राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ५०३ अचिन्तयच्च नायं स्याद्गुणिमात्रं महाशयः । उदात्तं सत्क्रियार्हत्वं वदत्यस्य गभीरता ॥१४८॥ १४८. महाशय (नृप) ने चिन्तन किया—'यह केवल गुणी ही नहीं है, क्योंकि इसकी गम्भीरता उदात्त सत्कार योग्यता को सूचित करती है।' इति संचिन्त्य राजाऽपि ज्ञातुं तस्यान्तरं मतेः । नाक्रियन्त परीक्षार्थं यथावल्लाभसत्क्रियाः ॥१४६॥ १४९. ऐसा चिन्तनकर, राजा ने उसकी आन्तरिक मति जानने की इच्छा से, परीक्षा हेतु उसका यथावत् उचित लाभ सत्कार नहीं किया । स तेनानुपचारेण तमुदात्ताशयं नृपम् । स्वीकर्त्तारं विदन्धीमान्त्सिषेवेँ प्रीतिमाश्रितः ॥१५०॥ १५०. उस बुद्धिमान् ने उदात्ताशय नृप के उस अनौपचारिक व्यवहार से अपने को स्वीकृत समझ, प्रसन्न होकर, सेवा करने लगा । क्रमोपचीयमानेन' सेवाभ्यासेन धीमतः । तस्य नोद्वेगमगमत्स्वकाय इव पार्थिवः ॥ १५१ ॥ १५१. उस बुद्धिमान् के क्रम प्रवृद्ध सेवाभ्यास के कारण राजा को अपने शरीर के समान उद्वेग नहीं हुआ । नातीव स्वल्पया स्थित्या नातीवाऽप्यथ दीर्घया । शरन्निशाक्षणेनेव राजा निन्ये प्रसन्नताम् ॥ १५२ ॥ १५२. उसने राजा को अपनी नात्यन्त स्वल्प एवं नात्यन्त दीर्घ स्थिति से शारदीय निशा काल सदृश प्रसन्न किया ।' नर्मभिर्गर्भचेटानां द्वाःस्थानां विक्रियाक्रमैः । मिथ्यास्तवैर्विटानां च न स क्षोभमनीयत ॥ १५३ ॥ १५३. अन्तः पुरस्थ भृत्यों की नमोक्तियों, द्वारपालों के विक्रिया कर्मों (कुत्सित व्यव- हारों) एवं विटों की मिथ्या स्तुतियों द्वारा वह क्षुब्ध नहीं हुआ । विशां शब्द एतरेय ब्राह्मण (८:२६) में—'राष्ट्राणि १५१ (१) बाण ने हर्षचरित में इसी प्रकार वै विशः' यजुर्वेद (२०:९) में—'विशि राज- की शब्दावली का प्रयोग किया है-'क्रमोपचीयमान। प्रतिष्ठितः' अथर्ववेद (३:४:२) में 'त्वां विशो वृणता राज्याय' (४:८ ४ में) 'विशस्त्वं सर्वा वाञ्छन्तु' १५२ (१) इस पद का भावात्मक अर्थ लोक, जनता किंवा प्रजा के लिये आया है विश यह भी प्रतीत होता है—'उसने अपनी सम स्थिति का पति राजतन्त्र में राजा होता और गणतन्त्र में से नृप को वैसे ही प्रसन्न किया जिस प्रकार शरद् राष्ट्रपति होता है। काल करता है।'