राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
DevanagariHindipublished984 पृष्ठ
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५०४ राजतरंगिणी प्रसन्नालापसंप्राप्तौ छायाग्रह इवाचलः । प्रतिस्पर्धीव च क्रुध्यन्नावज्ञायामभूत्प्रभोः ॥ १५४ ॥ १५४. प्रभु के प्रसन्नता पूर्ण आलाप की संप्राप्ति में छाया ग्रह तुल्य अचल रहता और उनकी अवज्ञा से प्रतिस्पर्धी की तरह क्रुद्ध नहीं होता था । वीक्षणं राजदासीनां राजद्विष्टैः सहासनम् । राजाग्रे च कथां नीचैः कालविन्नाचचार सः ॥ १५५ ॥ १५५. काल विज्ञ वह राजदासियों का अवलोकन, राजद्रोहियों के साथ आसन, एवं राजा के सम्मुख निम्नस्तरीय जनों से वार्तालाप नहीं करता था । स्वभावाद्वाजपुरुषैः सज्जनै राजनिन्दकैः । नास्मात्प्रभोरुपालम्भो लेभे पैशुन्यजीविभिः ॥ १५६ ॥ १५६. स्वभाव से नृप के विश्वस्त राजनिन्दक गुप्तचरों ने इसके द्वारा प्रभु का उप लम्भ (निन्दा) नहीं प्राप्त की (सुनी)। वदद्भिस्त्वादरात्तस्यै वैफल्याद्यन्वहं प्रभोः । निन्ये नोत्साहशैथिल्यं सेवोत्साहासहिष्णुभिः ॥ १५७ ॥ १५७. उसके सेवा उत्साह को न सहने वाले सेवको प्रति दिन आदर पूर्वक “प्रभु की सेवा विफल है” आदि कहकर भी (उसके) सेवा उत्साह को शिथिल नहीं कर सके । अन्योत्कर्षानपि वदन्प्रसङ्गेन निराग्रहः । स्वविद्याद्योतकः सोऽभूत्सभ्यानां हृदयंगमः ॥ १५८ ॥ १५८. कथा प्रसंग में अन्योत्कर्ष को कहते हुए भी, आग्रह रहित एवं विद्या प्रकाशक उसे सभ्य¹ जनों ने हृदयंगम किया ।
दूसरा भावार्थ यह भी हो सकता है—'शारदीय निशा तुल्य वह भूपति के समीप अल्पतरकाल अथवा सुदीर्घ समय अवस्थान न कर राजा को प्रसन्न किया । पाठभेद : श्लोक संख्या १५७ में 'तोत्साह' का पाठभेद 'सोत्साह' मिलता है । श्लोक संख्या १५८ में 'सभ्याना' का पाठभेद 'सत्याना' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १५८ (१) सभ्य : सभा के सदस्य को सभ्य कहते थे । विक्रमादित्य की सभा में नवरत्नों का होना कहा जाता है। उनमें महाकवि कालिदास एक थे । कालान्तर में सभा शब्द का प्रयोग खुली सार्वजनिक सभा के लिये होने लगा । भिक्षाचर ने (त० ८.९१२) श्रीनगर के नागरिकों को सभा बुलायी थी ।