भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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तृतीय तरंग ५०१ गृह्णन्यथागुणं स्वान्तमुचितप्रतिपत्तिभिः । अन्तरज्ञः समस्तानायमयुत्साहवर्धनः ॥१३७॥ १३७. 'तारतम्यवेत्ता उत्साह वर्धक यह (नृप) उचित प्रमाण द्वारा गुणानुसार सबको अन्तःकरण में ग्रहण कर समादृत करता था । सेवया दृष्टकष्टस्य दाक्षिण्योत्पादने श्रमः । अस्य यो न स भृत्यानां हिमाद्रौ हिमविक्रयः ॥१३८॥ १३८. 'कष्ट विज्ञ इस राजा की सेवा हित, शिष्टाचार सम्पादन में हुआ, भृत्यों का श्रम, हिमाद्रि पर, हिम विक्रय¹ तुल्य व्यर्थ नहीं जाता था । मिथ्याख्यातगुणो नाप्तो नामात्यः कलहप्रियः । असत्यसंघः स्थेयो वा नास्थानेऽस्य महीपतेः ॥१३९॥ १३९. 'उस राजा की सभा में मिथ्या प्रशंसित आप्त पुरुष, कलह प्रिय अमात्य तथा असत्यसंघ स्थेय नहीं थे । अश्लीलालापिनोऽन्योन्यं नमोक्त्या मर्मभेदिनः । अन्यप्रवेशासहनाः संहता¹ नास्य सेवकाः ॥१४०॥ १४०. 'अश्लील आलाप करने वाले, परस्पर नमोक्ति द्वारा मर्म भेदी अन्य का प्रवेश न सहने वाले, उसके सेवक नहीं थे । छन्दानुवर्तिनामेष निजविज्ञानवन्दिनाम् । सर्वज्ञंमन्यतान्धानां मुखप्रेक्षी न पार्थिवः ॥१४१॥ १४१. 'यह नृप छन्दानुवर्तियों, प्रशंसकों, एवं सर्वज्ञंमन्यता से अन्धों का मुख देखने वाला नहीं है । पाठभेद : है । वामन ६:५५; २४:१०; २६:१५; २८:११; श्लोकसंख्या १३७ में 'स्वान्त' का 'शान्त' तथा ३२:८५-८७; ३८:४९; ५०:१४, २५; तथा 'स्वान्त' पाठभेद मिलता है । ५५:५७ । पाठभेद : पादटिप्पणियाँ : श्लोक संख्या १४० में 'नमोक्त्या' का पाठ- १३८ (१) हिमाद्रि पर जहाँ चारो ओर हिमा- भेद 'नर्मोक्त्या' मिलता है । च्छादित भूमि तथा शिखर हैं वहा हिम का विक्रय उसी प्रकार व्यर्थ होगा जैसा रानीगंज तथा झरिया के पादटिप्पणियाँ : कोयले की खानो में कोयला का विक्रय हेतु ले जाना । १४० ( १ ) संहत : दलबन्दी अथवा परस्पर वामन पुराण में हिमाद्रि तथा हिमवत् शब्दों स्वार्थ हेतु टकराते हुए सेवकों के अर्थ में यह शब्द का प्रयोग हिमालय के लिये बहुत किया गया आया है ।