राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४९२ राजतरंगिणी भ्राताहतानां प्राचुर्यं विनिवार्यासञ्जसम् । तोरमाणेन दीनाराः स्वाहताः संप्रवर्तिताः ॥ १०३ ॥ १०३. तोरमाण ने भ्रातृ अंकित मुद्रा का असंगत प्राचुर्य निवारण कर स्वांकित दीनार प्रवर्तित किया ।
के नागहानी फ़ौत हो गया। इस वाकया के थोड़े अरसः बाद प्रवरसेन अपने खालू जो इन्दर की हम- राही में हिन्दुस्तान के बड़े बड़े तीरथ और मन्दिर देखने के लिये गया। इसी दिनों तक़दीर इलाही से हिरन की जिंदगी के दिन भी पूरे हो गये और वह तीस साल हुकूमत करके इस जहान् से रुखसत हुआ। राजा हिरन बे औलाद था। इसलिए हुकूमत का चिराग बे रौनक रहा। यह देखकर अराकीन सल्तनत महाराज विक्रमाजीत की खिदमत में हाज़िर हुए जो हिन्दुस्तान का ताजदार था। उससे इल्तजा की कि वह सल्तनत कश्मीर अपने कब्ज इक्तदार में लाए।
पाठभेद : श्लोक संख्या १०३ में 'भ्रात्राह' का 'बालाइ' पाठभेद मिलता है।
पादटिप्पणियाँ : १०३ (१) दीनार : संस्कृत दीनार शब्द रोमन दिनारियस शब्द का अपभ्रंश प्रतीत होता है। यह शब्द आज भी जेगोस्लोविया की मुद्रा के लिये प्रयोग किया गया है। कश्मीर में दीनार मुद्राओं के लिये प्रायः प्रयोग किया जाता था। यह स्वर्ण, रजत तथा ताम्र तीनों धातुओं में टंकित होता था। एक सौ कौड़ी का एक ताम्र दीनार होता था। कल्हण जब वर्णन करता है कि एक हजार दीनार मासिक वेतन अधिकारियों को दिया जाता था। तो उसका अर्थ यह पैसा ही है। तरंग ८:३८; ७:१४५, १६३; ४१८ तथा ८:१९१८ द्रष्टव्य है। मेरी बाल्यावस्था में सन् १९१४-१९१६ में काशी में एक ताम्बे के पैसा का ६० से ४० कौड़ी मिलती थी। कौड़ी का प्रचलन सन् १९२० के पश्चात् प्रायः नगरों में बन्द हो गया। उसका स्थान अधेला आधा पैसा तथा एक पैसा में मिलने वाली तीन पाई ब्रिटिश राज्य काल में ले लिया था। बारह पाई का एक आना १६ आना का एक रुपया तथा एक पैसा में ३ पाई और २ अधेला मिलता था। चार पैसा या आठ अधेला का एक आना होता था। दो पैसे का एक सिक्का टका या टकहवा सन् १९२० तक खूब चलता था परन्तु उसका प्रचलन भी ब्रिटिश अमलदारी में बन्द कर दिया गया था। इसके अतिरिक्त चाँदी की दुअन्नी चवन्नी तथा अठन्नी चलती थी। एक आना का सिक्का मिश्रित धातु का चलता था। इस समय एक सौ पैसा का एक रुपया चलने लगा है।
दीनार ३२ रत्ती का सुवर्ण का सामान्यतः होता था। संस्कृत भाषा में यह शब्द प्रचलित हो गया था। ईरान तथा सीरिया में अरबों के आक्रमण के पूर्व दीनार प्रचलित था। अरबों के यहाँ मुद्रा टंकखित नही होती थी। अरब विजय के पश्चात् अपने सल्तनत में 'दिरहेम' अरबों ने प्रचलित किया। यह दीनार शब्द का ही तद्भव रूप है।
आइने अकबरी के अनुसार दीनार एक दिरहम का तीन बँटा सातवाँ वजन में होता था।
फरिश्ता लिखता है कि दीनार दो रुपयों के बराबर होता था। रोमन लोगों का दिनेरियस रजत मुद्रा था जब कि हिन्द दीनार सुवर्ण का होता था। रोमन दिनेरियस सुवर्ण का भी होता था। पेरीप्लस का लेखक एरियन लिखता है कि 'दिनारी' स्वर्ण और रजत के यूरोप से 'बरिगजा' अर्थात् भड़ोच भेजे जाने थे।