राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयस्तरंग ४९९ स गम्भीरस्य भर्त्तुस्तनुभावं महाद्भुतम् । विविधास्थानसंवृद्धस्तस्याऽभूच्च व्यचिन्तयत् ॥१३०॥ १३०. विविध राज्य सभाओं से सम्बान्धत, उस (कवि) ने उस गम्भीर भूपति के महाद्भुत प्रभाव की कल्पना कर सोचा— सोऽयमासादितः पुण्यैः क्षोणिपालो गुणिप्रियः । परभागोपलम्भाय पूर्वेऽमुष्य महीभुजः ॥१३१॥ १३१. 'गुणो प्रिय इस भूपाल को (पूर्व) पुण्यों से प्राप्त किया है, उससे उत्कृष्ट नृप प्राप्ति हेतु पूर्व नृपों में देखना होगा।
राजा फसीह व बलीग श्लोक सुनकर बहुत महजूज हुआ और इस बरहमन की परेशान हाली पर बहुत हैरान हुआ इसके सिलामें मुल्क कश्मीर उसे इनाम दिया। उसी वक्त उसने कश्मीर के लोगों के ख़त के जवाब में मुन्दरजा जैल ख़त लिखा । 'मातृगुप्त इस मुल्क की हकूमत पर मा बदौलत की तरफ़ से सरफ़राज़ किया गया है। उसकी अताअत और फ़रमाँ बरदारी अपने ऊपर याजबी और लाजिम जाने।' दूसरे दिन बरहमन दरबार में पहुँचा तो राजा ने उसके हाथ में लिफ़ाफ़ा देते हुए कहा कि फौरन कश्मीर जाओ और वहाँ के मोतबर लोग तुम्हें इस लिफ़ाफ़ा को देखकर शाहनशाह बना देंगे। बरहमन ने इन्तहाई मामूली की हालत में राजा का रुक्का अपने हाथ में लिया और कश्मीर की तरफ रवाना हो गया। जिस वक्त हीरापुरा पहुँचा तो वहाँ के सरदारों के हाथ में महाराजा विक्रमाजीत का फ़रमान दे दिया। ख़त पढ़ते ही अमीरों में खुशी के शादयाने बजाये और मातृगुप्त को लिवास शाही पहना कर तख्त सल्तनत पर जलवः अफ़रोज़ किया। तनवीया—इस मुकाम पर महाराजा विक्रमा- जीत के मुख़्तसर हालात तारीखी तफ़सील को मलहूज़ रखते हुए रदीया करिन्दे किये जाते हैं। मातृगुप्त राजा विक्रमादित्य के हुक्म से संवत् १३० विक्रमी के हकूमत कश्मीर का तख्त सर पर रख कर सल्तनत के काम में मशगूल हुआ। और हकूमत के सरकरद और अरकान को हस्व मदारज के शुमार सोभा और जरकार खिलअते अता की। रिश्तेदारों और मुसल्लकीन को बेहन्तहाई निआमत और मुनासिव और लायक दरजे बख्श कर सरबुलन्द किया। और कश्मीर की नफ़ीस चीजों में से बहुत से उमदः और लतीफ तोहफ़े, मुहय्या करके राजा विक्रमाजीत की खिदमत मे भेजे। रिआया पर अदल व अहसान की तरफ मुतबज़ा होकर अपने मुल्क में जानवरों का कत्ल बन्द कर दिया। मुल्क की आमदनी से जो कुछ दिन में जमा होता था रात को फिक़रा और मुसाकीन को बख्श कर खज़ाना खाली कर देता था। चार साल और नव माह की मुद्दत हकूमत का जाम पीकर राजा विक्रमा- जीत के इन्तकाल की खबर सुनी। उसी वक्त सल्तनत तर्क करके इबादत कबूलियत की। काशी के मुल्क को गया।
पाठभेद : श्लोक संख्या १३० में 'महा' का पाठभेद 'गुणा' मिलता है। श्लोक संख्या १३१ में 'क्षोणि' का 'शोणि' तथा 'लम्भाय' का पाठभेद 'रंभाय' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १३१ (१) दूसरे पद का अर्थ वास्तव में यह प्रतीत होता है मातृगुप्त सोचता है—'अमुष्य पूर्व