राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१२ राजतरंगिणी चिन्तयन्नपि पश्यामि न कंचिद्दोषमात्मनः । यातो विरक्तिं यं ज्ञात्वा सेव्यमानोऽप्ययं नृपः ॥ २०० ॥ २००. "विचार करने पर भी अपना कोई दोष नहीं देखता हूँ जिसे जानकर सेव्य- मान यह नृप विरक्त हो गया है। अथवाऽनादृतोऽन्येन संश्रामोऽन्तकमाप्नुयात् । कः फलेनाभिसंबन्धं गतानुगतिकात्प्रभोः ॥ २०१ ॥ २०१. अथवा—अन्य से अनादृत, किसने निकट जाकर, गतानुगतिक प्रभु द्वारा फल प्राप्त किया है ? अन्तर्ये सततं लुठन्त्यगणितास्तानेव पाथोघरै- रात्तानापततस्तरङ्गवलयैरालिङ्गय गृह्णन्नसौ । व्यक्तं मौक्तिकरततां जलकणान्संप्रापयत्यम्बुधिः प्रायोऽन्येन कृतादरो लघुरपि प्राप्तोऽर्च्यते स्वामिभिः ॥ २०२ ॥ २०२. जो अभ्यन्तर में निरन्तर असंख्य जल कण उपेक्षित रहते लोटते हैं; उन्हें ही जलद, जब ग्रहण कर गिराता है, तब तरंग वलयों से आलिंगन कर, ग्रहण करते हुए, यह समुद्र सुस्पष्ट रूप से मौक्तिक२ रत्न बना देता है। प्रायः अन्य से समादृत लघु भी समीप पहुंचकर, स्वामियों से समादृत होता है। नन्दी की उपासना निस्सन्देह सबसे सरल है। है: सागर मध्यस्थित जलकण समूह अनादृत नन्दी शिवाज्ञा के गर्भ गृह के बाहर बना रहता है। होकर रहता है। किन्तु मेघमाल द्वारा गृहीत उसका मुख द्वार के बाहर शिव की ओर रहता है। होकर पुनर्वार पतित होने पर समुद्र अपने तरंग मन्दिर का द्वार शिवा गर्भ गृह का द्वार बन्द करने को विस्तार कर उन्हें ग्रहण करता है और पर शिव का दर्शन नही मिलता किन्तु नन्दी का मुक्ता में परिणत होता है। लघुव्यक्ति भी किसी समय भी मिल जाता है। वह खुले में प्रथमतः दूसरों द्वारा समादर पाने के पश्चात् राजा रहते हैं। का सम्मान लाभ करते हैं। पाठभेद : (२) मौक्तिक: यह सुन्दर पद है। राजाओ श्लोक संख्या २०० में 'क' का पाठभेद 'किं' की प्रकृति का यह चित्रण करता है। राजा मिलता है। उनका आदर करते हैं जो किसी दूसरे राजा द्वारा श्लोक संख्या २०२ में 'रात्ता' का 'रार्ता' ; समादृत हो चुके रहते हैं। 'पतत' का 'पतितः' तथा 'दर्यते' की पाठभेद मुक्ता के विषय में गाथा प्रचलित है कि 'ध्यंते' मिलता है। स्वाती का वर्षा जल गिरता है। समुद्र में सीप पादटिप्पणियाँ : उन जलों को ग्रहण करते हैं। वह जलबिन्दु सीप २०२ (१) राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रह का ९४वां में मुक्ता हो जाता है। भर्तृहरि ने कहा है : श्लोक है। इस पद का एक अर्थ यह भी हो सकता 'स्वात्यां सागरशुक्तिमध्यपतितम्' सः मुक्तिका जायते।'