राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ४९३ मामवज्ञाय राज्ञेव कस्मादेतेन वल्गितम् । इति तं पूर्वजो राजा क्रोधनो बन्धने व्यधात् ॥ १०४ ॥ १०४. राजा के समान इसने मेरी अवज्ञा कर किस हेतु औद्धत्य किया ? इस पूर्ववर्ती ( ज्येष्ठभ्राता ) क्रोधी राजा ने उसे बन्धन में कर दिया । चिरं स्थितित्यक्तशुचस्तत्र तस्याऽञ्जनाभिधा । ऐक्ष्वाकस्याऽत्मजा राज्ञी वज्रेन्द्रस्याऽऽस्त गर्भिणी ॥१०५॥ १०५. वह चिरकाल तक वहां रहते, शोकरहित हो गया । उसकी अंजना नामक रानी गर्भवती हुई, जो ऐक्ष्वाकु वज्रेन्द्र की आत्मजा थी । आसन्नप्रसवा भर्त्रा सा त्रपार्तेन बोधिता । सुतं प्रविष्टा प्रासोष्ट कुलालानिलये क्वचित् ॥ १०६ ॥ १०६. उसके आसन्नप्रसवा होने पर त्रपा पीड़ित पति ने उससे कहा—कहीं कुलाल निलय में जाकर प्रसव करो । स कुम्भकारगेहिन्या काक्येव पिकशावकः । पुत्रीकृतो राजपुत्रः पर्याप्तं पर्यवर्धत ॥ १०७ ॥ १०७. जिस प्रकार काकी १ पिक शावक का वर्धन करती है, उसी प्रकार कुम्भकार की गृहिणी ने पुत्रीकृत उस राजपुत्र का पर्याप्त संवर्धन किया । जनयित्र्याः कुलाल्यश्च रक्षिण्या विदितोऽभवत् । रत्नसूतेर्भुजंग्याश्च प्रच्छन्न इव शेवधिः ॥ १०८ ॥ १०८. उसे उसकी माता तथा रक्षिका कुलाली उसी तरह जानती थी, जैसे प्रच्छन्न मूल्यवान निधि को पृथिवी तथा भुजंगिनी १ जानती हैं ।
पाठभेद : श्लोक संख्या १०४ में 'एतेन' का पाठभेद 'तोरमाणेन' मिलता है । श्लोक संख्या १०६ में 'सा त्रपार्तेन' का पाठभेद 'सत्रपं तेन' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १०७ ( १ ) काकी : कोयल के बच्चे को कौआ अपना समझ कर पालता है । यह केवल गाथा नहीं है । वास्तविकता है । कवि की कल्पना नहीं हैं । कवि का सत्य दर्शन वर्णन है । कोयल अपना घोंसला नहीं बनाती । वह अण्डा वहाँ देती है जहाँ कौआ अपना घोंसला या नीड बनाता है । वह घोंसले में जाकर अण्डा देती है । तत्पश्चात् अपने अण्डे का परित्याग कर उड़ जाती है । कालिदास ने दुष्यन्त के मुख से अभिज्ञान शाकुन्तला नाटक में कहलवाया है—स्त्रियां सर्वदा धोखा देती हैं— उनको उपमा 'प्राग् अन्तरिक्षगमनात्' से देता है । तरंग ८।३१७५ तथा ३१७८ भी द्रष्टव्य है । पाठभेद : श्लोक संख्या १०८ में 'शेवधिः' का पाठभेद 'सेवधि' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १०८ ( १ ) भुजंगिनी : पृथ्वी में गड़े रत्न को पृथ्वी तथा भुजंग जानता है । कंजूसों के लिये भारत में कोने कोने में सभी भाषाओं में कहावत प्रचलित है कि वे मरने पर सर्प बनकर पृथ्वी में गड़े धन पर बैठते हैं । कल्हण उसी कहावत का यहाँ काव्य रूप में वर्णन करता है ।