भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 659, कुल 984 में से

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पृष्ठ 659

५०० राजतरंगिणी यस्मिन् राजनि तत्त्वज्ञैः सूरिभिः संभृतश्रुतैः । नाञ्जलिर्दीयते जातु मानाय च गुणाय च ॥१३२॥ १३२. 'जिस राजा को तत्त्व वेत्ताओं, विद्वज्जनों एवं शास्त्रज्ञों को समादर तथा गुण हेतु कभी अञ्जलि नहीं देनी पड़ती । भङ्गयाऽमुष्मिन्विदधती स्वाभिप्रायप्रकाशनम् । वैदग्ध्यवन्ध्यतां नैति बुद्धिः कुलवधूरिव ॥१३३॥ १३३. 'इस राजा से भङ्गिमा विशेष द्वारा स्वाभिप्राय प्रकाशन में बुद्धि कुल वधू तुल्य वैदग्ध्य रहित नहीं होती। खिलीकृतखलालापे युक्तायुक्तविवेक्तरि । नायाति सेव्यमानेऽस्मिन्स्वगुणोऽनर्थकारिताम् ॥१३४॥ १३४. 'खलों के निस्सारता को जानने वाले युक्तायुक्त विवेकी, इस नृप की सेवा में स्वगुण अनर्थकारी नहीं होते । अनाप्नुवद्भिः सावद्यदुविद्यसमशीर्षिकाम् । जीवन्मरणमस्याग्रे गुणिभिर्नानुभूयते ॥१३५॥ १३५. 'इसके सम्मुख दुर्विद्य एवं निन्य मूर्ख जनों की तुल्य कोटि में विद्वान् नहीं आते थे । अतएव उन्हें जीवित मरण का अनुभव नहीं होता था । संभावनानुसारेण प्रवृत्तोऽस्माद्विवेकिनः । शोच्यते नाञ्चितोच्छ्वासं प्रीतिदायो महाशयैः ॥१३६॥ १३६. 'संभावना अनुसार प्रवृत्त प्रीतिदायी, उस विवेकी के कारण, महाशयों द्वारा उष्णोच्छ्वास पूर्वक शोचनीय नहीं होता था ।' महीभुजा.'—इसके पूर्व के नृप 'परभागोपलम्भाय' अर्थात् इस राजा को उत्कृष्टता सिद्धि हेतु हुए । मातृ- गुप्त प्रतीत होता है अनेक राजाओ के यहाँ गया था किन्तु उसे केवल विक्रमादित्य हर्ष ही उत्कृष्ट प्रतीत हुआ । पाठभेद : श्लोकसंख्या १३२ में 'यस्मिन्' का पाठभेद 'महिम्न्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १३६ (१) श्री रणजीत सीताराम पण्डित के अनुसार इस पद का तात्पर्य यह प्रतीत होता है कि विद्वान् निम्न गुणों के व्यक्तियो का आदर होते देखकर ईर्ष्या नहीं करते थे । इसका एक भावात्मक अर्थ हो सकता है—विवेकी भूपति योग्यता अनुसार परितोषिक प्रदान करना कह कर सदाशय जनगण के दीर्घ निश्वास परित्याग पूर्वक शोक प्रकाश नही करने देता था ।

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