राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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पौत्रः प्रवरसेनस्य गिरा मातुर्नृपात्मजः । पैतामहेन नाम्नैव कुलाल्या ख्यापितोऽभवत् ॥ १०६ ॥ १०९. माता के कहने पर कुलाली ने प्रवरसेन के पौत्र नृपात्मज को पितामह के नाम से प्रख्यात किया । वर्धमानः स संपर्कं न सेहे सहवासिनाम् । तेजस्विमैत्रौरसिकः शिशुः पद्म इवाऽम्भसाम् ॥ ११० ॥ ११०. वर्धमान वह शिशु तेजस्वियों के मैत्री का प्रेमी था । उसने सहवासियों का उसी प्रकार सम्पर्क नहीं किया, जैसे रवि मैत्री का प्रेमी पद्म, जल का सम्पर्क नहीं करता । तं कुलीनैश्च शूरैश्च विद्याविद्भिश्च दारकैः । अन्वीतमेव ददृशुः क्रीडन्तं विस्मयाज्जनाः ॥ १११ ॥ १११. कुलीन शूर विद्याविद् बालकों के साथ ही क्रीड़ा करते हुये, उसे लोग विस्मय पूर्वक देखते थे । स्ववृन्दस्याऽभ्युदारौजा राजा चक्रे स दारकैः । मृगेन्द्रशावः क्रीडद्भिर्वने बालमृगैरिव ॥ ११२ ॥ ११२. साथ में क्रीड़ा करते बालकों ने उस। तेजस्वी को उसी प्रकार अपने दल का राजा बना लिया, जैसे वन में साथ क्रीड़ा करते बाल मृग सिंह शावक को । संविभेजेऽनुजग्राह वशीचक्रे च सोऽर्भकान् । अगजोचितमाचारं नैव कंचिदसेवत ॥ ११३ ॥ ११३. उसने संविभाग एवं अनुग्रहण पूर्वक बालकों को वश में कर लिया और कभी अगजोचित आचार नहीं किया । भाण्डादि कर्तुं मृत्पिण्डं कुम्भकारैः समर्पितम् । स्वीकृत्य चक्रिरे तेन शिवलिङ्गपरम्पराः ॥ ११४ ॥ ११४. कुम्भकारों के भाण्डादि निर्माण हेतु प्रदत्त मृत्पिण्ड को लेकर, वह शिव लिंग की परम्परा तैयार करता था । तथा साश्चर्यचयैः स क्रीडञ्ज्ञातु व्यलोक्यत । मातुलेन जयेन्द्रेण सादरं चाभ्यनन्द्यत ॥ ११५ ॥ ११५. उस प्रकार के आश्चर्य जनक कृत्यशाली क्रीड़ा करते, उस बालक को कदा- चित् मातुल जयेन्द्र ने देखा और सादर अभिनन्दन किया । आवेद्यमानं शिशुभिस्तं जयेन्द्रोऽयमित्यसौ । भूपालवत्सावहेलं पश्यन्नन्वग्रहीदिव ॥११६॥ ११६. शिशुओं ने ज्ञात कराया 'यह जयेन्द्र है,' तो भूपाल सदृश उसने अवहेलना पूर्वक देखते हुए मानो अनुग्रह किया।