भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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५०२ राजतरंगिणी अनेन सह संजातः संलापो विपुलोदयः । लभ्यते नान्तरा छेत्तुं दुर्जातैर्जातु दुर्जनैः ॥१४२॥ १४२. 'दुर्जात दुर्जनों के लिये दूसरे के साथ किये गये, विपुलोदय युक्त संलाप के बीच में काटने का अवसर नहीं है। सर्वदोषोज्झितं सेव्यं नृपमेवामिमं मम । समासादयतः पुण्यैर्दूरे स्वार्थसिद्धयः ॥१४३॥ १४३. 'निर्दोष एवं सेव्य इस नृप को पुण्यों से प्राप्त करने वाले मेरी स्वार्थ सिद्धियाँ निकट हैं। गम्भीरश्च गुणज्ञश्च स्थिरबुद्धिश्च पार्थिवः । एष क्लेशभयं त्यक्त्वा निषेव्यः प्रतिभाति मे ॥१४४॥ १४४. 'गम्भीर, गुणज्ञ, तथा स्थिर बुद्धि यह नृप क्लेश भय त्यागकर, मुझे सेवनीय प्रतीत होता है। न चास्माद्धनमादाय रञ्जितादन्यराजवत् । भ्राम्यतो भूतलेऽमुष्मिन्सेव्योऽन्यः प्रतिभाति मे ॥१४५॥ १४५. 'प्रसन्न इस नृप से अन्य राजाओं के समान धन लेकर, इस भूतल पर भ्रमण करते, मुझे अन्य (नृप) सेव्य प्रतीत नहीं होते।' इति संचिन्त्य सुदृढं स नवामिव तां सभाम् । नारञ्जयन्न चास्ते स्म गुणिगोष्ठीषु मध्यगः ॥१४६॥ १४६. इस प्रकार दृढ़ता पूर्वक चिन्तन कर मध्यस्थित उसने उस सभा को नवीन तुल्य रंजित तथा गुणियों की गोष्ठी में हस्त क्षेप नहीं किया। मृदुपूवै गुणान्नेव दर्शयन्तं विशां पतिः । विशिष्टयोग्यतारूप्यं विवेदाराधनोन्मुखम् ॥१४७॥ १४७. विशांपति¹ ने विशिष्ट योग्यता ज्ञापन हेतु विनय पूर्वक गुणों को ही प्रदर्शित करते (उस मातृगुप्त को) आराधनोन्मुख जाना। भेद : श्लोक संख्या १४६ में 'नारञ्जयन्न' का पाठ १. श्लोक संख्या १४४ में 'क्लेश' का पाठभेद भेद 'नानुरञ्जयन्न' तथा 'नारञ्जयन्न' मिलता है। पाठभेता है। श्लोक संख्या १४७ में 'नेव' का 'नैवं' तथा २. श्लोक संख्या १४५ में 'न चास्मा' का 'न चास्य' 'पति.' का पाठभेद 'पतिम्' मिलता है। 'अस्मिन्' मिलता है। तथा 'भ्राम्यतो' का पाठभेद 'भ्राम्यते' पादटिप्पणियां : १४७ (१) विशांपति : यहाँ पर विशांपति शब्द राजा के अर्थ में कल्हण ने प्रयुक्त किया है।