राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ५११ त्यागिनो निष्कलङ्कस्य को दोषोऽस्य महीपतेः । ममापुण्यं तु तन्निन्द्यं यच्छ्रेयःप्रतिबन्धकम् ॥ १९६ ॥ १९६. "त्यागी एवं निष्कलङ्क इस नृपति का क्या दोष है ? मेरा अपुण्य ही निन्द्य है, जो कि श्रेय का प्रतिबन्धक है रत्नोज्ज्वलाः प्रविकिरंल्लहरीः समीरै- रन्धिः क्रियेत यदि रुद्धतटाभिमुख्यः । दोषोऽर्थिनः स खलु भाग्यविपर्ययाणां दातुर्मनागपि न तस्य तु दातृवायाः¹ ॥ १९७ ॥ १९७. "रत्नों² के समुज्ज्वल लहरियों का विकिरण (प्रसार) करते हुए, समुद्र को यदि वायु तट से दूर कर दे—तो वह प्रार्थी के भाग्य विपर्यय का ही दोष है न कि उस दाता की दानशीलता का उच्चानफललुब्धानां वरं राजोपजीविनः । न तु तत्स्वामिनस्तीव्रपरिक्लेशैः फलन्ति ये ॥ १९८ ॥ १९८. "उदात्त फलाभिलाषियों में नृपोपजीवी श्रेष्ठ होते हैं, न कि वे स्वामी जो कि तीव्र परिश्रम पर फल प्रदान करते हैं । तिष्ठन्ति ये पशुपतेः किल पादमूले संप्राप्यते झटिति तैर्नहि भस्मनोऽन्यत् । ये तद्वृषस्य तु समुज्ज्वलजातरूप- प्राप्त्या न कानि सुदिनानि सदैव तेषाम्¹ ॥ १९६ ॥ १९९. "जो पशुपति के पादमूल में बैठते हैं, वे तत्काल भस्म के अतिरिक्त और कुछ नहीं प्राप्त करते; जो लोग उनके वृष का आश्रय लेते हैं, उनके लिये सदैव समुज्ज्वल स्वर्ण प्राप्ति के अतिरिक्त और कौन सुदिन हो सकता है ? पाठभेद : श्लोक संख्या १९७ में 'प्रविकिरंल्ल' का 'प्रवि- किरेल्ल', 'प्रविकरंल्ल' तथा 'पर्ययाणां' का पाठभेद 'पर्ययेण' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १९७ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रहका ६२वां श्लोक है । (२) रत्न : श्री रणजीत सीताराम पण्डित ने इसका भावार्थ टिप्पणी में किया है कि रत्नों की खान समुद्र रत्नाकर है । वह दाता है । वह अपनी लहरो से रत्न सहित तट की ओर याचक किंवा अभ्यर्थी को रत्न देने बढता है । किन्तु वायु उसको इस कार्य मे विरत कर देती है । १९६ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का ६३ वा श्लोक है । श्री सीताराम पण्डित इस श्लोक के अनुवाद की टिप्पणी में लिखते हैं—'इस श्लोक से यह प्रतीत होता है कि कल्हण के समय में नन्दी के उपासकों की कमी नहीं थी । जिन्हें वह शिव की अपेक्षा सरलता से मिल जाता था। नन्दी सुर एवं असुर के समुद्र मन्थन से रत्न रूप प्राप्त हुआ था ।