भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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५०८ राजतरंगिणी ततो भूभृदुवाचैनं कथं सम्यङ्निशाक्षणः । त्वयाऽवधारितो निद्रा कथं नाभूच्च ते निशि ॥ १७६ ॥ १७९. तदुपरान्त राजा उससे बोले- 'तुमने सम्यक् निशा क्षण कैसे जाना ? तुम्हें रात्रिमें निद्रा क्यों नहीं आयी ? अथ कृत्वा क्षणाच्छ्लोकमेतं तं स व्यजिज्ञपत् । अवस्थावेदनादाशां दैन्यं वा त्यक्तुमुद्यतः ॥ १८० ॥ १८०. अवस्था प्रतिवेदन से आशा एवं दैन्य को त्यागने के लिये उद्यत उम (मातृ- गुप्त) ने क्षण में यह श्लोक बनाकर उस (नृप) को ज्ञात कराया- शीतेनोद्धृषितस्य मापशिमिवचिन्तार्णवे मज्जतः शान्ताग्निं स्फुटिताधरस्य धमतः क्षुत्क्षामकण्ठस्य मे । निद्रा काऽप्यवमानितेव दयिता संत्यज्य दूरं गता सत्पात्रप्रतिपादितेव वसुधा न क्षीयते शर्वरी १ ॥ १८१ ॥ १८१. "माष फली तुल्य शीत से रोमांचित एवं चिन्ता सागर में निमज्जित, मेरो जिसके अग्नि को धौंकने से अधर फट गये हैं, क्षुधा से कण्ठ क्षीण हो गया है, निद्रा अपमानिता स्त्री तुल्य त्यागकर कहीं दूर चली गयी है, और रात्रि सत्पात्र में दी गयी पृथ्वी के समान समाप्त नहीं होती है।" तदाकर्ण्य महीपालः साधुवादैः परिश्रमम् । अभिनन्द्य कवीन्द्रं तं पूर्वस्थानं व्यसर्जत् ॥ १८२ ॥ १८२. महीपाल इसे सुनकर, साधुवादों द्वारा परिश्रमी उस कवीन्द्र को अभिनन्दित कर पूर्व स्थान पर विसर्जित कर दिया । अचिन्तयच्च धिङ्मां यः सगुणात्खिन्नचेतसः । दुःखोत्थप्तं वचः शृण्वन्नेवमेवाधुना स्थितः ॥ १८३ ॥ १८३. उस (राजा) ने चिन्तन किया- "मुझे धिक्कार है, जो कि गुण युक्त एवं खिन्नचेतस की दुःख उत्तप्त वाणी सुनते हुये, इस प्रकार अभी स्थित है । पाठभेद : श्लोक संख्या १८१ में 'मापशिमिव' का पाठ भेद 'मासमशिश्व' मिलता है। पादटिप्पणियां : १८१ (१) राजतरंगिणी सूखित संग्रह का ६०वां श्लोक है । पाठभेद : श्लोक संख्या १८२ में 'पूर्वस्थानं' का पाठभेद 'पूर्वस्थाने' मिलता है ।