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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 647

४९२ राजतरंगिणी भ्राताहृतानां प्राचुर्यं विनिवार्यासमञ्जसम् । तोरमाणेन दीनाराः स्वाहताः संप्रवर्तिताः ॥ १०३ ॥ १०३. तोरमाण ने भ्रातृ अंकित मुद्रा का असंगत प्राचुर्य निवारण कर स्वांकित दीनार प्रवर्तित किया ।

के नागहानी फौत हो गया । इस वाकया के थोडे अरसः बाद प्रवरसेन अपने खालू जो इन्दर की हम- राही में हिन्दुस्तान के बड़े बड़े तीरथ और मन्दिर देखने के लिये गया । इन्ही दिनों तकदीर इलाही से हिरण की जिंदगी के दिन भी पूरे हो गये और वह तीस साल हुकूमत करके इस जहांन् से रुखसत हुआ । राजा हिरण बे औलाद था । इसलिए हुकूमत का चिराग बे रौनक रहा । यह देखकर धराकीन सल्तनत महाराज विक्रमाजीत की खिदमत में हाज़िर हुए जो हिन्दुस्तान का शाजदार था । उससे इल्तजा की कि वह सल्तनत कश्मीर अपने कब्ज इक्तदार में लाए ।

पाठभेद : श्लोक संख्या १०३ में 'भ्रात्राह' का 'बालाह' पाठभेद मिलता है ।

पादटिप्पणियाँ : १०३ (१) दीनार : संस्कृत दीनार शब्द रोमन दिनारियस शब्द का अपभ्रंश प्रतीत होता है। यह शब्द आज भी जेकोस्लोविकिया की मुद्रा के लिये प्रयोग किया गया है । कश्मीर में दीनार मुद्राओं के लिये प्रायः प्रयोग किया जाता था । यह स्वर्ण, रजत तथा ताम्र तीनों धातुओं में टंकणित होता था । एक सौ कौड़ी का एक ताम्र दीनार होता था । कल्हण जब वर्णन करता है कि एक हजार दीनार मासिक वेतन अधिकारियों को दिया जाता था । तो उसका अर्थ यह पैसा ही है । तरंग ८:३८; ७:१४५, १६३; ४१८ तथा ८:१९१८ द्रष्टव्य है । मेरी बाल्यावस्था में सन् १९१४-१९१६ में काशी में एक ताम्बे के पैसा का ६० से ४० कौड़ी मिलती थी । कौड़ी का

प्रचलन सन् १९२० के पश्चात् प्रायः नगरो में बन्द हो गया । उसका स्थान अधेला आधा पैसा तथा एक पैसा में मिलने वाली तीन पाई ब्रिटिश राज्य काल में ले लिया था । बारह पाई का एक आना १६ आना का एक रुपया तथा एक पैसा में ३ पाई और २ अधेला मिलता था । चार पैसा या आठ अधेला का एक आना होता था । दो पैसे का एक सिक्का टका या टकहवा सन् १९२० तक खूब चलता था परन्तु उसका प्रचलन भी ब्रिटिश अमलदारी में बन्द कर दिया गया था । इसके अतिरिक्त चाँदी की दुअन्नी चवन्नी तथा अठन्नी चलती थी । एक आना का सिक्का मिश्रित धातु का चलता था । इस समय एक सौ पैसा का एक रुपया चलने लगा है ।

दीनार ३२ रत्ती का सुवर्ण का सामान्यतः होता था । संस्कृत भाषा में यह शब्द प्रचलित हो गया था । ईरान तथा सीरिया में अरबों के आक्रमण के पूर्व दीनार प्रचलित था । अरबो के यहाँ मुद्रा टंकणित नहीं होती थी । अरब विजय के पश्चात् अपने सल्तनत में 'दिरहेम' अरबों ने प्रचलित किया । यह दीनार शब्द का ही तद्भव रूप है ।

आइने अकबरी के अनुसार दीनार एक दिरहम का तीन बँटा सातवाँ वजन मे होता था ।

फरिश्ता लिखता है कि दीनार दो रुपयो के बराबर होता था । रोमन लोगों का दिनेरियस रजत मुद्रा था जब कि हिन्दु दीनार सुवर्ण का होता था । रोमन दिनेरियस सुवर्ण का भी होता था । पेरीप्लस का लेखक अद्रियन लिखता है कि 'दिनारो' स्वर्ण और रजत के यूरोप से 'बर्यगजा' अर्थात् भड़ौच भेजे जाते थे ।