भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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तृतीय तरंग ५०९ निरर्थकान्साधुवादानन्यस्येव विदन्मम । अयमज्ञातहृदयो दुःखमास्ते ध्रुवं बहिः ॥ १८४ ॥ १८४. 'सामान्य लोगों के समान मेरे निरर्थक धन्यवादो को जानते हुये, अज्ञात हृदय यह निश्चय ही बाहर दुःखी होगा। चिरं चिन्तयतो यत्नात्सदृशीमस्य सत्क्रियाम् । देयं महार्हमद्यापि न किंचित्प्रतिभाति मे ॥ १८५ ॥ १८५. “इसके योग्य सत्कार चिर काल तक यत्न पूर्वक चिन्तन पर भी, मुझे बहुमूल्य कोई वस्तु आज भी इसे देय नहीं प्रतीत होती। अथवाऽस्यैव सूक्तेन स्मारितोऽस्म्यधुना यथा । वर्तते राजरहितं काम्यं कश्मीरमण्डलम् ॥ १८६ ॥ १८६. अभी इसकी सूक्ति ने मुझे स्मरण कराया है कि, काम्य कश्मीर मण्डल, जैसे राजरहित है। पात्रायास्मै मही तस्मात्सा मया प्रतिपाद्यते । अवधीर्य महीपालान्महतोऽप्यर्थनापरान् ॥ १८७ ॥ १८७. अतएव इसे (कश्मीर) चाहने वाले बड़े महीपालों को तिरस्कृत करके भी वह भूमि, इस पात्र को दे रहा हूँ।" इति निश्चित्य चतुरं क्षपायामेव पार्थिवः । गूढं व्यसर्जयद्दूतान्काश्मीरीः प्रकृतीः प्रति ॥ १८८ ॥ १८८. ऐसा निश्चय कर राजा ने रात्रि में शीघ्र ही कश्मीरी जनों (प्रकृति) के पास गुप्तरूप से दूतों को भेजा। 'आदिदेश च तान्यो वो दर्शयेच्छासनं मम । मातृगुप्ताभिधो राज्ये निश्शङ्कं सोऽभिषिच्यताम् ॥ १८६ ॥ १८९. और उन्हें आदेश दिया कि “तुम्हें जो मेरा शासन (आज्ञा पत्र) दिखाये, उस मातृगुप्त को (वहां) निःशंक होकर, अभिषिक्त करो।" अथ दूतेषु यातेषु लेखयित्वा स्वशासनम् । क्ष्मापतिस्तं क्षपाशेषं कृतकृत्योऽत्यवाहयत् ॥ १६० ॥ १९०. दूतों के चले जाने पर, स्वशासन को लिखकर, कृतकृत्य क्ष्मापति ने शेष रात्रि व्यतीत किया। श्लोक संख्या १८६ में 'कम्मी' का पाठभेद श्लोक संख्या १८९ में 'वो' का पाठभेद 'वा' 'कारमी' मिलता है । मिलता है ।