राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ५०५ एवं स सेवमानस्तमुद्योगेन बलीयसा । अनिर्विण्णो मातृगुप्तः षड्ऋतूनत्यवाहयत् ॥ १५९ ॥ १५९. तत्परता पूर्वक अत्यधिक उसकी सेवा करने और बिना खिन्न हुए, मातृ- गुप्त ने छः ऋतुओं को व्यतीत किया । अथ तं कृशसर्वाङ्गं धूसरं जीर्णवाससम् । वहिर्जातु विनिर्यातो राजा वीक्ष्य व्यचिन्तयत् ॥ १६० ॥ १६०. बाहर जाते हुए राजा ने कदाचित् सर्वांग कृश, धूलि धूसर, जीर्ण वस्त्र युक्त उसे देखकर, चिन्तन किया— वैदेशिको निराशरणो गुणवान्बान्धवोज्झितः । दार्थ्यं जिज्ञासुना कष्टं सोऽयमायासितो मया ॥ १६१ ॥ १६१. 'इसकी दृढ़ता की जिज्ञासा में विदेशी निःशरण गुणवान बान्धव हीन इसे कष्ट पहुँचाया । कोऽस्याश्रयः किमशनं कानि प्रावरणानि वा । इत्यैश्वर्यविमूढेन मया हन्त न चिन्तितम् ॥ १६२ ॥ १६२. खेद है कि, (हन्त) ऐश्वर्य मूढ़ मैंने यह भी नहीं चिन्तन किया कि इसका कौन आश्रय है, क्या भोजन है और क्या वसन है । वसन्तेनेव न मया शोभयाऽद्यापि योजितः । शीतवातातपैः शुष्यन्सोऽयं पुरुषपादपः ॥ १६३ ॥ १६३. मैंने वसन्त के समान शीत, वात, एवं आतप से शुष्क कर इस पुरुष पादप को आज भी शोभा से युक्त नहीं किया । अस्य ग्लानस्य भैषज्यं निर्विण्णस्य विनोदनम् । श्रान्तस्य वा क्लमच्छेदं को विदध्यादसम्पदः ॥ १६४ ॥ १६४. 'इस निर्धन ग्लान का भैषज्य, खिन्न का विनोदन एवं श्रान्त का क्लमच्छेद कौन करे ? नास्मै चिन्तामणिं दद्यां नामृतं वा निषेवितः । मया यदयमेतावद्व्यामूढेन परीक्ष्यते ॥ १६५ ॥ १६५. सेवित होकर इसे चिन्तामणि अथवा अमृत तो नहीं दे दूँगा, जो कि मूढ़ मैं इसकी इतनी परीक्षा लेता हूँ । पाठभेद : श्लोक संख्या १६१ में 'यासितो' का पाठभेद 'वासितो' मिलता है । श्लोक संख्या १५९ में 'अनिर्विण्णो' का पाठभेद श्लोक संख्या १६५ में का 'दद्यां' पाठभेद 'अनिर्विग्नो' मिलता है । 'दध्या' मिलता है । ६४