भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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तृतीय-तरंग ५०५ तानुज्ज्वलयितु भृत्यानन्विष्यन्नभ्यभाषत । यामिकेषु बहिः सङ्गः को वर्तत इति स्फुटम् ॥ १७३ ॥ १७३. तदनन्तर उन्हें प्रज्वलित करने के लिये भृत्यों को खोजते हुए सुस्पष्ट कहा— "बाहर यामिक" में कौन उपस्थित है ?" सुखसुप्तेषु सर्वेषु बाह्यकक्ष्यान्तरात्सतः । राजन्यहमहं मातृगुप्त इत्यशृणोद्वचः ॥ १७४ ॥ १७४. उस समय सभी लोग सुख पूर्वक सुप्त थे। बाह्य कक्ष में से—"राजन् ! मैं मातृगुप्त हूँ" यह वाणी (राजा ने) सुनी। प्रविशेति स्वयं राज्ञा दत्तानुज्ञस्ततो गृहम् । लक्ष्मीसांनिध्यरम्यं तददृष्टोऽन्यैर्विवेश सः ॥ १७५ ॥ १७५. राजा के स्वयं यह आज्ञा देने पर 'प्रवेश करो'—बिना दूसरे के ज्ञात हुये, गृह में प्रवेश किया। दीपानुज्ज्वलयेत्युक्तो निष्पाद्य चतुरैः पदैः । बहिर्यासासुरुचेऽथ क्षणं तिष्ठेति भूभुजा ॥ १७६ ॥ १७६. 'दीपों को जलाओं'—कहे जाने पर, निष्पादित करके (दीप जलाकर) चार पद बाहर जाने पर राजा ने उससे कहा, —'क्षण भर रुको'। स भयद्विगुणीभूतशीतकम्पः प्रभोः पुरः । किंस्विद्वक्तीति विमृशन्नातिदूरेऽभ्युपाविशत् ॥ १७७ ॥ १७७. भय से उस (मातृगुप्त) का शीत कम्पन द्विगुणित हो गया। 'वह क्या कहेंगे।' विचार करते प्रभु के सम्मुख न अति दूर बैठ गया। अथ पप्रच्छ भूपालः कियत्यस्ति निशेति तम् । सोऽभ्यधादेव यामिन्या यामः सार्धोऽवशिष्यते ॥ १७८ ॥ १७८. राजा ने उससे पूछा—'कितनी रात्रि शेष है ?' उसने कहा—'यामिनी का डेढ़ याम (डेढ प्रहर) अवशिष्ट है।' १७३ (१) यामिक : याम का अर्थ रात्रि 'यंयो स ऊचेय', तथा 'यियासुरूचे च' मिलता है। तथा प्रहर दोनों होता है। रात्रि में पहरा देने वालो श्लोक संख्या १७१ में 'भय' का पाठभेद 'मय' को यामिक कहा जाता है। मिलता है। पाठभेद : पादटिप्पणियाँ : श्लोक संख्या १७५ में 'दृष्टो' का पाठभेद १७७ ( १ ) बैठ गया : यहाँ पर कल्हण ने 'पृष्टो' मिलता है। 'उपाविशत्' शब्द का प्रयोग किया है। इसका अर्थ बैठना होता है। अन्य अनुवादकर्ताओं ने 'वह श्लोकसंख्या १७६ में 'यियासुरूचेऽथ' का पाठभेद खड़ा हो गया' अर्थ किया है।