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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

तृतीयस्तरंग ४९९ स गम्भीरस्य भर्त्तुस्तनुभावं महाद्भुतम् । विविधास्थानसंवृद्धस्तस्याऽभूच्च व्यचिन्तयत् ॥१३०॥ १३०. विविध राज्य सभाओं से सम्बान्धत, उस (कवि) ने उस गम्भीर भूपति के महाद्भुत प्रभाव की कल्पना कर सोचा— सोऽयमासादितः पुण्यैः क्षोणिपालो गुणिप्रियः । परभागोपलम्भाय पूर्वेऽमुष्य महीभुजः ॥१३१॥ १३१. 'गुणो प्रिय इस भूपाल को (पूर्व) पुण्यों से प्राप्त किया है, उससे उत्कृष्ट नृप प्राप्ति हेतु पूर्व नृपों में देखना होगा।

राजा फसीह व बलीग श्लोक सुनकर बहुत महजूज हुआ और इस बरहमन की परेशान हाली पर बहुत हैरान हुआ इसके सिलामें मुल्क कश्मीर उसे इनाम दिया। उसी वक्त उसने कश्मीर के लोगों के ख़त के जवाब में मुन्दरजा जैल ख़त लिखा । 'मातृगुप्त इस मुल्क की हकूमत पर मा बदौलत की तरफ़ से सरफ़राज़ किया गया है। उसकी अताअत और फ़रमाँ बरदारी अपने ऊपर याजबी और लाजिम जाने।' दूसरे दिन बरहमन दरबार में पहुँचा तो राजा ने उसके हाथ में लिफ़ाफ़ा देते हुए कहा कि फौरन कश्मीर जाओ और वहाँ के मोतबर लोग तुम्हें इस लिफ़ाफ़ा को देखकर शाहनशाह बना देंगे। बरहमन ने इन्तहाई मामूली की हालत में राजा का रुक्का अपने हाथ में लिया और कश्मीर की तरफ रवाना हो गया। जिस वक्त हीरापुरा पहुँचा तो वहाँ के सरदारों के हाथ में महाराजा विक्रमाजीत का फ़रमान दे दिया। ख़त पढ़ते ही अमीरों में खुशी के शादयाने बजाये और मातृगुप्त को लिवास शाही पहना कर तख्त सल्तनत पर जलवः अफ़रोज़ किया। तनवीया—इस मुकाम पर महाराजा विक्रमा- जीत के मुख़्तसर हालात तारीखी तफ़सील को मलहूज़ रखते हुए रदीया करिन्दे किये जाते हैं। मातृगुप्त राजा विक्रमादित्य के हुक्म से संवत् १३० विक्रमी के हकूमत कश्मीर का तख्त सर पर रख कर सल्तनत के काम में मशगूल हुआ। और हकूमत के सरकरद और अरकान को हस्व मदारज के शुमार सोभा और जरकार खिलअते अता की। रिश्तेदारों और मुसल्लकीन को बेहन्तहाई निआमत और मुनासिव और लायक दरजे बख्श कर सरबुलन्द किया। और कश्मीर की नफ़ीस चीजों में से बहुत से उमदः और लतीफ तोहफ़े, मुहय्या करके राजा विक्रमाजीत की खिदमत मे भेजे। रिआया पर अदल व अहसान की तरफ मुतबज़ा होकर अपने मुल्क में जानवरों का कत्ल बन्द कर दिया। मुल्क की आमदनी से जो कुछ दिन में जमा होता था रात को फिक़रा और मुसाकीन को बख्श कर खज़ाना खाली कर देता था। चार साल और नव माह की मुद्दत हकूमत का जाम पीकर राजा विक्रमा- जीत के इन्तकाल की खबर सुनी। उसी वक्त सल्तनत तर्क करके इबादत कबूलियत की। काशी के मुल्क को गया।

पाठभेद : श्लोक संख्या १३० में 'महा' का पाठभेद 'गुणा' मिलता है। श्लोक संख्या १३१ में 'क्षोणि' का 'शोणि' तथा 'लम्भाय' का पाठभेद 'रंभाय' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : १३१ (१) दूसरे पद का अर्थ वास्तव में यह प्रतीत होता है मातृगुप्त सोचता है—'अमुष्य पूर्व

५०० राजतरंगिणी यस्मिन् राजनि तत्त्वज्ञैः सूरिभिः संभृतश्रुतैः । नाञ्जलिर्दीयते जातु मानाय च गुणाय च ॥१३२॥ १३२. 'जिस राजा को तत्त्व वेत्ताओं, विद्वज्जनों एवं शास्त्रज्ञों को समादर तथा गुण हेतु कभी अञ्जलि नहीं देनी पड़ती । भङ्गयाऽमुष्मिन्विदधती स्वाभिप्रायप्रकाशनम् । वैदग्ध्यवन्ध्यतां नैति बुद्धिः कुलवधूरिव ॥१३३॥ १३३. 'इस राजा से भङ्गिमा विशेष द्वारा स्वाभिप्राय प्रकाशन में बुद्धि कुल वधू तुल्य वैदग्ध्य रहित नहीं होती। खिलीकृतखलालापे युक्तायुक्तविवेक्तरि । नायाति सेव्यमानेऽस्मिन्स्वगुणोऽनर्थकारिताम् ॥१३४॥ १३४. 'खलों के निस्सारता को जानने वाले युक्तायुक्त विवेकी, इस नृप की सेवा में स्वगुण अनर्थकारी नहीं होते । अनाप्नुवद्भिः सावद्यदुविद्यसमशीर्षिकाम् । जीवन्मरणमस्याग्रे गुणिभिर्नानुभूयते ॥१३५॥ १३५. 'इसके सम्मुख दुर्विद्य एवं निन्य मूर्ख जनों की तुल्य कोटि में विद्वान् नहीं आते थे । अतएव उन्हें जीवित मरण का अनुभव नहीं होता था । संभावनानुसारेण प्रवृत्तोऽस्माद्विवेकिनः । शोच्यते नाञ्चितोच्छ्वासं प्रीतिदायो महाशयैः ॥१३६॥ १३६. 'संभावना अनुसार प्रवृत्त प्रीतिदायी, उस विवेकी के कारण, महाशयों द्वारा उष्णोच्छ्वास पूर्वक शोचनीय नहीं होता था ।' महीभुजा.'—इसके पूर्व के नृप 'परभागोपलम्भाय' अर्थात् इस राजा को उत्कृष्टता सिद्धि हेतु हुए । मातृ- गुप्त प्रतीत होता है अनेक राजाओ के यहाँ गया था किन्तु उसे केवल विक्रमादित्य हर्ष ही उत्कृष्ट प्रतीत हुआ । पाठभेद : श्लोकसंख्या १३२ में 'यस्मिन्' का पाठभेद 'महिम्न्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १३६ (१) श्री रणजीत सीताराम पण्डित के अनुसार इस पद का तात्पर्य यह प्रतीत होता है कि विद्वान् निम्न गुणों के व्यक्तियो का आदर होते देखकर ईर्ष्या नहीं करते थे । इसका एक भावात्मक अर्थ हो सकता है—विवेकी भूपति योग्यता अनुसार परितोषिक प्रदान करना कह कर सदाशय जनगण के दीर्घ निश्वास परित्याग पूर्वक शोक प्रकाश नही करने देता था ।

तृतीय तरंग ५०१ गृह्णन्यथागुणं स्वान्तमुचितप्रतिपत्तिभिः । अन्तरज्ञः समस्तानायमयुत्साहवर्धनः ॥१३७॥ १३७. 'तारतम्यवेत्ता उत्साह वर्धक यह (नृप) उचित प्रमाण द्वारा गुणानुसार सबको अन्तःकरण में ग्रहण कर समादृत करता था । सेवया दृष्टकष्टस्य दाक्षिण्योत्पादने श्रमः । अस्य यो न स भृत्यानां हिमाद्रौ हिमविक्रयः ॥१३८॥ १३८. 'कष्ट विज्ञ इस राजा की सेवा हित, शिष्टाचार सम्पादन में हुआ, भृत्यों का श्रम, हिमाद्रि पर, हिम विक्रय¹ तुल्य व्यर्थ नहीं जाता था । मिथ्याख्यातगुणो नाप्तो नामात्यः कलहप्रियः । असत्यसंघः स्थेयो वा नास्थानेऽस्य महीपतेः ॥१३९॥ १३९. 'उस राजा की सभा में मिथ्या प्रशंसित आप्त पुरुष, कलह प्रिय अमात्य तथा असत्यसंघ स्थेय नहीं थे । अश्लीलालापिनोऽन्योन्यं नमोक्त्या मर्मभेदिनः । अन्यप्रवेशासहनाः संहता¹ नास्य सेवकाः ॥१४०॥ १४०. 'अश्लील आलाप करने वाले, परस्पर नमोक्ति द्वारा मर्म भेदी अन्य का प्रवेश न सहने वाले, उसके सेवक नहीं थे । छन्दानुवर्तिनामेष निजविज्ञानवन्दिनाम् । सर्वज्ञंमन्यतान्धानां मुखप्रेक्षी न पार्थिवः ॥१४१॥ १४१. 'यह नृप छन्दानुवर्तियों, प्रशंसकों, एवं सर्वज्ञंमन्यता से अन्धों का मुख देखने वाला नहीं है । पाठभेद : है । वामन ६:५५; २४:१०; २६:१५; २८:११; श्लोकसंख्या १३७ में 'स्वान्त' का 'शान्त' तथा ३२:८५-८७; ३८:४९; ५०:१४, २५; तथा 'स्वान्त' पाठभेद मिलता है । ५५:५७ । पाठभेद : पादटिप्पणियाँ : श्लोक संख्या १४० में 'नमोक्त्या' का पाठ- १३८ (१) हिमाद्रि पर जहाँ चारो ओर हिमा- भेद 'नर्मोक्त्या' मिलता है । च्छादित भूमि तथा शिखर हैं वहा हिम का विक्रय उसी प्रकार व्यर्थ होगा जैसा रानीगंज तथा झरिया के पादटिप्पणियाँ : कोयले की खानो में कोयला का विक्रय हेतु ले जाना । १४० ( १ ) संहत : दलबन्दी अथवा परस्पर वामन पुराण में हिमाद्रि तथा हिमवत् शब्दों स्वार्थ हेतु टकराते हुए सेवकों के अर्थ में यह शब्द का प्रयोग हिमालय के लिये बहुत किया गया आया है ।

५०२ राजतरंगिणी अनेन सह संजातः संलापो विपुलोदयः । लभ्यते नान्तरा छेत्तुं दुर्जातैर्जातु दुर्जनैः ॥१४२॥ १४२. 'दुर्जात दुर्जनों के लिये दूसरे के साथ किये गये, विपुलोदय युक्त संलाप के बीच में काटने का अवसर नहीं है। सर्वदोषोज्झितं सेव्यं नृपमेवामिमं मम । समासादयतः पुण्यैर्दूरे स्वार्थसिद्धयः ॥१४३॥ १४३. 'निर्दोष एवं सेव्य इस नृप को पुण्यों से प्राप्त करने वाले मेरी स्वार्थ सिद्धियाँ निकट हैं। गम्भीरश्च गुणज्ञश्च स्थिरबुद्धिश्च पार्थिवः । एष क्लेशभयं त्यक्त्वा निषेव्यः प्रतिभाति मे ॥१४४॥ १४४. 'गम्भीर, गुणज्ञ, तथा स्थिर बुद्धि यह नृप क्लेश भय त्यागकर, मुझे सेवनीय प्रतीत होता है। न चास्माद्धनमादाय रञ्जितादन्यराजवत् । भ्राम्यतो भूतलेऽमुष्मिन्सेव्योऽन्यः प्रतिभाति मे ॥१४५॥ १४५. 'प्रसन्न इस नृप से अन्य राजाओं के समान धन लेकर, इस भूतल पर भ्रमण करते, मुझे अन्य (नृप) सेव्य प्रतीत नहीं होते।' इति संचिन्त्य सुदृढं स नवामिव तां सभाम् । नारञ्जयन्न चास्ते स्म गुणिगोष्ठीषु मध्यगः ॥१४६॥ १४६. इस प्रकार दृढ़ता पूर्वक चिन्तन कर मध्यस्थित उसने उस सभा को नवीन तुल्य रंजित तथा गुणियों की गोष्ठी में हस्त क्षेप नहीं किया। मृदुपूवै गुणान्नेव दर्शयन्तं विशां पतिः । विशिष्टयोग्यतारूप्यं विवेदाराधनोन्मुखम् ॥१४७॥ १४७. विशांपति¹ ने विशिष्ट योग्यता ज्ञापन हेतु विनय पूर्वक गुणों को ही प्रदर्शित करते (उस मातृगुप्त को) आराधनोन्मुख जाना। भेद : श्लोक संख्या १४६ में 'नारञ्जयन्न' का पाठ १. श्लोक संख्या १४४ में 'क्लेश' का पाठभेद भेद 'नानुरञ्जयन्न' तथा 'नारञ्जयन्न' मिलता है। पाठभेता है। श्लोक संख्या १४७ में 'नेव' का 'नैवं' तथा २. श्लोक संख्या १४५ में 'न चास्मा' का 'न चास्य' 'पति.' का पाठभेद 'पतिम्' मिलता है। 'अस्मिन्' मिलता है। तथा 'भ्राम्यतो' का पाठभेद 'भ्राम्यते' पादटिप्पणियां : १४७ (१) विशांपति : यहाँ पर विशांपति शब्द राजा के अर्थ में कल्हण ने प्रयुक्त किया है।

तृतीय तरंग ५०३ अचिन्तयच्च नायं स्याद्गुणिमात्रं महाशयः । उदात्तं सत्क्रियार्हत्वं वदत्यस्य गभीरता ॥१४८॥ १४८. महाशय (नृप) ने चिन्तन किया—'यह केवल गुणी ही नहीं है, क्योंकि इसकी गम्भीरता उदात्त सत्कार योग्यता को सूचित करती है।' इति संचिन्त्य राजाऽपि ज्ञातुं तस्यान्तरं मतेः । नाक्रियन्त परीक्षार्थं यथावल्लाभसत्क्रियाः ॥१४६॥ १४९. ऐसा चिन्तनकर, राजा ने उसकी आन्तरिक मति जानने की इच्छा से, परीक्षा हेतु उसका यथावत् उचित लाभ सत्कार नहीं किया । स तेनानुपचारेण तमुदात्ताशयं नृपम् । स्वीकर्त्तारं विदन्धीमान्त्सिषेवेँ प्रीतिमाश्रितः ॥१५०॥ १५०. उस बुद्धिमान् ने उदात्ताशय नृप के उस अनौपचारिक व्यवहार से अपने को स्वीकृत समझ, प्रसन्न होकर, सेवा करने लगा । क्रमोपचीयमानेन' सेवाभ्यासेन धीमतः । तस्य नोद्वेगमगमत्स्वकाय इव पार्थिवः ॥ १५१ ॥ १५१. उस बुद्धिमान् के क्रम प्रवृद्ध सेवाभ्यास के कारण राजा को अपने शरीर के समान उद्वेग नहीं हुआ । नातीव स्वल्पया स्थित्या नातीवाऽप्यथ दीर्घया । शरन्निशाक्षणेनेव राजा निन्ये प्रसन्नताम् ॥ १५२ ॥ १५२. उसने राजा को अपनी नात्यन्त स्वल्प एवं नात्यन्त दीर्घ स्थिति से शारदीय निशा काल सदृश प्रसन्न किया ।' नर्मभिर्गर्भचेटानां द्वाःस्थानां विक्रियाक्रमैः । मिथ्यास्तवैर्विटानां च न स क्षोभमनीयत ॥ १५३ ॥ १५३. अन्तः पुरस्थ भृत्यों की नमोक्तियों, द्वारपालों के विक्रिया कर्मों (कुत्सित व्यव- हारों) एवं विटों की मिथ्या स्तुतियों द्वारा वह क्षुब्ध नहीं हुआ । विशां शब्द एतरेय ब्राह्मण (८:२६) में—'राष्ट्राणि १५१ (१) बाण ने हर्षचरित में इसी प्रकार वै विशः' यजुर्वेद (२०:९) में—'विशि राज- की शब्दावली का प्रयोग किया है-'क्रमोपचीयमान। प्रतिष्ठितः' अथर्ववेद (३:४:२) में 'त्वां विशो वृणता राज्याय' (४:८ ४ में) 'विशस्त्वं सर्वा वाञ्छन्तु' १५२ (१) इस पद का भावात्मक अर्थ लोक, जनता किंवा प्रजा के लिये आया है विश यह भी प्रतीत होता है—'उसने अपनी सम स्थिति का पति राजतन्त्र में राजा होता और गणतन्त्र में से नृप को वैसे ही प्रसन्न किया जिस प्रकार शरद् राष्ट्रपति होता है। काल करता है।'

५०४ राजतरंगिणी प्रसन्नालापसंप्राप्तौ छायाग्रह इवाचलः । प्रतिस्पर्धीव च क्रुध्यन्नावज्ञायामभूत्प्रभोः ॥ १५४ ॥ १५४. प्रभु के प्रसन्नता पूर्ण आलाप की संप्राप्ति में छाया ग्रह तुल्य अचल रहता और उनकी अवज्ञा से प्रतिस्पर्धी की तरह क्रुद्ध नहीं होता था । वीक्षणं राजदासीनां राजद्विष्टैः सहासनम् । राजाग्रे च कथां नीचैः कालविन्नाचचार सः ॥ १५५ ॥ १५५. काल विज्ञ वह राजदासियों का अवलोकन, राजद्रोहियों के साथ आसन, एवं राजा के सम्मुख निम्नस्तरीय जनों से वार्तालाप नहीं करता था । स्वभावाद्वाजपुरुषैः सज्जनै राजनिन्दकैः । नास्मात्प्रभोरुपालम्भो लेभे पैशुन्यजीविभिः ॥ १५६ ॥ १५६. स्वभाव से नृप के विश्वस्त राजनिन्दक गुप्तचरों ने इसके द्वारा प्रभु का उप लम्भ (निन्दा) नहीं प्राप्त की (सुनी)। वदद्भिस्त्वादरात्तस्यै वैफल्याद्यन्वहं प्रभोः । निन्ये नोत्साहशैथिल्यं सेवोत्साहासहिष्णुभिः ॥ १५७ ॥ १५७. उसके सेवा उत्साह को न सहने वाले सेवको प्रति दिन आदर पूर्वक “प्रभु की सेवा विफल है” आदि कहकर भी (उसके) सेवा उत्साह को शिथिल नहीं कर सके । अन्योत्कर्षानपि वदन्प्रसङ्गेन निराग्रहः । स्वविद्याद्योतकः सोऽभूत्सभ्यानां हृदयंगमः ॥ १५८ ॥ १५८. कथा प्रसंग में अन्योत्कर्ष को कहते हुए भी, आग्रह रहित एवं विद्या प्रकाशक उसे सभ्य¹ जनों ने हृदयंगम किया ।

दूसरा भावार्थ यह भी हो सकता है—'शारदीय निशा तुल्य वह भूपति के समीप अल्पतरकाल अथवा सुदीर्घ समय अवस्थान न कर राजा को प्रसन्न किया । पाठभेद : श्लोक संख्या १५७ में 'तोत्साह' का पाठभेद 'सोत्साह' मिलता है । श्लोक संख्या १५८ में 'सभ्याना' का पाठभेद 'सत्याना' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १५८ (१) सभ्य : सभा के सदस्य को सभ्य कहते थे । विक्रमादित्य की सभा में नवरत्नों का होना कहा जाता है। उनमें महाकवि कालिदास एक थे । कालान्तर में सभा शब्द का प्रयोग खुली सार्वजनिक सभा के लिये होने लगा । भिक्षाचर ने (त० ८.९१२) श्रीनगर के नागरिकों को सभा बुलायी थी ।

तृतीय तरंग ५०५ एवं स सेवमानस्तमुद्योगेन बलीयसा । अनिर्विण्णो मातृगुप्तः षड्ऋतूनत्यवाहयत् ॥ १५९ ॥ १५९. तत्परता पूर्वक अत्यधिक उसकी सेवा करने और बिना खिन्न हुए, मातृ- गुप्त ने छः ऋतुओं को व्यतीत किया । अथ तं कृशसर्वाङ्गं धूसरं जीर्णवाससम् । वहिर्जातु विनिर्यातो राजा वीक्ष्य व्यचिन्तयत् ॥ १६० ॥ १६०. बाहर जाते हुए राजा ने कदाचित् सर्वांग कृश, धूलि धूसर, जीर्ण वस्त्र युक्त उसे देखकर, चिन्तन किया— वैदेशिको निराशरणो गुणवान्बान्धवोज्झितः । दार्थ्यं जिज्ञासुना कष्टं सोऽयमायासितो मया ॥ १६१ ॥ १६१. 'इसकी दृढ़ता की जिज्ञासा में विदेशी निःशरण गुणवान बान्धव हीन इसे कष्ट पहुँचाया । कोऽस्याश्रयः किमशनं कानि प्रावरणानि वा । इत्यैश्वर्यविमूढेन मया हन्त न चिन्तितम् ॥ १६२ ॥ १६२. खेद है कि, (हन्त) ऐश्वर्य मूढ़ मैंने यह भी नहीं चिन्तन किया कि इसका कौन आश्रय है, क्या भोजन है और क्या वसन है । वसन्तेनेव न मया शोभयाऽद्यापि योजितः । शीतवातातपैः शुष्यन्सोऽयं पुरुषपादपः ॥ १६३ ॥ १६३. मैंने वसन्त के समान शीत, वात, एवं आतप से शुष्क कर इस पुरुष पादप को आज भी शोभा से युक्त नहीं किया । अस्य ग्लानस्य भैषज्यं निर्विण्णस्य विनोदनम् । श्रान्तस्य वा क्लमच्छेदं को विदध्यादसम्पदः ॥ १६४ ॥ १६४. 'इस निर्धन ग्लान का भैषज्य, खिन्न का विनोदन एवं श्रान्त का क्लमच्छेद कौन करे ? नास्मै चिन्तामणिं दद्यां नामृतं वा निषेवितः । मया यदयमेतावद्व्यामूढेन परीक्ष्यते ॥ १६५ ॥ १६५. सेवित होकर इसे चिन्तामणि अथवा अमृत तो नहीं दे दूँगा, जो कि मूढ़ मैं इसकी इतनी परीक्षा लेता हूँ । पाठभेद : श्लोक संख्या १६१ में 'यासितो' का पाठभेद 'वासितो' मिलता है । श्लोक संख्या १५९ में 'अनिर्विण्णो' का पाठभेद श्लोक संख्या १६५ में का 'दद्यां' पाठभेद 'अनिर्विग्नो' मिलता है । 'दध्या' मिलता है । ६४

५०६ राजतरंगिणी तदमुष्य गुणित्वस्य तीव्रसेवाश्रमस्य च । प्रतिपत्या कतमया तावदानृण्यमाप्नुयाम् ॥ १६६ ॥ १६६. 'तीव्र सेवाश्रमी एवं गुणी इससे मैं किस समादर द्वारा उऋणता प्राप्त कर सकता हूँ ?' इति चिन्तयतस्तस्य राज्ञस्तं सेवकं प्रति । स्वप्रसादोचिता काचित्प्रत्यभाद्वैन सत्क्रिया ॥ १६७ ॥ १६७. इस प्रकार चिन्ता करते उस नृपति को उस सेवक के प्रति स्वप्रसादोचित कोई सत्कार नहीं प्रतीत हुआ । ततः प्रावर्तत स्फारनीहारलववाहिभिः । दहन्निवाङ्गं प्रालेयपवमानैर्हिमागमः ॥ १६८ ॥ १६८. तदनन्तर प्रचुर नीहारकणवाही हिम वायु से युक्त हिमागम (शिशिर) अंग को दग्ध सा करता (हुआ) आया ! संततध्वान्तमिषतस्तीव्रशीतवशीकृताः । आशाश्चकाशिरे नीलनिचोलाच्छादिता इव ॥ १६९ ॥ १६९. तीव्र शीत से विवश दिशायें निरन्तर (घने) अन्धकार के व्याज से नील निचोल से आच्छादित तुल्य शोभित हुईं । शीतार्त्या द्युमणावोर्वदहनोष्माभिलाषतः । द्रुतं यातीव जलधिं दिनानि लघुतां ययुः ॥ १७० ॥ १७०. शीत त्रास के कारण मानो बड़वाग्नि ऊष्मा की अभिलाषा से, सूर्य के शीघ्र जलनिधि गमन करने पर, दिन छोटे होने लगे । अथ दीपोज्ज्वले धाम्नि लसद्दीप्तहसन्तिके । कदाचिन्न्नृपतिर्देवादर्धरात्रे व्यबुध्यत ॥ १७१ ॥ १७१. किसी समय जब दीप से प्रकाशित गृह में प्रज्वलित अंगारधानी (हसन्ती) शोभित हो रही थी—राजा अकस्मात् (दैवात्) अर्धरात्रि में प्रबुद्ध हुआ । स हेमन्तानिलैर्भूरिझांकारपरुषैः पुरः । दीपान्प्रकम्पितानीषत्प्रविष्टैर्धाम्नि दृष्टवान् ॥ १७२ ॥ १७२. उसने गृह में प्रविष्ट प्रभूत झांकार¹ ध्वनि से परुष, हेमन्त कालीन वायु से प्रकम्पित दीप सामने देखा । श्लोक संख्या १६६ में 'नुयाम्' का पाठभेद पादटिप्पणियाँ : 'नुयात्' मिलता है । श्लोक संख्या १७१ में हसन्तिका' का पाठभेद १७२ (१) झांकार : इस शब्द का उल्लेख 'मासान्तिका' मिलता है । कल्हण ने पुनः तरंग ८.१५३ में किया है।

तृतीय-तरंग ५०५ तानुज्ज्वलयितु भृत्यानन्विष्यन्नभ्यभाषत । यामिकेषु बहिः सङ्गः को वर्तत इति स्फुटम् ॥ १७३ ॥ १७३. तदनन्तर उन्हें प्रज्वलित करने के लिये भृत्यों को खोजते हुए सुस्पष्ट कहा— "बाहर यामिक" में कौन उपस्थित है ?" सुखसुप्तेषु सर्वेषु बाह्यकक्ष्यान्तरात्सतः । राजन्यहमहं मातृगुप्त इत्यशृणोद्वचः ॥ १७४ ॥ १७४. उस समय सभी लोग सुख पूर्वक सुप्त थे। बाह्य कक्ष में से—"राजन् ! मैं मातृगुप्त हूँ" यह वाणी (राजा ने) सुनी। प्रविशेति स्वयं राज्ञा दत्तानुज्ञस्ततो गृहम् । लक्ष्मीसांनिध्यरम्यं तददृष्टोऽन्यैर्विवेश सः ॥ १७५ ॥ १७५. राजा के स्वयं यह आज्ञा देने पर 'प्रवेश करो'—बिना दूसरे के ज्ञात हुये, गृह में प्रवेश किया। दीपानुज्ज्वलयेत्युक्तो निष्पाद्य चतुरैः पदैः । बहिर्यासासुरुचेऽथ क्षणं तिष्ठेति भूभुजा ॥ १७६ ॥ १७६. 'दीपों को जलाओं'—कहे जाने पर, निष्पादित करके (दीप जलाकर) चार पद बाहर जाने पर राजा ने उससे कहा, —'क्षण भर रुको'। स भयद्विगुणीभूतशीतकम्पः प्रभोः पुरः । किंस्विद्वक्तीति विमृशन्नातिदूरेऽभ्युपाविशत् ॥ १७७ ॥ १७७. भय से उस (मातृगुप्त) का शीत कम्पन द्विगुणित हो गया। 'वह क्या कहेंगे।' विचार करते प्रभु के सम्मुख न अति दूर बैठ गया। अथ पप्रच्छ भूपालः कियत्यस्ति निशेति तम् । सोऽभ्यधादेव यामिन्या यामः सार्धोऽवशिष्यते ॥ १७८ ॥ १७८. राजा ने उससे पूछा—'कितनी रात्रि शेष है ?' उसने कहा—'यामिनी का डेढ़ याम (डेढ प्रहर) अवशिष्ट है।' १७३ (१) यामिक : याम का अर्थ रात्रि 'यंयो स ऊचेय', तथा 'यियासुरूचे च' मिलता है। तथा प्रहर दोनों होता है। रात्रि में पहरा देने वालो श्लोक संख्या १७१ में 'भय' का पाठभेद 'मय' को यामिक कहा जाता है। मिलता है। पाठभेद : पादटिप्पणियाँ : श्लोक संख्या १७५ में 'दृष्टो' का पाठभेद १७७ ( १ ) बैठ गया : यहाँ पर कल्हण ने 'पृष्टो' मिलता है। 'उपाविशत्' शब्द का प्रयोग किया है। इसका अर्थ बैठना होता है। अन्य अनुवादकर्ताओं ने 'वह श्लोकसंख्या १७६ में 'यियासुरूचेऽथ' का पाठभेद खड़ा हो गया' अर्थ किया है।

५०६ राजतरंगिणी तदमुष्य गुणित्वस्य तीव्रसेवाश्रमस्य च। प्रतिपत्त्या कतमया तावदानृण्यमाप्नुयाम् ॥ १६६ ॥ १६६. 'तीव्र सेवाश्रमी एवं गुणी इससे मैं किस समादर द्वारा उऋणता प्राप्त कर सकता हूँ ?' इति चिन्तयतस्तस्य राज्ञस्तं सेवकं प्रति । स्वप्रसादोचिता काचित्प्रत्यभान्नैव सत्क्रिया ॥ १६७ ॥ १६७. इस प्रकार चिन्ता करते उस नृपति को उस सेवक के प्रति स्वप्रसादोचित कोई सत्कार नहीं प्रतीत हुआ । ततः प्रावर्तत स्फारनीहारलववाहिभिः । दहन्निवाङ्गं प्रालेयपवमानैर्हिमागमः ॥ १६८ ॥ १६८. तदनन्तर प्रचुर नीहारकणवाही हिम वायु से युक्त हिमागम (शिशिर) अंग को दग्ध सा करता (हुआ) आया । संततध्वान्तमिषतस्तीव्रशीतवशीकृताः । आशाश्चकाशिरे नीलनिचोलाच्छादिता इव ॥ १६६ ॥ १६९. तीव्र शीत से विवश दिशायें निरन्तर (घने) अन्धकार के व्याज से नील निचोल से आच्छादित तुल्य शोभित हुईं । शीतार्त्या द्युमणावौर्वदहनोष्मभिलाषतः । द्रुतं यातीव जलधिं दिनानि लघुतां ययुः ॥ १७० ॥ १७०. शीत त्रास के कारण मानो बड़वाग्नि ऊष्मा की अभिलाषा से, सूर्य के शीघ्र जलनिधि गमन करने पर, दिन छोटे होने लगे । अथ दीपोज्ज्वले धाम्नि लसद्धीपहसन्तिके । कदाचिन्भूपतिर्दैवादर्धरात्रे व्यबुध्यत ॥ १७१ ॥ १७१. किसी समय जब दीप से प्रकाशित गृह में प्रज्वलित अंगारधानी (हसन्ती) शोभित हो रही थी—राजा अकस्मात् (दैवात्) अर्धरात्रि में प्रबुद्ध हुआ । स हेमन्तानिलैर्भूरिझांकारपरुषैः पुरः । दीपान्प्रकम्पितानीषत्प्रविष्टैर्धाग्नि दृष्टवान् ॥ १७२ ॥ १७२. उसने गृह में प्रविष्ट प्रभूत झांकार१ ध्वनि से परुष, हेमन्त कालीन वायु से प्रकम्पित दीप सामने देखा । श्लोक संख्या १६६ में 'प्नुयाम्' का पाठभेद पादटिप्पणियाँ : 'प्नुयात्' मिलना है। श्लोक संख्या १७१ में हसन्तिका' का पाठभेद १७२ (१) झांकार : इस शब्द का उल्लेख 'मानाग्निका' मिलता है। कल्हण ने पुनः तरंग ८.१५३ में किया है।

तृतीय तरंग ५०७ तानुज्ज्वलयितु भृत्यानन्विष्यन्नभ्यधात्ततः । यामिकेषु बहिः सञ्जः को वर्तत इति स्फुटम् ॥ १७३ ॥ १७३. तदनन्तर उन्हें प्रज्वलित करने के लिये भृत्यों को खोजते हुए सुस्पष्ट कहा— “बाहर यामिक¹ में कौन उपस्थित है ?” सुखसुप्तेषु सर्वेषु बाह्यकक्ष्यान्तरात्ततः । राजनयमहं मातृगुप्त इत्यशृणोद्वचः ॥ १७४ ॥ १७४. उस समय सभी लोग सुख पूर्वक सुप्त थे। बाह्य कक्ष में से—“राजन् ! मैं मातृगुप्त हूँ” यह वाणी ( राजा ने ) सुनी । प्रविशेति स्वयं राज्ञा दत्तानुज्ञस्ततो गृहम् । लक्ष्मीसांनिध्यरम्यं तददृष्टोऽन्यैर्विवेश सः ॥ १७५ ॥ १७५. राजा के स्वयं यह आज्ञा देने पर 'प्रवेश करो'— बिना दूसरे के ज्ञात हुये, गृह में प्रवेश किया । दीपानुज्ज्वलयेत्युक्तो निष्पाद्य चतुरः पदैः । बहिर्यायाशुरुचेऽथ क्षणं तिष्ठेति भूभुजा ॥ १७६ ॥ १७६. 'दीपों को जलाओं'— कहे जाने पर, निष्पादित करके ( दीप जलाकर ) चार पद बाहर जाने पर राजा ने उससे कहा, —'क्षण भर रुको' । स भयद्विगुणीभूतशीतकम्पः प्रभोः पुरः । किंस्विद्वक्तीति विमृशन्नातिदूरेऽभ्युपाविशत् ॥ १७७ ॥ १७७. भय से उस ( मातृगुप्त ) का शीत कम्पन द्विगुणित हो गया । 'वह क्या कहेंगे ।' विचार करते प्रभु के सम्मुख न अति दूर बैठ गया¹ । अथ पप्रच्छ भूपालः कियत्यस्ति निशेति तम् । सोऽभ्यधादेव यामिन्या यामः सार्धोऽवशिष्यते ॥ १७८ ॥ १७८. राजा ने उससे पूछा— 'कितनी रात्रि शेष है ?' उसने कहा— 'यामिनी का डेढ़ याम ( डेढ़ प्रहर ) अवशिष्ट है ।' १७३ ( १ ) यामिक : याम का अर्थ रात्रि 'र्ययो स ऊचेय', तथा 'यियासुरुच्चे च' मिलता है । तथा प्रहर दोनो होता है । रात्रि मे पहरा देने वालों श्लोक संख्या १७७ में 'भय' का पाठभेद 'मय' को यामिक कहा जाता है । मिलता है । पाठभेद : पादटिप्पणियाँ : श्लोक संख्या १७५ में 'दृष्टो' का पाठभेद १७७ ( १ ) बैठ गया : यहाँ पर कल्हण ने 'पृष्टो' मिलता है । 'उपाविशत्' शब्द का प्रयोग किया है । इसका अर्थ बैठना होता है । अन्य अनुवादकर्ताओं ने 'वह श्लोकसंख्या १७६ मे 'यियासुरुचेऽथ' का पाठभेद खड़ा हो गया' अर्थ किया है ।

५०८ राजतरंगिणी ततो भूभृदुवाचैनं कथं सम्यङ्निशाक्षणः । त्वयाऽवधारितो निद्रा कथं नाभूच्च ते निशि ॥ १७६ ॥ १७९. तदुपरान्त राजा उससे बोले- 'तुमने सम्यक् निशा क्षण कैसे जाना ? तुम्हें रात्रिमें निद्रा क्यों नहीं आयी ? अथ कृत्वा क्षणाच्छ्लोकमेतं तं स व्यजिज्ञपत् । अवस्थावेदनादाशां दैन्यं वा त्यक्तुमुद्यतः ॥ १८० ॥ १८०. अवस्था प्रतिवेदन से आशा एवं दैन्य को त्यागने के लिये उद्यत उम (मातृ- गुप्त) ने क्षण में यह श्लोक बनाकर उस (नृप) को ज्ञात कराया- शीतेनोद्धृषितस्य मापशिमिवचिन्तार्णवे मज्जतः शान्ताग्निं स्फुटिताधरस्य धमतः क्षुत्क्षामकण्ठस्य मे । निद्रा काऽप्यवमानितेव दयिता संत्यज्य दूरं गता सत्पात्रप्रतिपादितेव वसुधा न क्षीयते शर्वरी १ ॥ १८१ ॥ १८१. "माष फली तुल्य शीत से रोमांचित एवं चिन्ता सागर में निमज्जित, मेरो जिसके अग्नि को धौंकने से अधर फट गये हैं, क्षुधा से कण्ठ क्षीण हो गया है, निद्रा अपमानिता स्त्री तुल्य त्यागकर कहीं दूर चली गयी है, और रात्रि सत्पात्र में दी गयी पृथ्वी के समान समाप्त नहीं होती है।" तदाकर्ण्य महीपालः साधुवादैः परिश्रमम् । अभिनन्द्य कवीन्द्रं तं पूर्वस्थानं व्यसर्जत् ॥ १८२ ॥ १८२. महीपाल इसे सुनकर, साधुवादों द्वारा परिश्रमी उस कवीन्द्र को अभिनन्दित कर पूर्व स्थान पर विसर्जित कर दिया । अचिन्तयच्च धिङ्मां यः सगुणात्खिन्नचेतसः । दुःखोत्थप्तं वचः शृण्वन्नेवमेवाधुना स्थितः ॥ १८३ ॥ १८३. उस (राजा) ने चिन्तन किया- "मुझे धिक्कार है, जो कि गुण युक्त एवं खिन्नचेतस की दुःख उत्तप्त वाणी सुनते हुये, इस प्रकार अभी स्थित है । पाठभेद : श्लोक संख्या १८१ में 'मापशिमिव' का पाठ भेद 'मासमशिश्व' मिलता है। पादटिप्पणियां : १८१ (१) राजतरंगिणी सूखित संग्रह का ६०वां श्लोक है । पाठभेद : श्लोक संख्या १८२ में 'पूर्वस्थानं' का पाठभेद 'पूर्वस्थाने' मिलता है ।

तृतीय तरंग ५०९ निरर्थकान्साधुवादानन्यस्येव विदन्मम । अयमज्ञातहृदयो दुःखमास्ते ध्रुवं बहिः ॥ १८४ ॥ १८४. 'सामान्य लोगों के समान मेरे निरर्थक धन्यवादो को जानते हुये, अज्ञात हृदय यह निश्चय ही बाहर दुःखी होगा। चिरं चिन्तयतो यत्नात्सदृशीमस्य सत्क्रियाम् । देयं महार्हमद्यापि न किंचित्प्रतिभाति मे ॥ १८५ ॥ १८५. “इसके योग्य सत्कार चिर काल तक यत्न पूर्वक चिन्तन पर भी, मुझे बहुमूल्य कोई वस्तु आज भी इसे देय नहीं प्रतीत होती। अथवाऽस्यैव सूक्तेन स्मारितोऽस्म्यधुना यथा । वर्तते राजरहितं काम्यं कश्मीरमण्डलम् ॥ १८६ ॥ १८६. अभी इसकी सूक्ति ने मुझे स्मरण कराया है कि, काम्य कश्मीर मण्डल, जैसे राजरहित है। पात्रायास्मै मही तस्मात्सा मया प्रतिपाद्यते । अवधीर्य महीपालान्महतोऽप्यर्थनापरान् ॥ १८७ ॥ १८७. अतएव इसे (कश्मीर) चाहने वाले बड़े महीपालों को तिरस्कृत करके भी वह भूमि, इस पात्र को दे रहा हूँ।" इति निश्चित्य चतुरं क्षपायामेव पार्थिवः । गूढं व्यसर्जयद्दूतान्काश्मीरीः प्रकृतीः प्रति ॥ १८८ ॥ १८८. ऐसा निश्चय कर राजा ने रात्रि में शीघ्र ही कश्मीरी जनों (प्रकृति) के पास गुप्तरूप से दूतों को भेजा। 'आदिदेश च तान्यो वो दर्शयेच्छासनं मम । मातृगुप्ताभिधो राज्ये निश्शङ्कं सोऽभिषिच्यताम् ॥ १८६ ॥ १८९. और उन्हें आदेश दिया कि “तुम्हें जो मेरा शासन (आज्ञा पत्र) दिखाये, उस मातृगुप्त को (वहां) निःशंक होकर, अभिषिक्त करो।" अथ दूतेषु यातेषु लेखयित्वा स्वशासनम् । क्ष्मापतिस्तं क्षपाशेषं कृतकृत्योऽत्यवाहयत् ॥ १६० ॥ १९०. दूतों के चले जाने पर, स्वशासन को लिखकर, कृतकृत्य क्ष्मापति ने शेष रात्रि व्यतीत किया। श्लोक संख्या १८६ में 'कम्मी' का पाठभेद श्लोक संख्या १८९ में 'वो' का पाठभेद 'वा' 'कारमी' मिलता है । मिलता है ।

५१० राजतरंगिणी मातृगुप्तस्तु नृपतेः संलापमपि निष्फलम् । ध्यायन्गृहीतनैराश्यस्त्यक्तभार इवाभवत् ॥ १९१ ॥ १९१. मातृगुप्त नृपति के संलाप को भी निष्फल मानता हुआ. निराश होकर, भार रहित तुल्य हो गया । अन्तर्दध्यौ च कर्तव्यं कृतं शान्तोऽद्य संशयः । आशापिशाचिकात्यक्तश्चरिष्याम्यधुना सुखम् ॥ १९२ ॥ १९२. अन्तःकरण में ( यह ) धारण कर लिया—'कर्त्तव्य किया । आज संशय शान्त हो गया । अब आशा स्वरूप पिशाची से मुक्त हुआ, सुख पूर्वक विचरण करूँगा । गतानुगतिकत्वेन कोऽयमासीन्मम भ्रमः । जनप्रवादात्सेव्यत्वं येनास्य ज्ञातवानहम् ॥ १९३ ॥ १९३. “गतानुगतिका के कारण मुझे यह कौन भ्रम हो गया था, जिसे जनप्रवाद वस इसे सेव्य मान लिया । भुञ्जानाः पवनं सरीसृपगणाः प्रख्यापिता भोगिनो गायद्भृङ्गनिवारका निगदिता विस्तीर्णकर्णा गजाः । यश्चाभ्यन्तरसंभृतोष्मविकृतिः प्रोक्तः शमी स द्रुमो लोकेनेति निरर्गलं प्रलपता सर्वं विपर्यासितम् ॥ १९४ ॥ १९४. “पवन के अशन करने वाले सर्पों को 'भोगी' प्रख्यात किया; गान करते भृंगों के निवारक गजों को 'विस्तीर्णकर्ण' कहा; जो अभ्यन्तर में अग्नि विकार धारण करता है; उस द्रुम को शमी कहा—इस प्रकार संसार ने सबको विपरीत कर दिया है अथवा विद्यनेऽमुष्य न काऽप्यनभिगम्यता । लक्ष्मीप्रणयिनो येन कृताः प्रणयिनां गृहाः ॥ १६५ ॥ १९५. "इसके पास जाने में कोई प्रतिबन्ध नहीं है, जिसने अपने प्रणयी जनों को गृह लक्ष्मी सम्पन्न कर दिया है— श्लोक संख्या १९४ में 'प्रख्यापिता' का पाठभेद 'प्रख्यायिता' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १९५ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का ६१वा श्लोक है । (२) भोगी आदि : कल्हण ने यहाँ भोगी शब्द की उपमा दी है। भोगी शब्द भुज अर्थात् भोगने से बना है । गज शब्द गे अर्थात् गाने से बना है । शमी शब्द शम् अर्थात् आन्तरिक शान्त होना है । शमी वृक्ष से अग्नि तैय्यार की जाती है । उससे रगड़ कर अग्नि उत्पन्न की जाती है । प्राचीन गाथा है । शमी की शाखा में अग्नि छिपी रहती है । आकाशचारी सर्प भी होते है । वे उड़ते हैं । मैने पेड़ो पर अत्यन्त पतला लम्बा साँप देखा है जो एक शाखा से दूसरी शाखा पर इस प्रकार जाता है कि उड़ता मालूम पड़ता है । पुरानी गाथा है कि नाग किंवा सर्प भी उड़ते है । मैंने अभी तक इस प्रकार का सर्प अपनी आँखों नही देखा है । सर्प, गज तथा शमी यहाँ श्लेष है ।

तृतीय तरंग ५११ त्यागिनो निष्कलङ्कस्य को दोषोऽस्य महीपतेः । ममापुण्यं तु तन्निन्द्यं यच्छ्रेयःप्रतिबन्धकम् ॥ १९६ ॥ १९६. "त्यागी एवं निष्कलङ्क इस नृपति का क्या दोष है ? मेरा अपुण्य ही निन्द्य है, जो कि श्रेय का प्रतिबन्धक है रत्नोज्ज्वलाः प्रविकिरंल्लहरीः समीरै- रन्धिः क्रियेत यदि रुद्धतटाभिमुख्यः । दोषोऽर्थिनः स खलु भाग्यविपर्ययाणां दातुर्मनागपि न तस्य तु दातृवायाः¹ ॥ १९७ ॥ १९७. "रत्नों² के समुज्ज्वल लहरियों का विकिरण (प्रसार) करते हुए, समुद्र को यदि वायु तट से दूर कर दे—तो वह प्रार्थी के भाग्य विपर्यय का ही दोष है न कि उस दाता की दानशीलता का उच्चानफललुब्धानां वरं राजोपजीविनः । न तु तत्स्वामिनस्तीव्रपरिक्लेशैः फलन्ति ये ॥ १९८ ॥ १९८. "उदात्त फलाभिलाषियों में नृपोपजीवी श्रेष्ठ होते हैं, न कि वे स्वामी जो कि तीव्र परिश्रम पर फल प्रदान करते हैं । तिष्ठन्ति ये पशुपतेः किल पादमूले संप्राप्यते झटिति तैर्नहि भस्मनोऽन्यत् । ये तद्वृषस्य तु समुज्ज्वलजातरूप- प्राप्त्या न कानि सुदिनानि सदैव तेषाम्¹ ॥ १९६ ॥ १९९. "जो पशुपति के पादमूल में बैठते हैं, वे तत्काल भस्म के अतिरिक्त और कुछ नहीं प्राप्त करते; जो लोग उनके वृष का आश्रय लेते हैं, उनके लिये सदैव समुज्ज्वल स्वर्ण प्राप्ति के अतिरिक्त और कौन सुदिन हो सकता है ? पाठभेद : श्लोक संख्या १९७ में 'प्रविकिरंल्ल' का 'प्रवि- किरेल्ल', 'प्रविकरंल्ल' तथा 'पर्ययाणां' का पाठभेद 'पर्ययेण' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १९७ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रहका ६२वां श्लोक है । (२) रत्न : श्री रणजीत सीताराम पण्डित ने इसका भावार्थ टिप्पणी में किया है कि रत्नों की खान समुद्र रत्नाकर है । वह दाता है । वह अपनी लहरो से रत्न सहित तट की ओर याचक किंवा अभ्यर्थी को रत्न देने बढता है । किन्तु वायु उसको इस कार्य मे विरत कर देती है । १९६ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का ६३ वा श्लोक है । श्री सीताराम पण्डित इस श्लोक के अनुवाद की टिप्पणी में लिखते हैं—'इस श्लोक से यह प्रतीत होता है कि कल्हण के समय में नन्दी के उपासकों की कमी नहीं थी । जिन्हें वह शिव की अपेक्षा सरलता से मिल जाता था। नन्दी सुर एवं असुर के समुद्र मन्थन से रत्न रूप प्राप्त हुआ था ।

५१२ राजतरंगिणी चिन्तयन्नपि पश्यामि न कंचिद्दोषमात्मनः । यातो विरक्तिं यं ज्ञात्वा सेव्यमानोऽप्ययं नृपः ॥ २०० ॥ २००. "विचार करने पर भी अपना कोई दोष नहीं देखता हूँ जिसे जानकर सेव्य- मान यह नृप विरक्त हो गया है। अथवाऽनादृतोऽन्येन संश्रामोऽन्तकमाप्नुयात् । कः फलेनाभिसंबन्धं गतानुगतिकात्प्रभोः ॥ २०१ ॥ २०१. अथवा—अन्य से अनादृत, किसने निकट जाकर, गतानुगतिक प्रभु द्वारा फल प्राप्त किया है ? अन्तर्ये सततं लुठन्त्यगणितास्तानेव पाथोघरै- रात्तानापततस्तरङ्गवलयैरालिङ्गय गृह्णन्नसौ । व्यक्तं मौक्तिकरततां जलकणान्संप्रापयत्यम्बुधिः प्रायोऽन्येन कृतादरो लघुरपि प्राप्तोऽर्च्यते स्वामिभिः ॥ २०२ ॥ २०२. जो अभ्यन्तर में निरन्तर असंख्य जल कण उपेक्षित रहते लोटते हैं; उन्हें ही जलद, जब ग्रहण कर गिराता है, तब तरंग वलयों से आलिंगन कर, ग्रहण करते हुए, यह समुद्र सुस्पष्ट रूप से मौक्तिक२ रत्न बना देता है। प्रायः अन्य से समादृत लघु भी समीप पहुंचकर, स्वामियों से समादृत होता है। नन्दी की उपासना निस्सन्देह सबसे सरल है। है: सागर मध्यस्थित जलकण समूह अनादृत नन्दी शिवाज्ञा के गर्भ गृह के बाहर बना रहता है। होकर रहता है। किन्तु मेघमाल द्वारा गृहीत उसका मुख द्वार के बाहर शिव की ओर रहता है। होकर पुनर्वार पतित होने पर समुद्र अपने तरंग मन्दिर का द्वार शिवा गर्भ गृह का द्वार बन्द करने को विस्तार कर उन्हें ग्रहण करता है और पर शिव का दर्शन नही मिलता किन्तु नन्दी का मुक्ता में परिणत होता है। लघुव्यक्ति भी किसी समय भी मिल जाता है। वह खुले में प्रथमतः दूसरों द्वारा समादर पाने के पश्चात् राजा रहते हैं। का सम्मान लाभ करते हैं। पाठभेद : (२) मौक्तिक: यह सुन्दर पद है। राजाओ श्लोक संख्या २०० में 'क' का पाठभेद 'किं' की प्रकृति का यह चित्रण करता है। राजा मिलता है। उनका आदर करते हैं जो किसी दूसरे राजा द्वारा श्लोक संख्या २०२ में 'रात्ता' का 'रार्ता' ; समादृत हो चुके रहते हैं। 'पतत' का 'पतितः' तथा 'दर्यते' की पाठभेद मुक्ता के विषय में गाथा प्रचलित है कि 'ध्यंते' मिलता है। स्वाती का वर्षा जल गिरता है। समुद्र में सीप पादटिप्पणियाँ : उन जलों को ग्रहण करते हैं। वह जलबिन्दु सीप २०२ (१) राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रह का ९४वां में मुक्ता हो जाता है। भर्तृहरि ने कहा है : श्लोक है। इस पद का एक अर्थ यह भी हो सकता 'स्वात्यां सागरशुक्तिमध्यपतितम्' सः मुक्तिका जायते।'

तृतीय तरंग ५१३ इदं संचिन्तयन्सोऽभूत्सेव्ये तस्मिन्निरादरः । खिन्नस्य हि विपर्येति तत्त्वज्ञस्यापि शेमुषी ॥ २०३ ॥ २०३. यह सोचते हुए, वह सेव्य इस (नृप) के प्रति आदर रहित हो गया। तत्त्वज्ञ खिन्न की बुद्धि निश्चय ही विपरीत हो जाती है। प्रभातायां विभावर्यामथाऽऽस्थानस्थितो नृपः । आकार्यतां मातृगुप्त इति क्षत्तारमादिशत् ॥ २०४ ॥ २०४. जब विभावरी के प्रभात होने पर, सभास्थान पर पहुँचकर, राजा ने क्षत्ता को यह आदेश दिया, —'मातृगुप्त को बुलाओ - ततः प्रधावितानेकप्रतीहारप्रवेशितः । प्रविवेश महीभर्तुस्त्यक्ताश इव सोऽन्तिकम् ॥ २०५ ॥ २०५. तब अनेक प्रतीहारी दौड़कर, उसे ले आये और निराश सदृश वह, नृपति के समीप (सभाभवन में) प्रवेश किया। तस्मै कृतप्रणामाय मुहूर्तादिव पार्थिवः । भ्रूसंज्ञितेन व्यतरल्लेखं लेखाधिकारिणा ॥ २०६ ॥ २०६. प्रणाम करने वाले, उसे तत्क्षण पार्थिव ने भ्रूसंकेतित¹ लेखाधिकारी द्वारा लेख प्रदान किया। स्वयं च तमुवाचाङ्ग कश्मीरान्वेत्सि किं भवान् । गत्वा तत्राधिकारिभ्य एतच्छासनमर्प्यताम् ॥ २०७ ॥ २०७. 'अंग¹ ! क्या आप कश्मीर को जानते हैं? वहां जाकर, यह शासन ² पत्र अधिकारियों को अर्पण कीजिए। पाठभेद : प्रथा केवल इतिहास एवं साहित्य की सामग्री रह श्लोक संख्या २०४ में 'क्षत्तारं' का पाठभेद गयी है। 'द्वारस्थं' मिलता है। २०७ (१) अंग : यह सम्बोधनवाचक पादटिप्पणियाँ : अव्यय शब्द है। इसका अर्थ बहुत अच्छा होता है। २०६ (१) भ्रूसंकेतित : प्राचीन काल में धीमान् बहुत ठीक, 'अवश्य' 'सत्य है' 'अंगीकार है' पुराने विचार के राजा लोग स्वयं मुख से आज्ञा होता है। नहीं देते थे। केवल उनके संकेत से मन्त्री तथा (२) शासन : शासन का अर्थ यहां आज्ञापत्र सचिव आदेश का कार्य जान जाते थे। और किंवा फारसी का प्रचलित शब्द फरमान है। पाद- राजाज्ञा प्रसारित करते थे। टिप्पणी १५ (१) पृष्ठ १२ तथा तरंग ४ : मैने काठिराज को इस प्रकार का संकेत तथा ३२१; ८ : २६२५, द्रष्टव्य है। शासन पत्र लिखने व्यवहार करते देखा है। अब भारत में सभी देशी तथा उसके रखनेवालों को लेखाधिकारी कहा राज्यों का विलय हो गया है। यह अत्यन्त प्राचीन जाता था। ६५

५१४ राजतरंगिणी स शापितोऽस्मद्देहेन यो लेखं वाचयेत्पथि । संविदेषा प्रयत्नेन विस्मर्त्तव्या न जातुचित् ॥ २०८ ॥ २०८. पथ में जो लेख पढ़े, — "उसे मेरे देह की शपथ है।" प्रतिज्ञा प्रयत्न पूर्वक कभी मत भूलना। अविज्ञाताशयो राज्ञस्तामाज्ञां : क्लेशशङ्कितः । सोऽबुद्ध दहनज्वालां न तु रत्नाङ्कुरद्युतिम् ॥ २०६ ॥ २०९. (नृपति के) आशय को न जानकर क्लेश शङ्कित, उसने राजा के उस आज्ञा को अग्नि ज्वाला जाना, न कि रत्नाङ्कुर कान्ति। यथादेशस्तथेत्युक्त्वा मातृगुप्ते विनिर्गते । निर्गर्वः पूर्ववद्राजा तस्थावाप्तैः सहाल्पन् ॥ २१० ॥ २१०. 'जैसी आज्ञा' — कहकर, मातृगुप्त के विनिर्गत हो जाने पर, गर्व रहित नृप पूर्ववत् आप्तजनों के साथ संलाप करता हुआ, स्थिर रहा। अथाक्लेशोचितं क्षाममपाथेयमवान्धवम् । दृष्ट्वा यान्तं मातृगुप्तं निनिन्देति नृपं जनः ॥ २११ ॥ २११. अक्लेशोचित, क्षाम, सम्बल रहित, बन्धु, विहीन, मातृगुप्त को जाते हुए देख कर लोग नृप की निन्दा करने लगे। अहो नरेश्वरस्येयं यत्किंचनविधायिता । पृथग्जनोचिते कर्म्मण्यर्हतो निदधाति यः ॥ २१२ ॥ २१२. अहो ! 'नरेश्वर की यह यत्किञ्चन विधायिता ? जो कि सामान्य जनोचित कार्य में योग्यों को नियुक्त करता है। दुराशया धृतक्लेशं सेवमानमहर्निशम् । ध्रुवं क्लेशार्हमेवैनं ज्ञातवान्बुधो नृपः ॥ २१३ ॥ २१३. 'दुराशा से अहर्निश सेवा करते दुःखी इसे निश्चय ही विद्वान् नृप ने क्लेश सहिष्णु (ही) जाना। शासन शब्द का प्रयोग नीलमत पुराण में भी अर्थ में इसका उल्लेख किया गया है। किया है। यहाँ पर यह शब्द शिव शासन के रूप में व्यवहृत किया गया है। प्राचीन निबन्धों में बुद्ध श्वमह चापि यस्यैव शासने सऽवस्थितौ य। शासन के समान शिव शासन सम्बन्धी निबन्धों के नील० १२४७ परिशिष्ट

तृतीय तरंग ५१५ उपायं यं पुरस्कृत्य सेवते सेवकः प्रभुम् । अनन्तरङ्गस्तत्रैव योग्यं तं किल मन्यते¹ ॥ २१४ ॥ २१४. 'सेवक जिस उपाय को अग्रसर करके प्रभु की सेवा करता है, अन्तरङ्ग ( नृप ) उसे उस ( कार्य ) योग्य मानता है । सुखार्थी नागरिप्रतिभयशमात्प्रत्युत सुखं - जहौ शेषस्तत्पीकृततनु निषेव्यासुररिपुम् । यतस्तेनामुष्मिन्नधिगतवता क्लेशसहतां श्रमाधायि न्यस्तं निरवधि धराभारवहनम् ॥ २१५ ॥ २१५. 'नागरिपु ( गरुड़ ) के भय शमन से सुखाकांक्षी शेष नाग शरीर की शय्या बना, ( कर ) विष्णु की सेवा करके, प्रत्युत सुख का त्याग ( ही ) कर दिया। क्योंकि (उन्होंने) क्लेश सहन करने में समर्थ मानकर, इनपर श्रम प्रद पृथ्वी का भार सदैव के लिये न्यस्त कर दिया । अयमेतद्गृहीतेषु गुणवत्सु गुणाधिकम् । आत्मानं गुणवान्पश्यन्नास्थ्यैनमशिश्रियत्¹ ॥ २१६ ॥ २१६. 'उन गृहीत गुणवानों में स्वयं को अधिक गुणवान देखते हुये, इसने आस्था पूर्वक उसका ( नृप का ) आश्रय लिया था । अनन्तरङ्गः कोऽन्योऽस्माद्गुणान्दर्शयतेऽधिकान् । अस्मै गुणवते पूजां यश्चकार किलेदृशीम् ॥ २१७ ॥ २१७. अन्तर को न जानने वाला अन्य कौन इससे अधिक गुणवान ( गुणज्ञ ) हैं । जिसने इस गुणवान् की इस प्रकार पूजा की । पाठभेद : पादटिप्पणियाँ : २१४ ( १ ) राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रह का यह श्लोक संख्या २१४ में 'उपायं यं' का पाठभेद ६५वाँ श्लोक है । २१६ ( १ ) राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रह का यह 'उपायं तं' तथा 'उपायनं' मिलता है । ६६वाँ श्लोक है।

५१४ राजतरंगिणी स शापितोऽस्मद्देहेन यो लेखं वाचयेत्पथि । संविदेषा प्रयत्नेन विस्मर्तव्या न जातुचित् ॥ २०८ ॥ २०८. पथ में जो लेख पढ़े,—"उसे मेरे देह की शपथ है।" प्रतिज्ञा प्रयत्न पूर्वक कभी मत भूलना। अविज्ञाताशयो राज्ञस्तामाज्ञां क्लेशशङ्कितः । सोऽबुद्ध दहनज्वालां न तु रत्नाङ्कुरद्युतिम् ॥ २०६ ॥ २०९. (नृपति के) आशय को न जानकर क्लेश शङ्कित, उसने राजा के उस आज्ञा को अग्नि ज्वाला जाना, न कि रत्नाङ्कुर कान्ति। यथादेशस्तथेत्युक्त्वा मातृगुप्ते विनिर्गते । निर्गर्वः पूर्ववद्राजा तस्थावाप्तैः सहाल्पन् ॥ २१० ॥ २१०. 'जैसी आज्ञा'—कहकर, मातृगुप्त के विनिर्गत हो जाने पर, गर्व रहित नृप पूर्ववत् आप्तजनों के साथ संलाप करता हुआ, स्थिर रहा। अथाक्लेशोचितं क्षाममपाथेयमवान्धवम् । दृष्ट्वा यान्तं मातृगुप्तं निनिन्देति नृपं जनः ॥ २११ ॥ २११. अक्लेशोचित, क्षाम, सम्बल रहित, बन्धु, विहीन, मातृगुप्त को जाते हुए देख कर लोग नृप की निन्दा करने लगे। अहो नरेश्वरस्येयं यत्किंचनविधायिता । पृथग्जनोचिते कर्मण्यर्हतो निदधाति यः ॥ २१२ ॥ २१२. अहो ! 'नरेश्वर की यह यत्किञ्चन विधायिता ? जो कि सामान्य जनोचित काय में योग्यों को नियुक्त करता है। दुराशया धृतक्लेशं सेवमानमहर्निशम् । ध्रुवं क्लेशार्हमेवैनं ज्ञातवान्बुधो नृपः ॥ २१३ ॥ २१३. 'दुराशा से अहर्निश सेवा करते दुःखी इसे निश्चय ही विद्वान् नृप ने क्लेश सहिष्णु (ही) जाना। शासन शब्द का प्रयोग नीलमत पुराण में भी अर्थ में इसका उल्लेख किया गया है। दिया है। वहाँ पर यह शब्द शिव शासन के रूप में व्यवहृत किया गया है। प्राचीन निबन्धों में बुद्ध त्वमह चापि यस्यैव शासने सऽधस्थितौ य । शासन के समान शिव शासन सम्बन्धी निबंधों के नील० १२४७ परिशिष्ट