भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 667

५०६ राजतरंगिणी तदमुष्य गुणित्वस्य तीव्रसेवाश्रमस्य च। प्रतिपत्त्या कतमया तावदानृण्यमाप्नुयाम् ॥ १६६ ॥ १६६. 'तीव्र सेवाश्रमी एवं गुणी इससे मैं किस समादर द्वारा उऋणता प्राप्त कर सकता हूँ ?' इति चिन्तयतस्तस्य राज्ञस्तं सेवकं प्रति । स्वप्रसादोचिता काचित्प्रत्यभान्नैव सत्क्रिया ॥ १६७ ॥ १६७. इस प्रकार चिन्ता करते उस नृपति को उस सेवक के प्रति स्वप्रसादोचित कोई सत्कार नहीं प्रतीत हुआ । ततः प्रावर्तत स्फारनीहारलववाहिभिः । दहन्निवाङ्गं प्रालेयपवमानैर्हिमागमः ॥ १६८ ॥ १६८. तदनन्तर प्रचुर नीहारकणवाही हिम वायु से युक्त हिमागम (शिशिर) अंग को दग्ध सा करता (हुआ) आया । संततध्वान्तमिषतस्तीव्रशीतवशीकृताः । आशाश्चकाशिरे नीलनिचोलाच्छादिता इव ॥ १६६ ॥ १६९. तीव्र शीत से विवश दिशायें निरन्तर (घने) अन्धकार के व्याज से नील निचोल से आच्छादित तुल्य शोभित हुईं । शीतार्त्या द्युमणावौर्वदहनोष्मभिलाषतः । द्रुतं यातीव जलधिं दिनानि लघुतां ययुः ॥ १७० ॥ १७०. शीत त्रास के कारण मानो बड़वाग्नि ऊष्मा की अभिलाषा से, सूर्य के शीघ्र जलनिधि गमन करने पर, दिन छोटे होने लगे । अथ दीपोज्ज्वले धाम्नि लसद्धीपहसन्तिके । कदाचिन्भूपतिर्दैवादर्धरात्रे व्यबुध्यत ॥ १७१ ॥ १७१. किसी समय जब दीप से प्रकाशित गृह में प्रज्वलित अंगारधानी (हसन्ती) शोभित हो रही थी—राजा अकस्मात् (दैवात्) अर्धरात्रि में प्रबुद्ध हुआ । स हेमन्तानिलैर्भूरिझांकारपरुषैः पुरः । दीपान्प्रकम्पितानीषत्प्रविष्टैर्धाग्नि दृष्टवान् ॥ १७२ ॥ १७२. उसने गृह में प्रविष्ट प्रभूत झांकार१ ध्वनि से परुष, हेमन्त कालीन वायु से प्रकम्पित दीप सामने देखा । श्लोक संख्या १६६ में 'प्नुयाम्' का पाठभेद पादटिप्पणियाँ : 'प्नुयात्' मिलना है। श्लोक संख्या १७१ में हसन्तिका' का पाठभेद १७२ (१) झांकार : इस शब्द का उल्लेख 'मानाग्निका' मिलता है। कल्हण ने पुनः तरंग ८.१५३ में किया है।