राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ४९१ और पहले बौद्ध तथा कालान्तर में हिन्दू हो गये थे । दशवी शताब्दी में काबुल तथा सीमान्त पश्चिमोत्तर देश के रहने वाले उन्ही तुर्कों को शाही कहा गया । तरंग ५:२३३ द्रष्टव्य है । भारतीय हूण राजा तोरमाण कश्मीर के राजा तोरमाण से भिन्न है। कुछ इतिहासकारों ने खोज- खाँचकर कश्मीरी तोरमाण को भारतीय तोरमाण का पौत्र होने का अनुमान लगाया है। कश्मीरी तोरमाण ने भी भारतीय तोरमाण राजा तुल्य मुद्रा टंकणित करवाया था । दोनों की मुद्राओ में समानता होने के कारण कुछ इतिहास- कार उन्हें एक मानते हैं । कल्हण के अनुसार हूण- राज नरेन्द्रदित्य का वंशज था । कश्मीरी तोरमाण युधिष्ठिर प्रथम का वंशज था । कश्मीर में तोरमाण नाम की ताम्र मुद्रायें बहु संख्या मे मिली है । मुद्रायें मध्य छठवी शताब्दी की टंकणित है । उनकी लिपि गुप्त कालीन है । तोरमाण तुरको नाम है । तुर्क एवं तुरुष्क एक ही जाति थी । मुसलिम काल के पूर्व तुर्किस्तान से आने वाले तुर्क बुद्ध धर्मावलम्बी थे । कालान्तर में हिन्दू बन गये । कुछ इतिहासकारों का मत है कि काबुल तथा सिन्ध के मध्य रहनेवालो के लिये शाही शब्द का प्रयोग होने लगा था । हसन लिखता है—( ६ ) सन् विक्रमी ९८ में हिरन वारिस तख्त होकर अपने भाई को तोरमान वोहदः वज़ारत बख्शा । कुछ अरसा खूब गुजरी । लेकिन आखिर मे तोरमान का मिज़ाज़ भाई की अताअत व फरमा बरदारी से मनहरफ् हो गया । सिक्का अपने नाम जारी कर लिया । हिरन को उसकी यह हरकत बहुत नापसन्द आयी । और तूरमान को जेल भेज दिया । तूरमान की वोवी अंजना जो सूरज वंशी राजाओं के चश्म व चिराग़ थी अपने शौहर के हादशा के वक्त फरार हो गयी । और मुकाम अन्दर कोट में एक कुम्हार के घर रहने सहने लगी । यह औरत अपने खाविन्द से हामिला थी । इसलिये वज़ हमल के वक्त इसके पेट से एक लडका पैदा हुआ । जिसका नाम इसने परवरसेन रखा । कुम्हार की बीबी इस लडके की अपनी औलाद की तरह परवरिश किया करती थी । सन् बलूग़त तक लोग उसे कुलाल का बेटा ही ख़्याल करते रहे । बचपन से ही बुजुर्गी के निशानात उसकी पेशानी से नमूदार थे । बच्चो के साथ खेल व कूद के दौरान में खुद एक ऊँची जगह पर बैठता और अपने आप को राजा के खिताब से पुकारता था । दूसरे लड़को को वज़ारत मोरमरी और दीगर मुलाज़मतो के अहदसे बख़्शे हुए थे । इसका शग़ल हमेशा तोरन्दाजो और निशाना बाज़ी था । हुसन इत्तफाक से अंजना का भाई जयेन्द्र अपनी बहन को तलाश में जगह जगह फिरता था । एक दिन वह अन्दर कोट में भी जहाँ परवरसेन बच्चों में खेल रहा था आ पहुँचा । क्या देखता है कि एक लडका बड़ी शान-शौकत से एक टोला पर बैठा हुआ है । और अपने मातहत बच्चो पर हुक्मरानी कर रहा है । जयेन्द्र के दिल में तबज़ मुहब्बत और शफ़्कत ने जोश मारा लेकिन वहाँ कुछ न कह सका । रात को उस लड़के के पीछे कुम्हार के घर मे आया । अपने बहन की जो मुद्दत से जुदा हो गयी थी । पहचान लिया । दोनो एक दूसरे के साथ गले मिलकर रोये । परवरसेन ने इस रोने-धोने का सबब अपनी मा से पूछा । उसने जवाब दिया कि यह मेरा भाई है। तेरा बाप तूरमार अपने भाई के जुल्म से कैदी बना हुआ है । अब मै उसी के फिराक़ में रोती हूँ । परवरसेन अपने बाप की हालत सुनकर गुस्सा से आगबबूला हो गया । इन्दर जे के घर रात दिन कुश्ती और पहलवानी में बसर करने लगा । इस असनाए में हिरन ने बाज़ मुतक़द्दर हस्तियो के सिफारिश के पेश नज़र तूरमान की रिहाई के अहकाम जारी कर दिये । तूरमान कुछ मुद्दत बैठ के हमराह उल्फत और मुहब्बत से ज़िन्दगी गुज़ार