राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
तृतीय तरंग ४९३ मामवज्ञाय राज्ञेव कस्मादेतेन वल्गितम् । इति तं पूर्वजो राजा क्रोधनो बन्धने व्यधात् ॥ १०४ ॥ १०४. राजा के समान इसने मेरी अवज्ञा कर किस हेतु औद्धत्य किया ? इस पूर्ववर्ती ( ज्येष्ठभ्राता ) क्रोधी राजा ने उसे बन्धन में कर दिया । चिरं स्थितित्यक्तशुचस्तत्र तस्याऽञ्जनाभिधा । ऐक्ष्वाकस्याऽत्मजा राज्ञी वज्रेन्द्रस्याऽऽस्त गर्भिणी ॥१०५॥ १०५. वह चिरकाल तक वहां रहते, शोकरहित हो गया । उसकी अंजना नामक रानी गर्भवती हुई, जो ऐक्ष्वाकु वज्रेन्द्र की आत्मजा थी । आसन्नप्रसवा भर्त्रा सा त्रपार्तेन बोधिता । सुतं प्रविष्टा प्रासोष्ट कुलालानिलये क्वचित् ॥ १०६ ॥ १०६. उसके आसन्नप्रसवा होने पर त्रपा पीड़ित पति ने उससे कहा—कहीं कुलाल निलय में जाकर प्रसव करो । स कुम्भकारगेहिन्या काक्येव पिकशावकः । पुत्रीकृतो राजपुत्रः पर्याप्तं पर्यवर्धत ॥ १०७ ॥ १०७. जिस प्रकार काकी १ पिक शावक का वर्धन करती है, उसी प्रकार कुम्भकार की गृहिणी ने पुत्रीकृत उस राजपुत्र का पर्याप्त संवर्धन किया । जनयित्र्याः कुलाल्यश्च रक्षिण्या विदितोऽभवत् । रत्नसूतेर्भुजंग्याश्च प्रच्छन्न इव शेवधिः ॥ १०८ ॥ १०८. उसे उसकी माता तथा रक्षिका कुलाली उसी तरह जानती थी, जैसे प्रच्छन्न मूल्यवान निधि को पृथिवी तथा भुजंगिनी १ जानती हैं ।
पाठभेद : श्लोक संख्या १०४ में 'एतेन' का पाठभेद 'तोरमाणेन' मिलता है । श्लोक संख्या १०६ में 'सा त्रपार्तेन' का पाठभेद 'सत्रपं तेन' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १०७ ( १ ) काकी : कोयल के बच्चे को कौआ अपना समझ कर पालता है । यह केवल गाथा नहीं है । वास्तविकता है । कवि की कल्पना नहीं हैं । कवि का सत्य दर्शन वर्णन है । कोयल अपना घोंसला नहीं बनाती । वह अण्डा वहाँ देती है जहाँ कौआ अपना घोंसला या नीड बनाता है । वह घोंसले में जाकर अण्डा देती है । तत्पश्चात् अपने अण्डे का परित्याग कर उड़ जाती है । कालिदास ने दुष्यन्त के मुख से अभिज्ञान शाकुन्तला नाटक में कहलवाया है—स्त्रियां सर्वदा धोखा देती हैं— उनको उपमा 'प्राग् अन्तरिक्षगमनात्' से देता है । तरंग ८।३१७५ तथा ३१७८ भी द्रष्टव्य है । पाठभेद : श्लोक संख्या १०८ में 'शेवधिः' का पाठभेद 'सेवधि' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १०८ ( १ ) भुजंगिनी : पृथ्वी में गड़े रत्न को पृथ्वी तथा भुजंग जानता है । कंजूसों के लिये भारत में कोने कोने में सभी भाषाओं में कहावत प्रचलित है कि वे मरने पर सर्प बनकर पृथ्वी में गड़े धन पर बैठते हैं । कल्हण उसी कहावत का यहाँ काव्य रूप में वर्णन करता है ।
४९४ राजतरंगिणी
पौत्रः प्रवरसेनस्य गिरा मातुर्नृपात्मजः । पैतामहेन नाम्नैव कुलाल्या ख्यापितोऽभवत् ॥ १०६ ॥ १०९. माता के कहने पर कुलाली ने प्रवरसेन के पौत्र नृपात्मज को पितामह के नाम से प्रख्यात किया । वर्धमानः स संपर्कं न सेहे सहवासिनाम् । तेजस्विमैत्रौरसिकः शिशुः पद्म इवाऽम्भसाम् ॥ ११० ॥ ११०. वर्धमान वह शिशु तेजस्वियों के मैत्री का प्रेमी था । उसने सहवासियों का उसी प्रकार सम्पर्क नहीं किया, जैसे रवि मैत्री का प्रेमी पद्म, जल का सम्पर्क नहीं करता । तं कुलीनैश्च शूरैश्च विद्याविद्भिश्च दारकैः । अन्वीतमेव ददृशुः क्रीडन्तं विस्मयाज्जनाः ॥ १११ ॥ १११. कुलीन शूर विद्याविद् बालकों के साथ ही क्रीड़ा करते हुये, उसे लोग विस्मय पूर्वक देखते थे । स्ववृन्दस्याऽभ्युदारौजा राजा चक्रे स दारकैः । मृगेन्द्रशावः क्रीडद्भिर्वने बालमृगैरिव ॥ ११२ ॥ ११२. साथ में क्रीड़ा करते बालकों ने उस। तेजस्वी को उसी प्रकार अपने दल का राजा बना लिया, जैसे वन में साथ क्रीड़ा करते बाल मृग सिंह शावक को । संविभेजेऽनुजग्राह वशीचक्रे च सोऽर्भकान् । अगजोचितमाचारं नैव कंचिदसेवत ॥ ११३ ॥ ११३. उसने संविभाग एवं अनुग्रहण पूर्वक बालकों को वश में कर लिया और कभी अगजोचित आचार नहीं किया । भाण्डादि कर्तुं मृत्पिण्डं कुम्भकारैः समर्पितम् । स्वीकृत्य चक्रिरे तेन शिवलिङ्गपरम्पराः ॥ ११४ ॥ ११४. कुम्भकारों के भाण्डादि निर्माण हेतु प्रदत्त मृत्पिण्ड को लेकर, वह शिव लिंग की परम्परा तैयार करता था । तथा साश्चर्यचयैः स क्रीडञ्ज्ञातु व्यलोक्यत । मातुलेन जयेन्द्रेण सादरं चाभ्यनन्द्यत ॥ ११५ ॥ ११५. उस प्रकार के आश्चर्य जनक कृत्यशाली क्रीड़ा करते, उस बालक को कदा- चित् मातुल जयेन्द्र ने देखा और सादर अभिनन्दन किया । आवेद्यमानं शिशुभिस्तं जयेन्द्रोऽयमित्यसौ । भूपालवत्सावहेलं पश्यन्नन्वग्रहीदिव ॥११६॥ ११६. शिशुओं ने ज्ञात कराया 'यह जयेन्द्र है,' तो भूपाल सदृश उसने अवहेलना पूर्वक देखते हुए मानो अनुग्रह किया।
तृतीय तरंग ४९५ संभाव्य सत्त्वावष्टम्भात्तमसामान्यवंशजम् । सादृश्याद्भगिनीभर्तुर्भागिनेयमशङ्कत ॥ ११७ ॥ ११७. प्रबल साहस के कारण उसे असामान्य कुलोत्पन्न समझकर भगिनीपति के सादृश्य से भगिनी पुत्र की शङ्का (जयेन्द्र) ने की। सस्वरस्तत्त्वजिज्ञासारसेनानुससार तम् । प्राप्तस्तद्गृहमौत्सुक्यात्स्वसारं च व्यलोकयत् ॥ ११८ ॥ ११८. वस्तु स्थिति जानने की जिज्ञासा रस से उत्सुकता पूर्वक अनुसरण कर (जयेन्द्र) शीघ्र उसके घर गया और अपनो वहन को देखा। सा स चान्योन्यमुन्मन्यू पश्यन्तौ भ्रातरौ चिरात् । निश्वासद्विगुणोष्मणि मुहुरश्रुण्यमुञ्चताम् ॥ ११९ ॥ ११९. उन दोनों भाई बहन ने देर तक एक दूसरे को उत्कण्ठा पूर्वक देखा और पुनः निश्वास' के कारण अत्यधिक अश्रुपात किया। कुलाल्या दारको मातः कावेताविति पृष्टवान् । अकथ्यतेत्थं वत्सैषा माताऽयं मातुलश्च ते ॥ १२० ॥ १२०. दारक (पुत्र) के यह पूछने पर 'माता ! ये दोनों कौन है' कुलाली ने इस प्रकार कहा—'वत्स, यह तुम्हारी माता एवं यह मातुल है।' पितुर्बन्धेन सक्रोधं तं कालापेक्षयाऽक्षमम् । शिक्षयित्वा जयेन्द्रोऽथ कार्यशेषाय निर्ययौ ॥ १२१ ॥ १२१. पिता के बन्धन से क्रुद्ध एवं काल की अपेक्षा से असमर्थ उसको जयेन्द्र शिक्षा देकर अवशिष्ट कार्य हेतु चला गया । उत्पिञ्जोत्पादनासज्जे तस्मिन्भ्राता यदृच्छया । बन्धात्त्यक्तो नृतरणिस्तोरमाणोऽस्तमाययौ ॥ १२२ ॥ १२२. वह जब विद्रोह हेतु तैयार हुआ। उसी समय स्वेच्छा से भाई (हिरण्य) ने मानव सूर्य (तोरमान) को बन्धन मुक्त कर दिया, जो अस्त हो (मर) गया। पाठभेद : पादटिप्पणियाँ : श्लोक संख्या ११८ के 'स्तस्त्व' का पाठभेद ११९ (१) निश्वास : कल्हण ने इसी प्रकार की उपमा राज० त० १:१५७ में दी हैं । 'स्तर्क' मिलता है । पाठभेद : श्लोक संख्या १२२ में 'त्पादनासज्जे' का, श्लोक संख्या ११९ में 'निश्वास' का पाठभेद 'त्पादनसज्जे' तथा 'बन्ध्यात्य' का पाठभेद 'बन्धा- 'निःश्वासात्' मिलता है । न्मु' मिलता है।
४९६ राजतरंगिणी निवार्य मरणोद्योगं मातृनिर्वेदखेदितः । ययौ प्रवरसेनोऽथ तीर्थौत्सुक्याद्दिगन्तरम् ॥ १२३ ॥ १२३. माता के मरणोद्योग^१ को रोक कर वेदना से खिन्न, प्रवरसेन तीर्थ करने की उत्सुकता से दिगन्तर गया। रक्षित्वा दशमासोनाः क्ष्मामेकत्रिंशतं समाः । तस्मिन्क्षणे हिरण्योऽपि शान्तिं निस्सन्ततिर्ययौ ॥ १२४ ॥ १२४. उस समय सन्तान रहित हिरण्य भी दश मास कम इकतीस वर्ष पृथ्वी की रक्षा कर शान्ति (मृत्यु) प्राप्त किया। तत्रानेहस्युज्जयिन्यां श्रीमान्हर्षापराभिधः । एकच्छत्रश्चक्रवर्ती विक्रमादित्य इत्यभूत् ॥ १२५ ॥ १२५. उस समय उज्जैनी में एकछत्र चक्रवर्ती श्रीमान् विक्रमादित्य^१ हुआ जिसका अपर नाम हर्ष था।
पादटिप्पणियाँ : १२३ ( १ ) मरणोद्योग : तोरमाण के मरने पर रानी स्वयं सती होना चाहती थी। उसके इस प्रयास को प्रतीत होता है प्रवरसेन ने रोका और माता को सती होने से विरत किया। पाठभेद : श्लोक संख्या १२५ में 'हर्षापराभिध.' का पाठभेद 'हर्षाभिधा पुरा' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १२५ ( १ ) विक्रमादित्य : तरंग २:७ में कल्हण ने हर्ष का उल्लेख किया है। श्लोक २:९ में कल्हण स्पष्ट कहता है कि वहाँ वर्णित हर्ष किंवा विक्रमादित्य शकारि विक्रमादित्य नही था। कल्हण के अनुसार शकारि विक्रमादित्य वहीं मातृगुप्त पड़ते हैं। शकों को पराजित करने के कारण शक संवत् ईसवी सन् ७८ में प्रचलित किया गया था। शक पराजय का उल्लेख कल्हण अगले १२८ वें श्लोक में पुनः करता है। उसने इस तरंग के श्लोक ३३० में पुनः कहा है कि शीला-दित्य प्रतापादित्य का पिता हर्ष विक्रमादित्य था। ह्वेन सांग ने शीलादित्य का उल्लेख अपने पर्यटन संस्मरण में किया है। ( २:२६१ ) उसका शासन काल सन् ५८० ईसवी मालवा में था। शक संवत् दक्षिण तथा कश्मीर में भी चलता है। गणतंत्र के पश्चात् भारत सरकार ने भी शक ही संवत् को स्वीकार कर मान्यता दी है। सरकारी कागजो में अब इसी का व्यवहार किया जाता है। इस समय विक्रम संवत् २०१५ शक संवत् १८९० तथा अंग्रेजी सन् १९५८ है। मुस्लिम इतिहासकारों ने विक्रमादित्य के सम्बन्ध में भ्रम पैदा कर दिया है। वे एक नाम विक्रमादित्य का ही दुहराते हैं। किसी भी विक्रमा-दित्य के सम्बन्ध में न कुछ आलोचना करते हैं और न उनका समय आदि देते हैं। उनसे इस सम्बन्ध में कुछ सहायता नहीं मिलती।
तृतीय तरंग ४९७ भूपमद्भुतसौभाग्यं श्रीर्वद्वरभसाऽभजत् । विहाय हरिबांहूश्च चतुरः सागरांश्च यम् ॥१२६॥ १२६. अद्भुत सौभाग्यशाली जिसके आश्रय में विष्णु के चारों बाहु और चारों समुद्र को छोड़कर, लक्ष्मी स्वतः सवेग आयी । लक्ष्मीं कृत्वोपकरणं गुणे येन प्रवर्धिते । श्रीमत्सु गुणिनोऽद्यापि तिष्ठन्त्युद्गुरकंधराः ॥१२७॥ १२७. जिसने लक्ष्मी को उपकरण (बनाकर) गुण (ॉ) का वर्धन किया, जिसके कारण गुणी (जन) धनियों में उन्नत स्कन्ध बैठते हैं । म्लेच्छोच्छेदाय वसुधां हरेरवतरिष्यतः । शकान्विनाश्य येनाऽऽदौ कार्यभारो लघूकृतः ॥१२८॥ १२८. म्लेच्छों¹ के नाश हेतु पृथ्वी पर अवतरित होने वाले हरि के कार्य भार को आदि में ही जिसने शकों का विनाश कर लघु (हल्का) कर दिया । नानादिगन्तराख्यातं गुणवत्सुलभं नृपम् । तं कविर्मातृगुप्ताख्यः सर्वस्थानस्थमासदत् ॥१२९॥ १२९. नाना दिगन्तरों से प्रख्यात एवं गुणवानों के लिये सुलभ, उस नृप के पास जो कि सार्वजनिक सभा भवन में स्थित था-कवि मातृगुप्त पहुँचा । पाठभेद : श्लोक संख्या १२७ में 'गुणे' का 'गुणो', 'प्रवर्धिते' का 'प्रवर्धने' तथा 'त्युद्गुर' का पाठभेद 'त्युद्वत' मिलता है । श्लोक संख्या १२८ में 'लघू' का पाठभेद 'लघु' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १२८ (१) म्लेच्छनाश : यहाँ पर कल्हण ने कल्कि अवतार की ओर संकेत किया है । भगवान् कल्कि अवतार लेकर म्लेच्छों का संहार करेंगे । गीत गोविन्द ने इसका उल्लेख किया है । म्लेच्छनिविद्रनिधने कलयसि करवालम् । केशव धृतकल्किशरीर ॥ १२९ (१) मातृगुप्त : कुछ विद्वान् मातृगुप्त को कवि कालिदास मानते हैं । इन्ही विद्वानों ने यह भी माना है कि जिस विक्रमादित्य के सभा में नव रत्नों का होना कहा जाता है वह छठी शताब्दी का विक्रमादित्य हर्ष था । डाक्टर भाऊदा जी का तर्क है कि कालिदास और मातृगुप्त का शाब्दिक अर्थ एक ही है । काली का अर्थ माता होता है । दास का अर्थ गुप्त होता है । इस प्रकार कालिदास ही मातृगुप्त हैं । कल्हण ने कालिदास का राजतरंगिणी में कहीं भी उल्लेख नहीं किया है । प्राकृत काव्य सेतु बन्ध जो प्रवरसेन के अनुरोध पर कालिदास ने लिखा था उसका भी उल्लेख नहीं मिलता । इसी प्रकार मिलाया गया है कि प्रवरसेन द्वितीय का उत्तराधिकारी मातृगुप्त दिलाया गया है । क्षेमेन्द्र ने औचित्यविचारचर्चा में मातृगुप्त की कविताओं का उल्लेख किया है । श्री वल्लभदेव की सुभाषितावली में भी मातृगुप्त के पदों का उल्लेख ६३
४९८ राजतरंगिणी
मिलता है। एक मातृगुप्त का उल्लेख अलंकार एवं नाट्य शास्त्र के प्रणेता के रूप में मिलता है। मातृगुप्त को कालिदास मानने में आधुनिक विद्वानों ने असहमति प्रकट की है। बम्बई के प्रसिद्ध विद्वान् डाक्टर भाऊदा जी का मत है कि मातृगुप्त ही कालिदास हैं। डाक्टर श्री ह्यरन्ले का मत है कि पुरा कथा विक्रमादित्य के सम्बन्ध में जो कही जाती है वह राजा यशोवर्धन पर लगती है जो वास्तव में हूण विजेता था। प्रोफेसर पाठक भी इस मत का समर्थन करते हैं। कालिदास कृत रघुवंश में रघु के विजय का वर्णन वस्तुतः हूणों के सम्बन्ध में है जो कश्मीर में रहते थे। क्यों कि कालिदास उसी सन्दर्भ में केसर का वर्णन करता है जो केवल भारत में कश्मीर में ही होता है। सम्राट् समुद्रगुप्त ने मातृगुप्त का उल्लेख किया है। मातृगुप्तो जयति यः कविराजो न केवलम् । कश्मीरराजोऽप्यभवत् सरस्वतीप्रसादतः ॥ सम्राट् समुद्रगुप्त का निधन सन् ३६४ ई० में हुआ था। अतएव मातृगुप्त का उसके पूर्व होना निश्चित प्रतीत होता है। आइने अकबरी के अनुसार मातृगुप्त एक कश्मीरी ब्राह्मण था। राजा विक्रमादित्य उसके गुणों तथा बुद्धिमत्ता से प्रसन्न होकर उसे कुछ द्रव्य देकर कश्मीर भेजा। उसने कश्मीर के मन्त्रियों तथा कुलीनों के नाम एक पत्र दिया। उसे आदेश दिया कि वह अकेला यात्रा करे। वह कश्मीर आया। आदेशा- नुसार पत्र दिया। पत्र में लिखा था-इसे कश्मीर का राज्य दे दिया जाय। कश्मीर के मन्त्रियों तथा कुलीनों ने पत्र पर विचार करने के लिये परिषद् बुलायी। अन्त में निश्चय किया गया कि राजा के आदेशों का पालन किया जाय। हसन लिखता है-राजा हिरन बे औलाद था। इस लिये हकूमत का चिराग बे रौनक रहा। यह देखकर आराकीन सल्तनत महाराज विक्रमाजीत की खिदमत में हाजिर हुए। जो हिन्दुस्तान का ताजदार था। उसने इल्तजा की कि वह सल्तनत कश्मीर अपने कब्ज़ा अकदार में लाये। इसके पहले एक बहुत बड़ा इज़ाज़त केश बरहमन मातृगुप्त जो कश्मीर का था महाराज मजकूर की खिदमत में गया हुआ था। और बादशाह के खास लश्कर में इन्तहाई मुफलिसी की हालत में ज़िन्दगी औकात बसर कर रहा था। एक दिन सरदियों के मौसम में राजा विक्रमा- जीत नींद से जागा। शमा हवा के चलने से गुल हो गयी थी। दरबार के मुलाज़िमों और चौकीदारों को आवाज़ दी। लेकिन वह गुलबा नींद से होशियार न हो सके। मातृगुप्त महलखाना के बाहर बाग़ के सहन में इन्तहाई परेशानी की हालत में बैठा हुआ था। उसने राजा की आवाज़ सुन ली और फौरन राजा की ख़िदमत में हाज़िर हो गया। शमा जलाई और राजा के हुजूर में बारयाबी पाली। राजा ने पूछा-'किस कदर रात बाकी है-?' बरहमन ने कहा-'आध पहर।' राजा ने पूछा 'तुझे कैसे मालूम हुआ कि आध पहर रात बाकी है?' मातृगुप्त ने एक इन्तहाई फ़सीह व बलीग़ फिकरा नज़्म किया हुआ था। जो राजा के सामने पढ़ दिया। "सरदी की शिद्दत से मेरा जिस्म सोभकर लोबिया के दाना की तरह हो गया है। और मेरी आग इस तरह ज़ईफ़ हो गयी है कि सांसों की कसरत से मेरे होंट तड़क गये हैं। और भूख की वजह से मेरा हलक और तालू खुश्क हो गया है। गम और रंज के दरया में डूब गया हूँ। जिसके बाइस नींद मेरी आँखों से इस तरह जाती रही है जिस तरह कोई औरत को बेइज़्ज़त करके निकाल दे। जिस तरह एक बड़े आदमी को जागीर में हो और वह जमीन उससे कम नहीं होती इस तरह यह स्याह रात मुझसे कम नहीं होती।"
तृतीयस्तरंग ४२९ स गम्भीरस्य भूर्भर्तुरनुभावं महाद्भुतम् । विविधास्थानसंवृद्धस्तस्याऽप्यूह्य व्यचिन्तयत् ॥१३०॥ १३०. विविध राज्य सभाओं से सम्बान्धित, उस (कवि) ने उस गम्भीर भूपति के महाद्भुत प्रभाव की कल्पना कर सोचा— सोऽयमासादितः पुण्यैः क्षोणिपालो गुणिप्रियः । परभागोपलम्भाय पूर्वेऽमुष्य महीभुजः ॥१३१॥ १३१. 'गुणी प्रिय इस भूपाल को (पूर्व) पुण्यों से प्राप्त किया है, उससे उत्कृष्ट नृप प्राप्ति हेतु पूर्व नृपों में देखना होगा। राजा फसीह व बलीग श्लोक सुनकर बहुत और हकूमत के सरकरद और अरकान को हस्ब महजूज हुआ और इस बरहमन की परेशान हाली पर मदारज के शुमार सोना और जरकार खिलअते गश्त हैरान हुआ इसके सलामें मुल्क कश्मीर उसे अता की। रिशनादारो और मुअल्लकीन को बेहदतहाई इनाम दिया। उसी वक्त उसने कश्मीर के लोगों के निआमत और मुनासिव और लायक दरजे बख्श कर खत के जवाब में मुन्दरजा जैल खत लिखा। सरबुलन्द किया। और कश्मीर की नफीस चीजो 'मातृगुप्त इस मुल्क की हकूमत पर मा बदौलत में से बहुत से उमदः और लतीफ तोहफे मुहय्या की तरफ से सरफराज किया गया है। उसकी करके राजा विक्रमाजीत की खिदमत में भेजे। अताअत और फर्मा बरदारी अपने ऊपर वाजबी रिआया पर बदल व अहसान की तरफ मुतवज्ज होकर और लाजिम जाने।' अपने मुल्क में जानवरों का कतल बन्द कर दिया। दूसरे दिन बरहमन दरबार में पहुँचा तो राजा ने मुल्क की आमदनी से जो कुछ दिन में जमा होता उसके हाथ में लिफाफा देते हुए कहा कि फौरन था रात को फिकरा और मुसाकीन को बख्श कर कश्मीर जाओ और वहाँ के मतकद्दर लोग तुम्हें इस खजाना खाली कर देता था। चार साल और नव लिफाफा को देखकर शाहनशाह बना देंगे। बरहमन माह की मुद्दत हकूमत का जाम पीकर राजा विक्रमा- ने इन्तहाई मामूली की हालत में राजा का रुक्का जीत के इन्तकाल की खबर सुनी। उसी वक्त अपने हाथ में लिया और कश्मीर की तरफ रवाना सल्तनत तर्क करके इबादत कुबूलियत की। काशो हो गया। जिस वक्त होरापुरा पहुँचा तो वहाँ के के मुल्क को गया। सरदारों के हाथ में महाराजा विक्रमाजीत का फरमान दे दिया। खत पढ़ते ही अमीरों में खुशी पाठभेद : के शादयाने बजाये और मातृगुप्त को लिवास शाही श्लोक संख्या १३० में 'महा' का पाठभेद पहना कर तख्त सल्तनत पर जलवः अफरोज़ किया। 'गुणा' मिलता है। तनकीया—इस मुकाम पर महाराजा विक्रमा- श्लोक संख्या १३१ में 'क्षोणि' का 'क्षोणि' जीत के मुख्तसर हालात तारीखी तफसील को मलहूज़ रखते हुए रदीया करिने किये जाते हैं। तथा 'लम्भाय' का पाठभेद 'रंभाय' मिलता है। मातृगुप्त राजा विक्रमादित्य के हुक्म से पादटिप्पणियाँ : संवत् १३० विक्रमी के हकूमत कश्मीर का तख्त १३१ (१) दूसरे पद का अर्थ वास्तव में यह सर पर रख कर सल्तनत के काम में मशगूल हुआ। प्रतीत होता है मातृगुप्त सोचता है—'अमुष्य पूर्व
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मिलता है। एक मातृगुप्त का उल्लेख अलंकार एवं नाट्य शास्त्र के प्रणेता के रूप में मिलता है। मातृगुप्त को कालिदास मानने में आधुनिक विद्वानों ने असहमति प्रकट की है। बम्बई के प्रसिद्ध विद्वान् डाक्टर भाण्डा जी का मत है कि मातृगुप्त ही कालिदास है। डाक्टर धो. हूरन्ले का मत है कि पुरा कथा विक्रमादित्य के सम्बन्ध में जो कही जाती है वह राजा यशोधर्धन पर लगती है जो वास्तव में हूण विजेता था। प्रोफेसर पाठक भी इस मत का समर्थन करते हैं। कालिदास कृत रघुवंश में रघु के विजय का वर्णन वस्तुतः हूणों के सम्बन्ध में है जो कश्मीर में रहते थे। क्यो कि कालिदास उसी सन्दर्भ में केसर का वर्णन करता है जो केवल भारत में कश्मीर में ही होता है। सम्राट् समुद्रगुप्त ने मातृगुप्त का उल्लेख किया है। मातृगुप्तो जयति यः कविराजो न केवलम् । कश्मीरराजोऽप्यभवत् सरस्वतीप्रसादतः ॥ सम्राट् समुद्रगुप्त का निधन सन् ३६४ ई० में हुआ था। अतएव मातृगुप्त का उसके पूर्व होना निश्चित प्रतीत होता है। भाइने अकबरी के अनुसार मातृगुप्त एक कश्मीरी ब्राह्मण था। राजा विक्रमादित्य उसके गुणों तथा बुद्धिमत्ता से प्रसन्न होकर उसे कुछ द्रव्य देकर कश्मीर भेजा। उसने कश्मीर के मन्त्रियों तथा कुलीनों के नाम एक पत्र दिया। उसे आदेश दिया कि वह अकेला यात्रा करे। वह कश्मीर आया। आदेशा- नुसार पत्र दिया। पत्र में लिखा था-इसे कश्मीर का राज्य दे दिया जाय। कश्मीर के मन्त्रियों तथा कुलीनों ने पत्र पर विचार करने के लिये परिषद् बुलायी। अन्त में निश्चय किया गया कि राजा के आदेशों का पालन किया जाय। हमन लिखता है- राजा हिरन बे औलाद था। इस लिये हुकूमत का चिराग बे रौनक रहा। यह देखकर आराकीन सल्तनत महाराज विक्रमाजीत की खिदमत में हाज़िर हुए। जो हिन्दुस्तान का ताजदार था। उसने इल्तजा की कि वह सल्तनत कश्मीर अपने कब्ज़ा अकदार मे लाये। इसके पहले एक बहुत बड़ा इजाज़त केश बरहमन मातृगुप्त जो कश्मीर का था महाराज मज़कूर को खिदमत में गया हुआ था। और बादशाह के खास लश्कर में इन्तहाई मुफ़लिसी की हालत में ज़िन्दगी औकात बसर कर रहा था। एक दिन सरदियो के मोसम में राजा विक्रमा- जीत नींद से जागा। शमा हवा के चलने से गुल हो गयी थी। दरबार के मुलाजिमों घोर चौकीदारो को आवाज़ दी। लेकिन वह ग़लबा नींद से होशियार न हो सके। मातृगुप्त महलखाना के बाहर बाग के सहन में इन्तहाई परेशानी की हालत में बैठा हुआ था। उसने राजा की आवाज़ सुन ली और फ़ौरन राजा की ख़िदमत में हाज़िर हो गया। शमा जलाई और राजा के हुजूर में कामयाबो पाली। राजा ने पूछा-'किस कदर रात बाकी है-?' बरहमन ने कहा- 'आध पहर।' राजा ने पूछा 'तुझे कैसे मालूम हुआ कि आध पहर रात बाकी है?' मातृगुप्त ने एक इन्तहाई फ़सीह व बलीग फ़िक़रा नज़्म किया हुआ था। जो राजा के सामने पढ़ दिया। "सरदी की शिद्दत से मेरा जिस्म सीझकर लोविया के दाना की तरह हो गया है। और मेरी आग इस तरह ज़ईफ़ हो गयी है कि साँसों की कसरत से मेरे होंट तड़क गये हैं। और भूख की वजह से मेरा हलक़ और तालू खुश्क हो गया है। ग़म और रंज के दरया में डूब गया हूँ। जिसके बाअस नींद मेरी आँखों से इस तरह जाती रही है जिस तरह कोई औरत को बेइज्ज़त करके निकाल दे। जिस तरह एक बड़े आदमी को जागीर में हो और वह जमीन उगमे कम नहीं होती इस तरह यह स्याह रात मुझसे कम नही होती।"
तृतीयस्तरंग ४९९ स गम्भीरस्य भर्त्तुस्तनुभावं महाद्भुतम् । विविधास्थानसंवृद्धस्तस्याऽभूच्च व्यचिन्तयत् ॥१३०॥ १३०. विविध राज्य सभाओं से सम्बान्धत, उस (कवि) ने उस गम्भीर भूपति के महाद्भुत प्रभाव की कल्पना कर सोचा— सोऽयमासादितः पुण्यैः क्षोणिपालो गुणिप्रियः । परभागोपलम्भाय पूर्वेऽमुष्य महीभुजः ॥१३१॥ १३१. 'गुणो प्रिय इस भूपाल को (पूर्व) पुण्यों से प्राप्त किया है, उससे उत्कृष्ट नृप प्राप्ति हेतु पूर्व नृपों में देखना होगा।
राजा फसीह व बलीग श्लोक सुनकर बहुत महजूज हुआ और इस बरहमन की परेशान हाली पर बहुत हैरान हुआ इसके सिलामें मुल्क कश्मीर उसे इनाम दिया। उसी वक्त उसने कश्मीर के लोगों के ख़त के जवाब में मुन्दरजा जैल ख़त लिखा । 'मातृगुप्त इस मुल्क की हकूमत पर मा बदौलत की तरफ़ से सरफ़राज़ किया गया है। उसकी अताअत और फ़रमाँ बरदारी अपने ऊपर याजबी और लाजिम जाने।' दूसरे दिन बरहमन दरबार में पहुँचा तो राजा ने उसके हाथ में लिफ़ाफ़ा देते हुए कहा कि फौरन कश्मीर जाओ और वहाँ के मोतबर लोग तुम्हें इस लिफ़ाफ़ा को देखकर शाहनशाह बना देंगे। बरहमन ने इन्तहाई मामूली की हालत में राजा का रुक्का अपने हाथ में लिया और कश्मीर की तरफ रवाना हो गया। जिस वक्त हीरापुरा पहुँचा तो वहाँ के सरदारों के हाथ में महाराजा विक्रमाजीत का फ़रमान दे दिया। ख़त पढ़ते ही अमीरों में खुशी के शादयाने बजाये और मातृगुप्त को लिवास शाही पहना कर तख्त सल्तनत पर जलवः अफ़रोज़ किया। तनवीया—इस मुकाम पर महाराजा विक्रमा- जीत के मुख़्तसर हालात तारीखी तफ़सील को मलहूज़ रखते हुए रदीया करिन्दे किये जाते हैं। मातृगुप्त राजा विक्रमादित्य के हुक्म से संवत् १३० विक्रमी के हकूमत कश्मीर का तख्त सर पर रख कर सल्तनत के काम में मशगूल हुआ। और हकूमत के सरकरद और अरकान को हस्व मदारज के शुमार सोभा और जरकार खिलअते अता की। रिश्तेदारों और मुसल्लकीन को बेहन्तहाई निआमत और मुनासिव और लायक दरजे बख्श कर सरबुलन्द किया। और कश्मीर की नफ़ीस चीजों में से बहुत से उमदः और लतीफ तोहफ़े, मुहय्या करके राजा विक्रमाजीत की खिदमत मे भेजे। रिआया पर अदल व अहसान की तरफ मुतबज़ा होकर अपने मुल्क में जानवरों का कत्ल बन्द कर दिया। मुल्क की आमदनी से जो कुछ दिन में जमा होता था रात को फिक़रा और मुसाकीन को बख्श कर खज़ाना खाली कर देता था। चार साल और नव माह की मुद्दत हकूमत का जाम पीकर राजा विक्रमा- जीत के इन्तकाल की खबर सुनी। उसी वक्त सल्तनत तर्क करके इबादत कबूलियत की। काशी के मुल्क को गया।
पाठभेद : श्लोक संख्या १३० में 'महा' का पाठभेद 'गुणा' मिलता है। श्लोक संख्या १३१ में 'क्षोणि' का 'शोणि' तथा 'लम्भाय' का पाठभेद 'रंभाय' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १३१ (१) दूसरे पद का अर्थ वास्तव में यह प्रतीत होता है मातृगुप्त सोचता है—'अमुष्य पूर्व
५०० राजतरंगिणी यस्मिन् राजनि तत्त्वज्ञैः सूरिभिः संभृतश्रुतैः । नाञ्जलिर्दीयते जातु मानाय च गुणाय च ॥१३२॥ १३२. 'जिस राजा को तत्त्व वेत्ताओं, विद्वज्जनों एवं शास्त्रज्ञों को समादर तथा गुण हेतु कभी अञ्जलि नहीं देनी पड़ती । भङ्गयाऽमुष्मिन्विदधती स्वाभिप्रायप्रकाशनम् । वैदग्ध्यवन्ध्यतां नैति बुद्धिः कुलवधूरिव ॥१३३॥ १३३. 'इस राजा से भङ्गिमा विशेष द्वारा स्वाभिप्राय प्रकाशन में बुद्धि कुल वधू तुल्य वैदग्ध्य रहित नहीं होती। खिलीकृतखलालापे युक्तायुक्तविवेक्तरि । नायाति सेव्यमानेऽस्मिन्स्वगुणोऽनर्थकारिताम् ॥१३४॥ १३४. 'खलों के निस्सारता को जानने वाले युक्तायुक्त विवेकी, इस नृप की सेवा में स्वगुण अनर्थकारी नहीं होते । अनाप्नुवद्भिः सावद्यदुविद्यसमशीर्षिकाम् । जीवन्मरणमस्याग्रे गुणिभिर्नानुभूयते ॥१३५॥ १३५. 'इसके सम्मुख दुर्विद्य एवं निन्य मूर्ख जनों की तुल्य कोटि में विद्वान् नहीं आते थे । अतएव उन्हें जीवित मरण का अनुभव नहीं होता था । संभावनानुसारेण प्रवृत्तोऽस्माद्विवेकिनः । शोच्यते नाञ्चितोच्छ्वासं प्रीतिदायो महाशयैः ॥१३६॥ १३६. 'संभावना अनुसार प्रवृत्त प्रीतिदायी, उस विवेकी के कारण, महाशयों द्वारा उष्णोच्छ्वास पूर्वक शोचनीय नहीं होता था ।' महीभुजा.'—इसके पूर्व के नृप 'परभागोपलम्भाय' अर्थात् इस राजा को उत्कृष्टता सिद्धि हेतु हुए । मातृ- गुप्त प्रतीत होता है अनेक राजाओ के यहाँ गया था किन्तु उसे केवल विक्रमादित्य हर्ष ही उत्कृष्ट प्रतीत हुआ । पाठभेद : श्लोकसंख्या १३२ में 'यस्मिन्' का पाठभेद 'महिम्न्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १३६ (१) श्री रणजीत सीताराम पण्डित के अनुसार इस पद का तात्पर्य यह प्रतीत होता है कि विद्वान् निम्न गुणों के व्यक्तियो का आदर होते देखकर ईर्ष्या नहीं करते थे । इसका एक भावात्मक अर्थ हो सकता है—विवेकी भूपति योग्यता अनुसार परितोषिक प्रदान करना कह कर सदाशय जनगण के दीर्घ निश्वास परित्याग पूर्वक शोक प्रकाश नही करने देता था ।
तृतीय तरंग ५०१ गृह्णन्यथागुणं स्वान्तमुचितप्रतिपत्तिभिः । अन्तरज्ञः समस्तानायमयुत्साहवर्धनः ॥१३७॥ १३७. 'तारतम्यवेत्ता उत्साह वर्धक यह (नृप) उचित प्रमाण द्वारा गुणानुसार सबको अन्तःकरण में ग्रहण कर समादृत करता था । सेवया दृष्टकष्टस्य दाक्षिण्योत्पादने श्रमः । अस्य यो न स भृत्यानां हिमाद्रौ हिमविक्रयः ॥१३८॥ १३८. 'कष्ट विज्ञ इस राजा की सेवा हित, शिष्टाचार सम्पादन में हुआ, भृत्यों का श्रम, हिमाद्रि पर, हिम विक्रय¹ तुल्य व्यर्थ नहीं जाता था । मिथ्याख्यातगुणो नाप्तो नामात्यः कलहप्रियः । असत्यसंघः स्थेयो वा नास्थानेऽस्य महीपतेः ॥१३९॥ १३९. 'उस राजा की सभा में मिथ्या प्रशंसित आप्त पुरुष, कलह प्रिय अमात्य तथा असत्यसंघ स्थेय नहीं थे । अश्लीलालापिनोऽन्योन्यं नमोक्त्या मर्मभेदिनः । अन्यप्रवेशासहनाः संहता¹ नास्य सेवकाः ॥१४०॥ १४०. 'अश्लील आलाप करने वाले, परस्पर नमोक्ति द्वारा मर्म भेदी अन्य का प्रवेश न सहने वाले, उसके सेवक नहीं थे । छन्दानुवर्तिनामेष निजविज्ञानवन्दिनाम् । सर्वज्ञंमन्यतान्धानां मुखप्रेक्षी न पार्थिवः ॥१४१॥ १४१. 'यह नृप छन्दानुवर्तियों, प्रशंसकों, एवं सर्वज्ञंमन्यता से अन्धों का मुख देखने वाला नहीं है । पाठभेद : है । वामन ६:५५; २४:१०; २६:१५; २८:११; श्लोकसंख्या १३७ में 'स्वान्त' का 'शान्त' तथा ३२:८५-८७; ३८:४९; ५०:१४, २५; तथा 'स्वान्त' पाठभेद मिलता है । ५५:५७ । पाठभेद : पादटिप्पणियाँ : श्लोक संख्या १४० में 'नमोक्त्या' का पाठ- १३८ (१) हिमाद्रि पर जहाँ चारो ओर हिमा- भेद 'नर्मोक्त्या' मिलता है । च्छादित भूमि तथा शिखर हैं वहा हिम का विक्रय उसी प्रकार व्यर्थ होगा जैसा रानीगंज तथा झरिया के पादटिप्पणियाँ : कोयले की खानो में कोयला का विक्रय हेतु ले जाना । १४० ( १ ) संहत : दलबन्दी अथवा परस्पर वामन पुराण में हिमाद्रि तथा हिमवत् शब्दों स्वार्थ हेतु टकराते हुए सेवकों के अर्थ में यह शब्द का प्रयोग हिमालय के लिये बहुत किया गया आया है ।
५०२ राजतरंगिणी अनेन सह संजातः संलापो विपुलोदयः । लभ्यते नान्तरा छेत्तुं दुर्जातैर्जातु दुर्जनैः ॥१४२॥ १४२. 'दुर्जात दुर्जनों के लिये दूसरे के साथ किये गये, विपुलोदय युक्त संलाप के बीच में काटने का अवसर नहीं है। सर्वदोषोज्झितं सेव्यं नृपमेवामिमं मम । समासादयतः पुण्यैर्दूरे स्वार्थसिद्धयः ॥१४३॥ १४३. 'निर्दोष एवं सेव्य इस नृप को पुण्यों से प्राप्त करने वाले मेरी स्वार्थ सिद्धियाँ निकट हैं। गम्भीरश्च गुणज्ञश्च स्थिरबुद्धिश्च पार्थिवः । एष क्लेशभयं त्यक्त्वा निषेव्यः प्रतिभाति मे ॥१४४॥ १४४. 'गम्भीर, गुणज्ञ, तथा स्थिर बुद्धि यह नृप क्लेश भय त्यागकर, मुझे सेवनीय प्रतीत होता है। न चास्माद्धनमादाय रञ्जितादन्यराजवत् । भ्राम्यतो भूतलेऽमुष्मिन्सेव्योऽन्यः प्रतिभाति मे ॥१४५॥ १४५. 'प्रसन्न इस नृप से अन्य राजाओं के समान धन लेकर, इस भूतल पर भ्रमण करते, मुझे अन्य (नृप) सेव्य प्रतीत नहीं होते।' इति संचिन्त्य सुदृढं स नवामिव तां सभाम् । नारञ्जयन्न चास्ते स्म गुणिगोष्ठीषु मध्यगः ॥१४६॥ १४६. इस प्रकार दृढ़ता पूर्वक चिन्तन कर मध्यस्थित उसने उस सभा को नवीन तुल्य रंजित तथा गुणियों की गोष्ठी में हस्त क्षेप नहीं किया। मृदुपूवै गुणान्नेव दर्शयन्तं विशां पतिः । विशिष्टयोग्यतारूप्यं विवेदाराधनोन्मुखम् ॥१४७॥ १४७. विशांपति¹ ने विशिष्ट योग्यता ज्ञापन हेतु विनय पूर्वक गुणों को ही प्रदर्शित करते (उस मातृगुप्त को) आराधनोन्मुख जाना। भेद : श्लोक संख्या १४६ में 'नारञ्जयन्न' का पाठ १. श्लोक संख्या १४४ में 'क्लेश' का पाठभेद भेद 'नानुरञ्जयन्न' तथा 'नारञ्जयन्न' मिलता है। पाठभेता है। श्लोक संख्या १४७ में 'नेव' का 'नैवं' तथा २. श्लोक संख्या १४५ में 'न चास्मा' का 'न चास्य' 'पति.' का पाठभेद 'पतिम्' मिलता है। 'अस्मिन्' मिलता है। तथा 'भ्राम्यतो' का पाठभेद 'भ्राम्यते' पादटिप्पणियां : १४७ (१) विशांपति : यहाँ पर विशांपति शब्द राजा के अर्थ में कल्हण ने प्रयुक्त किया है।
तृतीय तरंग ५०३ अचिन्तयच्च नायं स्याद्गुणिमात्रं महाशयः । उदात्तं सत्क्रियार्हत्वं वदत्यस्य गभीरता ॥१४८॥ १४८. महाशय (नृप) ने चिन्तन किया—'यह केवल गुणी ही नहीं है, क्योंकि इसकी गम्भीरता उदात्त सत्कार योग्यता को सूचित करती है।' इति संचिन्त्य राजाऽपि ज्ञातुं तस्यान्तरं मतेः । नाक्रियन्त परीक्षार्थं यथावल्लाभसत्क्रियाः ॥१४६॥ १४९. ऐसा चिन्तनकर, राजा ने उसकी आन्तरिक मति जानने की इच्छा से, परीक्षा हेतु उसका यथावत् उचित लाभ सत्कार नहीं किया । स तेनानुपचारेण तमुदात्ताशयं नृपम् । स्वीकर्त्तारं विदन्धीमान्त्सिषेवेँ प्रीतिमाश्रितः ॥१५०॥ १५०. उस बुद्धिमान् ने उदात्ताशय नृप के उस अनौपचारिक व्यवहार से अपने को स्वीकृत समझ, प्रसन्न होकर, सेवा करने लगा । क्रमोपचीयमानेन' सेवाभ्यासेन धीमतः । तस्य नोद्वेगमगमत्स्वकाय इव पार्थिवः ॥ १५१ ॥ १५१. उस बुद्धिमान् के क्रम प्रवृद्ध सेवाभ्यास के कारण राजा को अपने शरीर के समान उद्वेग नहीं हुआ । नातीव स्वल्पया स्थित्या नातीवाऽप्यथ दीर्घया । शरन्निशाक्षणेनेव राजा निन्ये प्रसन्नताम् ॥ १५२ ॥ १५२. उसने राजा को अपनी नात्यन्त स्वल्प एवं नात्यन्त दीर्घ स्थिति से शारदीय निशा काल सदृश प्रसन्न किया ।' नर्मभिर्गर्भचेटानां द्वाःस्थानां विक्रियाक्रमैः । मिथ्यास्तवैर्विटानां च न स क्षोभमनीयत ॥ १५३ ॥ १५३. अन्तः पुरस्थ भृत्यों की नमोक्तियों, द्वारपालों के विक्रिया कर्मों (कुत्सित व्यव- हारों) एवं विटों की मिथ्या स्तुतियों द्वारा वह क्षुब्ध नहीं हुआ । विशां शब्द एतरेय ब्राह्मण (८:२६) में—'राष्ट्राणि १५१ (१) बाण ने हर्षचरित में इसी प्रकार वै विशः' यजुर्वेद (२०:९) में—'विशि राज- की शब्दावली का प्रयोग किया है-'क्रमोपचीयमान। प्रतिष्ठितः' अथर्ववेद (३:४:२) में 'त्वां विशो वृणता राज्याय' (४:८ ४ में) 'विशस्त्वं सर्वा वाञ्छन्तु' १५२ (१) इस पद का भावात्मक अर्थ लोक, जनता किंवा प्रजा के लिये आया है विश यह भी प्रतीत होता है—'उसने अपनी सम स्थिति का पति राजतन्त्र में राजा होता और गणतन्त्र में से नृप को वैसे ही प्रसन्न किया जिस प्रकार शरद् राष्ट्रपति होता है। काल करता है।'
५०४ राजतरंगिणी प्रसन्नालापसंप्राप्तौ छायाग्रह इवाचलः । प्रतिस्पर्धीव च क्रुध्यन्नावज्ञायामभूत्प्रभोः ॥ १५४ ॥ १५४. प्रभु के प्रसन्नता पूर्ण आलाप की संप्राप्ति में छाया ग्रह तुल्य अचल रहता और उनकी अवज्ञा से प्रतिस्पर्धी की तरह क्रुद्ध नहीं होता था । वीक्षणं राजदासीनां राजद्विष्टैः सहासनम् । राजाग्रे च कथां नीचैः कालविन्नाचचार सः ॥ १५५ ॥ १५५. काल विज्ञ वह राजदासियों का अवलोकन, राजद्रोहियों के साथ आसन, एवं राजा के सम्मुख निम्नस्तरीय जनों से वार्तालाप नहीं करता था । स्वभावाद्वाजपुरुषैः सज्जनै राजनिन्दकैः । नास्मात्प्रभोरुपालम्भो लेभे पैशुन्यजीविभिः ॥ १५६ ॥ १५६. स्वभाव से नृप के विश्वस्त राजनिन्दक गुप्तचरों ने इसके द्वारा प्रभु का उप लम्भ (निन्दा) नहीं प्राप्त की (सुनी)। वदद्भिस्त्वादरात्तस्यै वैफल्याद्यन्वहं प्रभोः । निन्ये नोत्साहशैथिल्यं सेवोत्साहासहिष्णुभिः ॥ १५७ ॥ १५७. उसके सेवा उत्साह को न सहने वाले सेवको प्रति दिन आदर पूर्वक “प्रभु की सेवा विफल है” आदि कहकर भी (उसके) सेवा उत्साह को शिथिल नहीं कर सके । अन्योत्कर्षानपि वदन्प्रसङ्गेन निराग्रहः । स्वविद्याद्योतकः सोऽभूत्सभ्यानां हृदयंगमः ॥ १५८ ॥ १५८. कथा प्रसंग में अन्योत्कर्ष को कहते हुए भी, आग्रह रहित एवं विद्या प्रकाशक उसे सभ्य¹ जनों ने हृदयंगम किया ।
दूसरा भावार्थ यह भी हो सकता है—'शारदीय निशा तुल्य वह भूपति के समीप अल्पतरकाल अथवा सुदीर्घ समय अवस्थान न कर राजा को प्रसन्न किया । पाठभेद : श्लोक संख्या १५७ में 'तोत्साह' का पाठभेद 'सोत्साह' मिलता है । श्लोक संख्या १५८ में 'सभ्याना' का पाठभेद 'सत्याना' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १५८ (१) सभ्य : सभा के सदस्य को सभ्य कहते थे । विक्रमादित्य की सभा में नवरत्नों का होना कहा जाता है। उनमें महाकवि कालिदास एक थे । कालान्तर में सभा शब्द का प्रयोग खुली सार्वजनिक सभा के लिये होने लगा । भिक्षाचर ने (त० ८.९१२) श्रीनगर के नागरिकों को सभा बुलायी थी ।
तृतीय तरंग ५०५ एवं स सेवमानस्तमुद्योगेन बलीयसा । अनिर्विण्णो मातृगुप्तः षड्ऋतूनत्यवाहयत् ॥ १५९ ॥ १५९. तत्परता पूर्वक अत्यधिक उसकी सेवा करने और बिना खिन्न हुए, मातृ- गुप्त ने छः ऋतुओं को व्यतीत किया । अथ तं कृशसर्वाङ्गं धूसरं जीर्णवाससम् । वहिर्जातु विनिर्यातो राजा वीक्ष्य व्यचिन्तयत् ॥ १६० ॥ १६०. बाहर जाते हुए राजा ने कदाचित् सर्वांग कृश, धूलि धूसर, जीर्ण वस्त्र युक्त उसे देखकर, चिन्तन किया— वैदेशिको निराशरणो गुणवान्बान्धवोज्झितः । दार्थ्यं जिज्ञासुना कष्टं सोऽयमायासितो मया ॥ १६१ ॥ १६१. 'इसकी दृढ़ता की जिज्ञासा में विदेशी निःशरण गुणवान बान्धव हीन इसे कष्ट पहुँचाया । कोऽस्याश्रयः किमशनं कानि प्रावरणानि वा । इत्यैश्वर्यविमूढेन मया हन्त न चिन्तितम् ॥ १६२ ॥ १६२. खेद है कि, (हन्त) ऐश्वर्य मूढ़ मैंने यह भी नहीं चिन्तन किया कि इसका कौन आश्रय है, क्या भोजन है और क्या वसन है । वसन्तेनेव न मया शोभयाऽद्यापि योजितः । शीतवातातपैः शुष्यन्सोऽयं पुरुषपादपः ॥ १६३ ॥ १६३. मैंने वसन्त के समान शीत, वात, एवं आतप से शुष्क कर इस पुरुष पादप को आज भी शोभा से युक्त नहीं किया । अस्य ग्लानस्य भैषज्यं निर्विण्णस्य विनोदनम् । श्रान्तस्य वा क्लमच्छेदं को विदध्यादसम्पदः ॥ १६४ ॥ १६४. 'इस निर्धन ग्लान का भैषज्य, खिन्न का विनोदन एवं श्रान्त का क्लमच्छेद कौन करे ? नास्मै चिन्तामणिं दद्यां नामृतं वा निषेवितः । मया यदयमेतावद्व्यामूढेन परीक्ष्यते ॥ १६५ ॥ १६५. सेवित होकर इसे चिन्तामणि अथवा अमृत तो नहीं दे दूँगा, जो कि मूढ़ मैं इसकी इतनी परीक्षा लेता हूँ । पाठभेद : श्लोक संख्या १६१ में 'यासितो' का पाठभेद 'वासितो' मिलता है । श्लोक संख्या १५९ में 'अनिर्विण्णो' का पाठभेद श्लोक संख्या १६५ में का 'दद्यां' पाठभेद 'अनिर्विग्नो' मिलता है । 'दध्या' मिलता है । ६४
५०६ राजतरंगिणी तदमुष्य गुणित्वस्य तीव्रसेवाश्रमस्य च । प्रतिपत्या कतमया तावदानृण्यमाप्नुयाम् ॥ १६६ ॥ १६६. 'तीव्र सेवाश्रमी एवं गुणी इससे मैं किस समादर द्वारा उऋणता प्राप्त कर सकता हूँ ?' इति चिन्तयतस्तस्य राज्ञस्तं सेवकं प्रति । स्वप्रसादोचिता काचित्प्रत्यभाद्वैन सत्क्रिया ॥ १६७ ॥ १६७. इस प्रकार चिन्ता करते उस नृपति को उस सेवक के प्रति स्वप्रसादोचित कोई सत्कार नहीं प्रतीत हुआ । ततः प्रावर्तत स्फारनीहारलववाहिभिः । दहन्निवाङ्गं प्रालेयपवमानैर्हिमागमः ॥ १६८ ॥ १६८. तदनन्तर प्रचुर नीहारकणवाही हिम वायु से युक्त हिमागम (शिशिर) अंग को दग्ध सा करता (हुआ) आया ! संततध्वान्तमिषतस्तीव्रशीतवशीकृताः । आशाश्चकाशिरे नीलनिचोलाच्छादिता इव ॥ १६९ ॥ १६९. तीव्र शीत से विवश दिशायें निरन्तर (घने) अन्धकार के व्याज से नील निचोल से आच्छादित तुल्य शोभित हुईं । शीतार्त्या द्युमणावोर्वदहनोष्माभिलाषतः । द्रुतं यातीव जलधिं दिनानि लघुतां ययुः ॥ १७० ॥ १७०. शीत त्रास के कारण मानो बड़वाग्नि ऊष्मा की अभिलाषा से, सूर्य के शीघ्र जलनिधि गमन करने पर, दिन छोटे होने लगे । अथ दीपोज्ज्वले धाम्नि लसद्दीप्तहसन्तिके । कदाचिन्न्नृपतिर्देवादर्धरात्रे व्यबुध्यत ॥ १७१ ॥ १७१. किसी समय जब दीप से प्रकाशित गृह में प्रज्वलित अंगारधानी (हसन्ती) शोभित हो रही थी—राजा अकस्मात् (दैवात्) अर्धरात्रि में प्रबुद्ध हुआ । स हेमन्तानिलैर्भूरिझांकारपरुषैः पुरः । दीपान्प्रकम्पितानीषत्प्रविष्टैर्धाम्नि दृष्टवान् ॥ १७२ ॥ १७२. उसने गृह में प्रविष्ट प्रभूत झांकार¹ ध्वनि से परुष, हेमन्त कालीन वायु से प्रकम्पित दीप सामने देखा । श्लोक संख्या १६६ में 'नुयाम्' का पाठभेद पादटिप्पणियाँ : 'नुयात्' मिलता है । श्लोक संख्या १७१ में हसन्तिका' का पाठभेद १७२ (१) झांकार : इस शब्द का उल्लेख 'मासान्तिका' मिलता है । कल्हण ने पुनः तरंग ८.१५३ में किया है।
तृतीय-तरंग ५०५ तानुज्ज्वलयितु भृत्यानन्विष्यन्नभ्यभाषत । यामिकेषु बहिः सङ्गः को वर्तत इति स्फुटम् ॥ १७३ ॥ १७३. तदनन्तर उन्हें प्रज्वलित करने के लिये भृत्यों को खोजते हुए सुस्पष्ट कहा— "बाहर यामिक" में कौन उपस्थित है ?" सुखसुप्तेषु सर्वेषु बाह्यकक्ष्यान्तरात्सतः । राजन्यहमहं मातृगुप्त इत्यशृणोद्वचः ॥ १७४ ॥ १७४. उस समय सभी लोग सुख पूर्वक सुप्त थे। बाह्य कक्ष में से—"राजन् ! मैं मातृगुप्त हूँ" यह वाणी (राजा ने) सुनी। प्रविशेति स्वयं राज्ञा दत्तानुज्ञस्ततो गृहम् । लक्ष्मीसांनिध्यरम्यं तददृष्टोऽन्यैर्विवेश सः ॥ १७५ ॥ १७५. राजा के स्वयं यह आज्ञा देने पर 'प्रवेश करो'—बिना दूसरे के ज्ञात हुये, गृह में प्रवेश किया। दीपानुज्ज्वलयेत्युक्तो निष्पाद्य चतुरैः पदैः । बहिर्यासासुरुचेऽथ क्षणं तिष्ठेति भूभुजा ॥ १७६ ॥ १७६. 'दीपों को जलाओं'—कहे जाने पर, निष्पादित करके (दीप जलाकर) चार पद बाहर जाने पर राजा ने उससे कहा, —'क्षण भर रुको'। स भयद्विगुणीभूतशीतकम्पः प्रभोः पुरः । किंस्विद्वक्तीति विमृशन्नातिदूरेऽभ्युपाविशत् ॥ १७७ ॥ १७७. भय से उस (मातृगुप्त) का शीत कम्पन द्विगुणित हो गया। 'वह क्या कहेंगे।' विचार करते प्रभु के सम्मुख न अति दूर बैठ गया। अथ पप्रच्छ भूपालः कियत्यस्ति निशेति तम् । सोऽभ्यधादेव यामिन्या यामः सार्धोऽवशिष्यते ॥ १७८ ॥ १७८. राजा ने उससे पूछा—'कितनी रात्रि शेष है ?' उसने कहा—'यामिनी का डेढ़ याम (डेढ प्रहर) अवशिष्ट है।' १७३ (१) यामिक : याम का अर्थ रात्रि 'यंयो स ऊचेय', तथा 'यियासुरूचे च' मिलता है। तथा प्रहर दोनों होता है। रात्रि में पहरा देने वालो श्लोक संख्या १७१ में 'भय' का पाठभेद 'मय' को यामिक कहा जाता है। मिलता है। पाठभेद : पादटिप्पणियाँ : श्लोक संख्या १७५ में 'दृष्टो' का पाठभेद १७७ ( १ ) बैठ गया : यहाँ पर कल्हण ने 'पृष्टो' मिलता है। 'उपाविशत्' शब्द का प्रयोग किया है। इसका अर्थ बैठना होता है। अन्य अनुवादकर्ताओं ने 'वह श्लोकसंख्या १७६ में 'यियासुरूचेऽथ' का पाठभेद खड़ा हो गया' अर्थ किया है।
५०६ राजतरंगिणी तदमुष्य गुणित्वस्य तीव्रसेवाश्रमस्य च। प्रतिपत्त्या कतमया तावदानृण्यमाप्नुयाम् ॥ १६६ ॥ १६६. 'तीव्र सेवाश्रमी एवं गुणी इससे मैं किस समादर द्वारा उऋणता प्राप्त कर सकता हूँ ?' इति चिन्तयतस्तस्य राज्ञस्तं सेवकं प्रति । स्वप्रसादोचिता काचित्प्रत्यभान्नैव सत्क्रिया ॥ १६७ ॥ १६७. इस प्रकार चिन्ता करते उस नृपति को उस सेवक के प्रति स्वप्रसादोचित कोई सत्कार नहीं प्रतीत हुआ । ततः प्रावर्तत स्फारनीहारलववाहिभिः । दहन्निवाङ्गं प्रालेयपवमानैर्हिमागमः ॥ १६८ ॥ १६८. तदनन्तर प्रचुर नीहारकणवाही हिम वायु से युक्त हिमागम (शिशिर) अंग को दग्ध सा करता (हुआ) आया । संततध्वान्तमिषतस्तीव्रशीतवशीकृताः । आशाश्चकाशिरे नीलनिचोलाच्छादिता इव ॥ १६६ ॥ १६९. तीव्र शीत से विवश दिशायें निरन्तर (घने) अन्धकार के व्याज से नील निचोल से आच्छादित तुल्य शोभित हुईं । शीतार्त्या द्युमणावौर्वदहनोष्मभिलाषतः । द्रुतं यातीव जलधिं दिनानि लघुतां ययुः ॥ १७० ॥ १७०. शीत त्रास के कारण मानो बड़वाग्नि ऊष्मा की अभिलाषा से, सूर्य के शीघ्र जलनिधि गमन करने पर, दिन छोटे होने लगे । अथ दीपोज्ज्वले धाम्नि लसद्धीपहसन्तिके । कदाचिन्भूपतिर्दैवादर्धरात्रे व्यबुध्यत ॥ १७१ ॥ १७१. किसी समय जब दीप से प्रकाशित गृह में प्रज्वलित अंगारधानी (हसन्ती) शोभित हो रही थी—राजा अकस्मात् (दैवात्) अर्धरात्रि में प्रबुद्ध हुआ । स हेमन्तानिलैर्भूरिझांकारपरुषैः पुरः । दीपान्प्रकम्पितानीषत्प्रविष्टैर्धाग्नि दृष्टवान् ॥ १७२ ॥ १७२. उसने गृह में प्रविष्ट प्रभूत झांकार१ ध्वनि से परुष, हेमन्त कालीन वायु से प्रकम्पित दीप सामने देखा । श्लोक संख्या १६६ में 'प्नुयाम्' का पाठभेद पादटिप्पणियाँ : 'प्नुयात्' मिलना है। श्लोक संख्या १७१ में हसन्तिका' का पाठभेद १७२ (१) झांकार : इस शब्द का उल्लेख 'मानाग्निका' मिलता है। कल्हण ने पुनः तरंग ८.१५३ में किया है।
तृतीय तरंग ५०७ तानुज्ज्वलयितु भृत्यानन्विष्यन्नभ्यधात्ततः । यामिकेषु बहिः सञ्जः को वर्तत इति स्फुटम् ॥ १७३ ॥ १७३. तदनन्तर उन्हें प्रज्वलित करने के लिये भृत्यों को खोजते हुए सुस्पष्ट कहा— “बाहर यामिक¹ में कौन उपस्थित है ?” सुखसुप्तेषु सर्वेषु बाह्यकक्ष्यान्तरात्ततः । राजनयमहं मातृगुप्त इत्यशृणोद्वचः ॥ १७४ ॥ १७४. उस समय सभी लोग सुख पूर्वक सुप्त थे। बाह्य कक्ष में से—“राजन् ! मैं मातृगुप्त हूँ” यह वाणी ( राजा ने ) सुनी । प्रविशेति स्वयं राज्ञा दत्तानुज्ञस्ततो गृहम् । लक्ष्मीसांनिध्यरम्यं तददृष्टोऽन्यैर्विवेश सः ॥ १७५ ॥ १७५. राजा के स्वयं यह आज्ञा देने पर 'प्रवेश करो'— बिना दूसरे के ज्ञात हुये, गृह में प्रवेश किया । दीपानुज्ज्वलयेत्युक्तो निष्पाद्य चतुरः पदैः । बहिर्यायाशुरुचेऽथ क्षणं तिष्ठेति भूभुजा ॥ १७६ ॥ १७६. 'दीपों को जलाओं'— कहे जाने पर, निष्पादित करके ( दीप जलाकर ) चार पद बाहर जाने पर राजा ने उससे कहा, —'क्षण भर रुको' । स भयद्विगुणीभूतशीतकम्पः प्रभोः पुरः । किंस्विद्वक्तीति विमृशन्नातिदूरेऽभ्युपाविशत् ॥ १७७ ॥ १७७. भय से उस ( मातृगुप्त ) का शीत कम्पन द्विगुणित हो गया । 'वह क्या कहेंगे ।' विचार करते प्रभु के सम्मुख न अति दूर बैठ गया¹ । अथ पप्रच्छ भूपालः कियत्यस्ति निशेति तम् । सोऽभ्यधादेव यामिन्या यामः सार्धोऽवशिष्यते ॥ १७८ ॥ १७८. राजा ने उससे पूछा— 'कितनी रात्रि शेष है ?' उसने कहा— 'यामिनी का डेढ़ याम ( डेढ़ प्रहर ) अवशिष्ट है ।' १७३ ( १ ) यामिक : याम का अर्थ रात्रि 'र्ययो स ऊचेय', तथा 'यियासुरुच्चे च' मिलता है । तथा प्रहर दोनो होता है । रात्रि मे पहरा देने वालों श्लोक संख्या १७७ में 'भय' का पाठभेद 'मय' को यामिक कहा जाता है । मिलता है । पाठभेद : पादटिप्पणियाँ : श्लोक संख्या १७५ में 'दृष्टो' का पाठभेद १७७ ( १ ) बैठ गया : यहाँ पर कल्हण ने 'पृष्टो' मिलता है । 'उपाविशत्' शब्द का प्रयोग किया है । इसका अर्थ बैठना होता है । अन्य अनुवादकर्ताओं ने 'वह श्लोकसंख्या १७६ मे 'यियासुरुचेऽथ' का पाठभेद खड़ा हो गया' अर्थ किया है ।
५०८ राजतरंगिणी ततो भूभृदुवाचैनं कथं सम्यङ्निशाक्षणः । त्वयाऽवधारितो निद्रा कथं नाभूच्च ते निशि ॥ १७६ ॥ १७९. तदुपरान्त राजा उससे बोले- 'तुमने सम्यक् निशा क्षण कैसे जाना ? तुम्हें रात्रिमें निद्रा क्यों नहीं आयी ? अथ कृत्वा क्षणाच्छ्लोकमेतं तं स व्यजिज्ञपत् । अवस्थावेदनादाशां दैन्यं वा त्यक्तुमुद्यतः ॥ १८० ॥ १८०. अवस्था प्रतिवेदन से आशा एवं दैन्य को त्यागने के लिये उद्यत उम (मातृ- गुप्त) ने क्षण में यह श्लोक बनाकर उस (नृप) को ज्ञात कराया- शीतेनोद्धृषितस्य मापशिमिवचिन्तार्णवे मज्जतः शान्ताग्निं स्फुटिताधरस्य धमतः क्षुत्क्षामकण्ठस्य मे । निद्रा काऽप्यवमानितेव दयिता संत्यज्य दूरं गता सत्पात्रप्रतिपादितेव वसुधा न क्षीयते शर्वरी १ ॥ १८१ ॥ १८१. "माष फली तुल्य शीत से रोमांचित एवं चिन्ता सागर में निमज्जित, मेरो जिसके अग्नि को धौंकने से अधर फट गये हैं, क्षुधा से कण्ठ क्षीण हो गया है, निद्रा अपमानिता स्त्री तुल्य त्यागकर कहीं दूर चली गयी है, और रात्रि सत्पात्र में दी गयी पृथ्वी के समान समाप्त नहीं होती है।" तदाकर्ण्य महीपालः साधुवादैः परिश्रमम् । अभिनन्द्य कवीन्द्रं तं पूर्वस्थानं व्यसर्जत् ॥ १८२ ॥ १८२. महीपाल इसे सुनकर, साधुवादों द्वारा परिश्रमी उस कवीन्द्र को अभिनन्दित कर पूर्व स्थान पर विसर्जित कर दिया । अचिन्तयच्च धिङ्मां यः सगुणात्खिन्नचेतसः । दुःखोत्थप्तं वचः शृण्वन्नेवमेवाधुना स्थितः ॥ १८३ ॥ १८३. उस (राजा) ने चिन्तन किया- "मुझे धिक्कार है, जो कि गुण युक्त एवं खिन्नचेतस की दुःख उत्तप्त वाणी सुनते हुये, इस प्रकार अभी स्थित है । पाठभेद : श्लोक संख्या १८१ में 'मापशिमिव' का पाठ भेद 'मासमशिश्व' मिलता है। पादटिप्पणियां : १८१ (१) राजतरंगिणी सूखित संग्रह का ६०वां श्लोक है । पाठभेद : श्लोक संख्या १८२ में 'पूर्वस्थानं' का पाठभेद 'पूर्वस्थाने' मिलता है ।