संघ राज्यों का पाणिनि ने वर्णन किया है । उनके नाम—कौडोपरथ, दांडिक, कौष्टकी, जालमानि, ब्राह्मगुप्त और जानकि है । महाभारत में त्रिगर्त तथा कुलूत अर्थात् उलूक पर्वतमालाओ में निर्वासित गणों और राजाओं का वर्णन किया गया है । (सभा-पर्व २७: ५–१६) कुलूत अर्थात् वर्तमान कुलू अंचल की राजधानी नगर थी । कश्यादि गण ( ४ २:९ ) पाणिनि वर्णित नगर यही रहा होगा । कुलूत के दक्षिण मण्डो तथा सुकेत के राज्य थे। यवादि गण—अष्टाध्यायी (८:२९) में 'मंडमती' का उल्लेख है । सुकेत सम्भवतः सुकूट्ट है। इसका उल्लेख सभा पर्व में कुलिन्दो के सन्दर्भ मे आया है। सतलज के दक्षिण टोस नदी का क्षेत्र कुलिंद प्राचीन काल में कहा जाता था । कुलिंद, कुलूत तथा कुणिद एक ही शब्द के विकृत रूप हैं। अष्टाध्यायी (४.१:१७८ ) में योधेयों के साथ त्रिगर्त सघ का उल्लेख मिलता है। द्रष्टव्य है आदि पर्व १५५:२ ; सभा पर्व २७ १८, २३ ७,५२ १८—१९, वन पवे २७- १५ २६, २७१:१२ ; उद्योग पर्व १६४:८, १६६ ११, ५ १८, १६०:९, विराट पर्व : अ० ३०, ३२, ३३ ; भीष्म पर्व ५७:७, प्र० ५६, ६१, ७२, १०२ ; द्रोण पर्व : अ० ४, १८:१६ ; कर्ण पर्व . अ० ८, १७,१९, ३०, १८१, १५७ ; शल्य पर्व प० २७ ; आश्वमेधिक पर्व: अ. ७४ १०१ (१) कुटुम्बः बाण के हर्ष चरित में इस प्रकार का पद मिलता है—'चतुरुदधि- केदारकुटुम्बी । इस श्लोक का भाव निम्नलिखित श्लोक में और स्पष्ट हो जाता है : अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् । उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥ १०२ (१) तोरमाण . श्री विल्सन अभिषेक काल सन् ८७ ई. ३ मास तथा राज्य काल ३० वर्ष २ मास देते हैं । श्री एस. पी. पण्डित ने यह समय सन् ८८ ई. तथा राज्य काल ३० वर्ष २ मास रखा है । श्री स्टीन ने राज्याभिषेक काल लौकिक सं० ३१६२ तथा राज्य काल ३० वर्ष रखा है । श्री बाली यह समय सप्तर्षि संवत् ४०३९ तथा सन् २६९ ई० देते हैं । कलि गताब्द ३२१३ वर्ष ६ मास आता है । टायर के अनुसार यह समय सन् ८८ ईस्वी ९ मास होना चाहिए । कनिंघम ने सन् ४१५ ई. समय रखा है । आइने अकबरी 'हेरेन' नाम देती है । राज्य काल ३० वर्ष दिया गया है । तूरमाण यह तुर्की नाम है । यह उन प्रारम्भिक तुर्कों में पाया जाता है जिन्होंने भारत विजय किया था