राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
५०६ राजतरंगिणी तदमुष्य गुणित्वस्य तीव्रसेवाश्रमस्य च। प्रतिपत्त्या कतमया तावदानृण्यमाप्नुयाम् ॥ १६६ ॥ १६६. 'तीव्र सेवाश्रमी एवं गुणी इससे मैं किस समादर द्वारा उऋणता प्राप्त कर सकता हूँ ?' इति चिन्तयतस्तस्य राज्ञस्तं सेवकं प्रति । स्वप्रसादोचिता काचित्प्रत्यभान्नैव सत्क्रिया ॥ १६७ ॥ १६७. इस प्रकार चिन्ता करते उस नृपति को उस सेवक के प्रति स्वप्रसादोचित कोई सत्कार नहीं प्रतीत हुआ । ततः प्रावर्तत स्फारनीहारलववाहिभिः । दहन्निवाङ्गं प्रालेयपवमानैर्हिमागमः ॥ १६८ ॥ १६८. तदनन्तर प्रचुर नीहारकणवाही हिम वायु से युक्त हिमागम (शिशिर) अंग को दग्ध सा करता (हुआ) आया । संततध्वान्तमिषतस्तीव्रशीतवशीकृताः । आशाश्चकाशिरे नीलनिचोलाच्छादिता इव ॥ १६६ ॥ १६९. तीव्र शीत से विवश दिशायें निरन्तर (घने) अन्धकार के व्याज से नील निचोल से आच्छादित तुल्य शोभित हुईं । शीतार्त्या द्युमणावौर्वदहनोष्मभिलाषतः । द्रुतं यातीव जलधिं दिनानि लघुतां ययुः ॥ १७० ॥ १७०. शीत त्रास के कारण मानो बड़वाग्नि ऊष्मा की अभिलाषा से, सूर्य के शीघ्र जलनिधि गमन करने पर, दिन छोटे होने लगे । अथ दीपोज्ज्वले धाम्नि लसद्धीपहसन्तिके । कदाचिन्भूपतिर्दैवादर्धरात्रे व्यबुध्यत ॥ १७१ ॥ १७१. किसी समय जब दीप से प्रकाशित गृह में प्रज्वलित अंगारधानी (हसन्ती) शोभित हो रही थी—राजा अकस्मात् (दैवात्) अर्धरात्रि में प्रबुद्ध हुआ । स हेमन्तानिलैर्भूरिझांकारपरुषैः पुरः । दीपान्प्रकम्पितानीषत्प्रविष्टैर्धाग्नि दृष्टवान् ॥ १७२ ॥ १७२. उसने गृह में प्रविष्ट प्रभूत झांकार१ ध्वनि से परुष, हेमन्त कालीन वायु से प्रकम्पित दीप सामने देखा । श्लोक संख्या १६६ में 'प्नुयाम्' का पाठभेद पादटिप्पणियाँ : 'प्नुयात्' मिलना है। श्लोक संख्या १७१ में हसन्तिका' का पाठभेद १७२ (१) झांकार : इस शब्द का उल्लेख 'मानाग्निका' मिलता है। कल्हण ने पुनः तरंग ८.१५३ में किया है।
तृतीय तरंग ५०७ तानुज्ज्वलयितु भृत्यानन्विष्यन्नभ्यधात्ततः । यामिकेषु बहिः सञ्जः को वर्तत इति स्फुटम् ॥ १७३ ॥ १७३. तदनन्तर उन्हें प्रज्वलित करने के लिये भृत्यों को खोजते हुए सुस्पष्ट कहा— “बाहर यामिक¹ में कौन उपस्थित है ?” सुखसुप्तेषु सर्वेषु बाह्यकक्ष्यान्तरात्ततः । राजनयमहं मातृगुप्त इत्यशृणोद्वचः ॥ १७४ ॥ १७४. उस समय सभी लोग सुख पूर्वक सुप्त थे। बाह्य कक्ष में से—“राजन् ! मैं मातृगुप्त हूँ” यह वाणी ( राजा ने ) सुनी । प्रविशेति स्वयं राज्ञा दत्तानुज्ञस्ततो गृहम् । लक्ष्मीसांनिध्यरम्यं तददृष्टोऽन्यैर्विवेश सः ॥ १७५ ॥ १७५. राजा के स्वयं यह आज्ञा देने पर 'प्रवेश करो'— बिना दूसरे के ज्ञात हुये, गृह में प्रवेश किया । दीपानुज्ज्वलयेत्युक्तो निष्पाद्य चतुरः पदैः । बहिर्यायाशुरुचेऽथ क्षणं तिष्ठेति भूभुजा ॥ १७६ ॥ १७६. 'दीपों को जलाओं'— कहे जाने पर, निष्पादित करके ( दीप जलाकर ) चार पद बाहर जाने पर राजा ने उससे कहा, —'क्षण भर रुको' । स भयद्विगुणीभूतशीतकम्पः प्रभोः पुरः । किंस्विद्वक्तीति विमृशन्नातिदूरेऽभ्युपाविशत् ॥ १७७ ॥ १७७. भय से उस ( मातृगुप्त ) का शीत कम्पन द्विगुणित हो गया । 'वह क्या कहेंगे ।' विचार करते प्रभु के सम्मुख न अति दूर बैठ गया¹ । अथ पप्रच्छ भूपालः कियत्यस्ति निशेति तम् । सोऽभ्यधादेव यामिन्या यामः सार्धोऽवशिष्यते ॥ १७८ ॥ १७८. राजा ने उससे पूछा— 'कितनी रात्रि शेष है ?' उसने कहा— 'यामिनी का डेढ़ याम ( डेढ़ प्रहर ) अवशिष्ट है ।' १७३ ( १ ) यामिक : याम का अर्थ रात्रि 'र्ययो स ऊचेय', तथा 'यियासुरुच्चे च' मिलता है । तथा प्रहर दोनो होता है । रात्रि मे पहरा देने वालों श्लोक संख्या १७७ में 'भय' का पाठभेद 'मय' को यामिक कहा जाता है । मिलता है । पाठभेद : पादटिप्पणियाँ : श्लोक संख्या १७५ में 'दृष्टो' का पाठभेद १७७ ( १ ) बैठ गया : यहाँ पर कल्हण ने 'पृष्टो' मिलता है । 'उपाविशत्' शब्द का प्रयोग किया है । इसका अर्थ बैठना होता है । अन्य अनुवादकर्ताओं ने 'वह श्लोकसंख्या १७६ मे 'यियासुरुचेऽथ' का पाठभेद खड़ा हो गया' अर्थ किया है ।
५०८ राजतरंगिणी ततो भूभृदुवाचैनं कथं सम्यङ्निशाक्षणः । त्वयाऽवधारितो निद्रा कथं नाभूच्च ते निशि ॥ १७६ ॥ १७९. तदुपरान्त राजा उससे बोले- 'तुमने सम्यक् निशा क्षण कैसे जाना ? तुम्हें रात्रिमें निद्रा क्यों नहीं आयी ? अथ कृत्वा क्षणाच्छ्लोकमेतं तं स व्यजिज्ञपत् । अवस्थावेदनादाशां दैन्यं वा त्यक्तुमुद्यतः ॥ १८० ॥ १८०. अवस्था प्रतिवेदन से आशा एवं दैन्य को त्यागने के लिये उद्यत उम (मातृ- गुप्त) ने क्षण में यह श्लोक बनाकर उस (नृप) को ज्ञात कराया- शीतेनोद्धृषितस्य मापशिमिवचिन्तार्णवे मज्जतः शान्ताग्निं स्फुटिताधरस्य धमतः क्षुत्क्षामकण्ठस्य मे । निद्रा काऽप्यवमानितेव दयिता संत्यज्य दूरं गता सत्पात्रप्रतिपादितेव वसुधा न क्षीयते शर्वरी १ ॥ १८१ ॥ १८१. "माष फली तुल्य शीत से रोमांचित एवं चिन्ता सागर में निमज्जित, मेरो जिसके अग्नि को धौंकने से अधर फट गये हैं, क्षुधा से कण्ठ क्षीण हो गया है, निद्रा अपमानिता स्त्री तुल्य त्यागकर कहीं दूर चली गयी है, और रात्रि सत्पात्र में दी गयी पृथ्वी के समान समाप्त नहीं होती है।" तदाकर्ण्य महीपालः साधुवादैः परिश्रमम् । अभिनन्द्य कवीन्द्रं तं पूर्वस्थानं व्यसर्जत् ॥ १८२ ॥ १८२. महीपाल इसे सुनकर, साधुवादों द्वारा परिश्रमी उस कवीन्द्र को अभिनन्दित कर पूर्व स्थान पर विसर्जित कर दिया । अचिन्तयच्च धिङ्मां यः सगुणात्खिन्नचेतसः । दुःखोत्थप्तं वचः शृण्वन्नेवमेवाधुना स्थितः ॥ १८३ ॥ १८३. उस (राजा) ने चिन्तन किया- "मुझे धिक्कार है, जो कि गुण युक्त एवं खिन्नचेतस की दुःख उत्तप्त वाणी सुनते हुये, इस प्रकार अभी स्थित है । पाठभेद : श्लोक संख्या १८१ में 'मापशिमिव' का पाठ भेद 'मासमशिश्व' मिलता है। पादटिप्पणियां : १८१ (१) राजतरंगिणी सूखित संग्रह का ६०वां श्लोक है । पाठभेद : श्लोक संख्या १८२ में 'पूर्वस्थानं' का पाठभेद 'पूर्वस्थाने' मिलता है ।
तृतीय तरंग ५०९ निरर्थकान्साधुवादानन्यस्येव विदन्मम । अयमज्ञातहृदयो दुःखमास्ते ध्रुवं बहिः ॥ १८४ ॥ १८४. 'सामान्य लोगों के समान मेरे निरर्थक धन्यवादो को जानते हुये, अज्ञात हृदय यह निश्चय ही बाहर दुःखी होगा। चिरं चिन्तयतो यत्नात्सदृशीमस्य सत्क्रियाम् । देयं महार्हमद्यापि न किंचित्प्रतिभाति मे ॥ १८५ ॥ १८५. “इसके योग्य सत्कार चिर काल तक यत्न पूर्वक चिन्तन पर भी, मुझे बहुमूल्य कोई वस्तु आज भी इसे देय नहीं प्रतीत होती। अथवाऽस्यैव सूक्तेन स्मारितोऽस्म्यधुना यथा । वर्तते राजरहितं काम्यं कश्मीरमण्डलम् ॥ १८६ ॥ १८६. अभी इसकी सूक्ति ने मुझे स्मरण कराया है कि, काम्य कश्मीर मण्डल, जैसे राजरहित है। पात्रायास्मै मही तस्मात्सा मया प्रतिपाद्यते । अवधीर्य महीपालान्महतोऽप्यर्थनापरान् ॥ १८७ ॥ १८७. अतएव इसे (कश्मीर) चाहने वाले बड़े महीपालों को तिरस्कृत करके भी वह भूमि, इस पात्र को दे रहा हूँ।" इति निश्चित्य चतुरं क्षपायामेव पार्थिवः । गूढं व्यसर्जयद्दूतान्काश्मीरीः प्रकृतीः प्रति ॥ १८८ ॥ १८८. ऐसा निश्चय कर राजा ने रात्रि में शीघ्र ही कश्मीरी जनों (प्रकृति) के पास गुप्तरूप से दूतों को भेजा। 'आदिदेश च तान्यो वो दर्शयेच्छासनं मम । मातृगुप्ताभिधो राज्ये निश्शङ्कं सोऽभिषिच्यताम् ॥ १८६ ॥ १८९. और उन्हें आदेश दिया कि “तुम्हें जो मेरा शासन (आज्ञा पत्र) दिखाये, उस मातृगुप्त को (वहां) निःशंक होकर, अभिषिक्त करो।" अथ दूतेषु यातेषु लेखयित्वा स्वशासनम् । क्ष्मापतिस्तं क्षपाशेषं कृतकृत्योऽत्यवाहयत् ॥ १६० ॥ १९०. दूतों के चले जाने पर, स्वशासन को लिखकर, कृतकृत्य क्ष्मापति ने शेष रात्रि व्यतीत किया। श्लोक संख्या १८६ में 'कम्मी' का पाठभेद श्लोक संख्या १८९ में 'वो' का पाठभेद 'वा' 'कारमी' मिलता है । मिलता है ।
५१० राजतरंगिणी मातृगुप्तस्तु नृपतेः संलापमपि निष्फलम् । ध्यायन्गृहीतनैराश्यस्त्यक्तभार इवाभवत् ॥ १९१ ॥ १९१. मातृगुप्त नृपति के संलाप को भी निष्फल मानता हुआ. निराश होकर, भार रहित तुल्य हो गया । अन्तर्दध्यौ च कर्तव्यं कृतं शान्तोऽद्य संशयः । आशापिशाचिकात्यक्तश्चरिष्याम्यधुना सुखम् ॥ १९२ ॥ १९२. अन्तःकरण में ( यह ) धारण कर लिया—'कर्त्तव्य किया । आज संशय शान्त हो गया । अब आशा स्वरूप पिशाची से मुक्त हुआ, सुख पूर्वक विचरण करूँगा । गतानुगतिकत्वेन कोऽयमासीन्मम भ्रमः । जनप्रवादात्सेव्यत्वं येनास्य ज्ञातवानहम् ॥ १९३ ॥ १९३. “गतानुगतिका के कारण मुझे यह कौन भ्रम हो गया था, जिसे जनप्रवाद वस इसे सेव्य मान लिया । भुञ्जानाः पवनं सरीसृपगणाः प्रख्यापिता भोगिनो गायद्भृङ्गनिवारका निगदिता विस्तीर्णकर्णा गजाः । यश्चाभ्यन्तरसंभृतोष्मविकृतिः प्रोक्तः शमी स द्रुमो लोकेनेति निरर्गलं प्रलपता सर्वं विपर्यासितम् ॥ १९४ ॥ १९४. “पवन के अशन करने वाले सर्पों को 'भोगी' प्रख्यात किया; गान करते भृंगों के निवारक गजों को 'विस्तीर्णकर्ण' कहा; जो अभ्यन्तर में अग्नि विकार धारण करता है; उस द्रुम को शमी कहा—इस प्रकार संसार ने सबको विपरीत कर दिया है अथवा विद्यनेऽमुष्य न काऽप्यनभिगम्यता । लक्ष्मीप्रणयिनो येन कृताः प्रणयिनां गृहाः ॥ १६५ ॥ १९५. "इसके पास जाने में कोई प्रतिबन्ध नहीं है, जिसने अपने प्रणयी जनों को गृह लक्ष्मी सम्पन्न कर दिया है— श्लोक संख्या १९४ में 'प्रख्यापिता' का पाठभेद 'प्रख्यायिता' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १९५ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का ६१वा श्लोक है । (२) भोगी आदि : कल्हण ने यहाँ भोगी शब्द की उपमा दी है। भोगी शब्द भुज अर्थात् भोगने से बना है । गज शब्द गे अर्थात् गाने से बना है । शमी शब्द शम् अर्थात् आन्तरिक शान्त होना है । शमी वृक्ष से अग्नि तैय्यार की जाती है । उससे रगड़ कर अग्नि उत्पन्न की जाती है । प्राचीन गाथा है । शमी की शाखा में अग्नि छिपी रहती है । आकाशचारी सर्प भी होते है । वे उड़ते हैं । मैने पेड़ो पर अत्यन्त पतला लम्बा साँप देखा है जो एक शाखा से दूसरी शाखा पर इस प्रकार जाता है कि उड़ता मालूम पड़ता है । पुरानी गाथा है कि नाग किंवा सर्प भी उड़ते है । मैंने अभी तक इस प्रकार का सर्प अपनी आँखों नही देखा है । सर्प, गज तथा शमी यहाँ श्लेष है ।
तृतीय तरंग ५११ त्यागिनो निष्कलङ्कस्य को दोषोऽस्य महीपतेः । ममापुण्यं तु तन्निन्द्यं यच्छ्रेयःप्रतिबन्धकम् ॥ १९६ ॥ १९६. "त्यागी एवं निष्कलङ्क इस नृपति का क्या दोष है ? मेरा अपुण्य ही निन्द्य है, जो कि श्रेय का प्रतिबन्धक है रत्नोज्ज्वलाः प्रविकिरंल्लहरीः समीरै- रन्धिः क्रियेत यदि रुद्धतटाभिमुख्यः । दोषोऽर्थिनः स खलु भाग्यविपर्ययाणां दातुर्मनागपि न तस्य तु दातृवायाः¹ ॥ १९७ ॥ १९७. "रत्नों² के समुज्ज्वल लहरियों का विकिरण (प्रसार) करते हुए, समुद्र को यदि वायु तट से दूर कर दे—तो वह प्रार्थी के भाग्य विपर्यय का ही दोष है न कि उस दाता की दानशीलता का उच्चानफललुब्धानां वरं राजोपजीविनः । न तु तत्स्वामिनस्तीव्रपरिक्लेशैः फलन्ति ये ॥ १९८ ॥ १९८. "उदात्त फलाभिलाषियों में नृपोपजीवी श्रेष्ठ होते हैं, न कि वे स्वामी जो कि तीव्र परिश्रम पर फल प्रदान करते हैं । तिष्ठन्ति ये पशुपतेः किल पादमूले संप्राप्यते झटिति तैर्नहि भस्मनोऽन्यत् । ये तद्वृषस्य तु समुज्ज्वलजातरूप- प्राप्त्या न कानि सुदिनानि सदैव तेषाम्¹ ॥ १९६ ॥ १९९. "जो पशुपति के पादमूल में बैठते हैं, वे तत्काल भस्म के अतिरिक्त और कुछ नहीं प्राप्त करते; जो लोग उनके वृष का आश्रय लेते हैं, उनके लिये सदैव समुज्ज्वल स्वर्ण प्राप्ति के अतिरिक्त और कौन सुदिन हो सकता है ? पाठभेद : श्लोक संख्या १९७ में 'प्रविकिरंल्ल' का 'प्रवि- किरेल्ल', 'प्रविकरंल्ल' तथा 'पर्ययाणां' का पाठभेद 'पर्ययेण' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १९७ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रहका ६२वां श्लोक है । (२) रत्न : श्री रणजीत सीताराम पण्डित ने इसका भावार्थ टिप्पणी में किया है कि रत्नों की खान समुद्र रत्नाकर है । वह दाता है । वह अपनी लहरो से रत्न सहित तट की ओर याचक किंवा अभ्यर्थी को रत्न देने बढता है । किन्तु वायु उसको इस कार्य मे विरत कर देती है । १९६ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का ६३ वा श्लोक है । श्री सीताराम पण्डित इस श्लोक के अनुवाद की टिप्पणी में लिखते हैं—'इस श्लोक से यह प्रतीत होता है कि कल्हण के समय में नन्दी के उपासकों की कमी नहीं थी । जिन्हें वह शिव की अपेक्षा सरलता से मिल जाता था। नन्दी सुर एवं असुर के समुद्र मन्थन से रत्न रूप प्राप्त हुआ था ।
५१२ राजतरंगिणी चिन्तयन्नपि पश्यामि न कंचिद्दोषमात्मनः । यातो विरक्तिं यं ज्ञात्वा सेव्यमानोऽप्ययं नृपः ॥ २०० ॥ २००. "विचार करने पर भी अपना कोई दोष नहीं देखता हूँ जिसे जानकर सेव्य- मान यह नृप विरक्त हो गया है। अथवाऽनादृतोऽन्येन संश्रामोऽन्तकमाप्नुयात् । कः फलेनाभिसंबन्धं गतानुगतिकात्प्रभोः ॥ २०१ ॥ २०१. अथवा—अन्य से अनादृत, किसने निकट जाकर, गतानुगतिक प्रभु द्वारा फल प्राप्त किया है ? अन्तर्ये सततं लुठन्त्यगणितास्तानेव पाथोघरै- रात्तानापततस्तरङ्गवलयैरालिङ्गय गृह्णन्नसौ । व्यक्तं मौक्तिकरततां जलकणान्संप्रापयत्यम्बुधिः प्रायोऽन्येन कृतादरो लघुरपि प्राप्तोऽर्च्यते स्वामिभिः ॥ २०२ ॥ २०२. जो अभ्यन्तर में निरन्तर असंख्य जल कण उपेक्षित रहते लोटते हैं; उन्हें ही जलद, जब ग्रहण कर गिराता है, तब तरंग वलयों से आलिंगन कर, ग्रहण करते हुए, यह समुद्र सुस्पष्ट रूप से मौक्तिक२ रत्न बना देता है। प्रायः अन्य से समादृत लघु भी समीप पहुंचकर, स्वामियों से समादृत होता है। नन्दी की उपासना निस्सन्देह सबसे सरल है। है: सागर मध्यस्थित जलकण समूह अनादृत नन्दी शिवाज्ञा के गर्भ गृह के बाहर बना रहता है। होकर रहता है। किन्तु मेघमाल द्वारा गृहीत उसका मुख द्वार के बाहर शिव की ओर रहता है। होकर पुनर्वार पतित होने पर समुद्र अपने तरंग मन्दिर का द्वार शिवा गर्भ गृह का द्वार बन्द करने को विस्तार कर उन्हें ग्रहण करता है और पर शिव का दर्शन नही मिलता किन्तु नन्दी का मुक्ता में परिणत होता है। लघुव्यक्ति भी किसी समय भी मिल जाता है। वह खुले में प्रथमतः दूसरों द्वारा समादर पाने के पश्चात् राजा रहते हैं। का सम्मान लाभ करते हैं। पाठभेद : (२) मौक्तिक: यह सुन्दर पद है। राजाओ श्लोक संख्या २०० में 'क' का पाठभेद 'किं' की प्रकृति का यह चित्रण करता है। राजा मिलता है। उनका आदर करते हैं जो किसी दूसरे राजा द्वारा श्लोक संख्या २०२ में 'रात्ता' का 'रार्ता' ; समादृत हो चुके रहते हैं। 'पतत' का 'पतितः' तथा 'दर्यते' की पाठभेद मुक्ता के विषय में गाथा प्रचलित है कि 'ध्यंते' मिलता है। स्वाती का वर्षा जल गिरता है। समुद्र में सीप पादटिप्पणियाँ : उन जलों को ग्रहण करते हैं। वह जलबिन्दु सीप २०२ (१) राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रह का ९४वां में मुक्ता हो जाता है। भर्तृहरि ने कहा है : श्लोक है। इस पद का एक अर्थ यह भी हो सकता 'स्वात्यां सागरशुक्तिमध्यपतितम्' सः मुक्तिका जायते।'
तृतीय तरंग ५१३ इदं संचिन्तयन्सोऽभूत्सेव्ये तस्मिन्निरादरः । खिन्नस्य हि विपर्येति तत्त्वज्ञस्यापि शेमुषी ॥ २०३ ॥ २०३. यह सोचते हुए, वह सेव्य इस (नृप) के प्रति आदर रहित हो गया। तत्त्वज्ञ खिन्न की बुद्धि निश्चय ही विपरीत हो जाती है। प्रभातायां विभावर्यामथाऽऽस्थानस्थितो नृपः । आकार्यतां मातृगुप्त इति क्षत्तारमादिशत् ॥ २०४ ॥ २०४. जब विभावरी के प्रभात होने पर, सभास्थान पर पहुँचकर, राजा ने क्षत्ता को यह आदेश दिया, —'मातृगुप्त को बुलाओ - ततः प्रधावितानेकप्रतीहारप्रवेशितः । प्रविवेश महीभर्तुस्त्यक्ताश इव सोऽन्तिकम् ॥ २०५ ॥ २०५. तब अनेक प्रतीहारी दौड़कर, उसे ले आये और निराश सदृश वह, नृपति के समीप (सभाभवन में) प्रवेश किया। तस्मै कृतप्रणामाय मुहूर्तादिव पार्थिवः । भ्रूसंज्ञितेन व्यतरल्लेखं लेखाधिकारिणा ॥ २०६ ॥ २०६. प्रणाम करने वाले, उसे तत्क्षण पार्थिव ने भ्रूसंकेतित¹ लेखाधिकारी द्वारा लेख प्रदान किया। स्वयं च तमुवाचाङ्ग कश्मीरान्वेत्सि किं भवान् । गत्वा तत्राधिकारिभ्य एतच्छासनमर्प्यताम् ॥ २०७ ॥ २०७. 'अंग¹ ! क्या आप कश्मीर को जानते हैं? वहां जाकर, यह शासन ² पत्र अधिकारियों को अर्पण कीजिए। पाठभेद : प्रथा केवल इतिहास एवं साहित्य की सामग्री रह श्लोक संख्या २०४ में 'क्षत्तारं' का पाठभेद गयी है। 'द्वारस्थं' मिलता है। २०७ (१) अंग : यह सम्बोधनवाचक पादटिप्पणियाँ : अव्यय शब्द है। इसका अर्थ बहुत अच्छा होता है। २०६ (१) भ्रूसंकेतित : प्राचीन काल में धीमान् बहुत ठीक, 'अवश्य' 'सत्य है' 'अंगीकार है' पुराने विचार के राजा लोग स्वयं मुख से आज्ञा होता है। नहीं देते थे। केवल उनके संकेत से मन्त्री तथा (२) शासन : शासन का अर्थ यहां आज्ञापत्र सचिव आदेश का कार्य जान जाते थे। और किंवा फारसी का प्रचलित शब्द फरमान है। पाद- राजाज्ञा प्रसारित करते थे। टिप्पणी १५ (१) पृष्ठ १२ तथा तरंग ४ : मैने काठिराज को इस प्रकार का संकेत तथा ३२१; ८ : २६२५, द्रष्टव्य है। शासन पत्र लिखने व्यवहार करते देखा है। अब भारत में सभी देशी तथा उसके रखनेवालों को लेखाधिकारी कहा राज्यों का विलय हो गया है। यह अत्यन्त प्राचीन जाता था। ६५
५१४ राजतरंगिणी स शापितोऽस्मद्देहेन यो लेखं वाचयेत्पथि । संविदेषा प्रयत्नेन विस्मर्त्तव्या न जातुचित् ॥ २०८ ॥ २०८. पथ में जो लेख पढ़े, — "उसे मेरे देह की शपथ है।" प्रतिज्ञा प्रयत्न पूर्वक कभी मत भूलना। अविज्ञाताशयो राज्ञस्तामाज्ञां : क्लेशशङ्कितः । सोऽबुद्ध दहनज्वालां न तु रत्नाङ्कुरद्युतिम् ॥ २०६ ॥ २०९. (नृपति के) आशय को न जानकर क्लेश शङ्कित, उसने राजा के उस आज्ञा को अग्नि ज्वाला जाना, न कि रत्नाङ्कुर कान्ति। यथादेशस्तथेत्युक्त्वा मातृगुप्ते विनिर्गते । निर्गर्वः पूर्ववद्राजा तस्थावाप्तैः सहाल्पन् ॥ २१० ॥ २१०. 'जैसी आज्ञा' — कहकर, मातृगुप्त के विनिर्गत हो जाने पर, गर्व रहित नृप पूर्ववत् आप्तजनों के साथ संलाप करता हुआ, स्थिर रहा। अथाक्लेशोचितं क्षाममपाथेयमवान्धवम् । दृष्ट्वा यान्तं मातृगुप्तं निनिन्देति नृपं जनः ॥ २११ ॥ २११. अक्लेशोचित, क्षाम, सम्बल रहित, बन्धु, विहीन, मातृगुप्त को जाते हुए देख कर लोग नृप की निन्दा करने लगे। अहो नरेश्वरस्येयं यत्किंचनविधायिता । पृथग्जनोचिते कर्म्मण्यर्हतो निदधाति यः ॥ २१२ ॥ २१२. अहो ! 'नरेश्वर की यह यत्किञ्चन विधायिता ? जो कि सामान्य जनोचित कार्य में योग्यों को नियुक्त करता है। दुराशया धृतक्लेशं सेवमानमहर्निशम् । ध्रुवं क्लेशार्हमेवैनं ज्ञातवान्बुधो नृपः ॥ २१३ ॥ २१३. 'दुराशा से अहर्निश सेवा करते दुःखी इसे निश्चय ही विद्वान् नृप ने क्लेश सहिष्णु (ही) जाना। शासन शब्द का प्रयोग नीलमत पुराण में भी अर्थ में इसका उल्लेख किया गया है। किया है। यहाँ पर यह शब्द शिव शासन के रूप में व्यवहृत किया गया है। प्राचीन निबन्धों में बुद्ध श्वमह चापि यस्यैव शासने सऽवस्थितौ य। शासन के समान शिव शासन सम्बन्धी निबन्धों के नील० १२४७ परिशिष्ट
तृतीय तरंग ५१५ उपायं यं पुरस्कृत्य सेवते सेवकः प्रभुम् । अनन्तरङ्गस्तत्रैव योग्यं तं किल मन्यते¹ ॥ २१४ ॥ २१४. 'सेवक जिस उपाय को अग्रसर करके प्रभु की सेवा करता है, अन्तरङ्ग ( नृप ) उसे उस ( कार्य ) योग्य मानता है । सुखार्थी नागरिप्रतिभयशमात्प्रत्युत सुखं - जहौ शेषस्तत्पीकृततनु निषेव्यासुररिपुम् । यतस्तेनामुष्मिन्नधिगतवता क्लेशसहतां श्रमाधायि न्यस्तं निरवधि धराभारवहनम् ॥ २१५ ॥ २१५. 'नागरिपु ( गरुड़ ) के भय शमन से सुखाकांक्षी शेष नाग शरीर की शय्या बना, ( कर ) विष्णु की सेवा करके, प्रत्युत सुख का त्याग ( ही ) कर दिया। क्योंकि (उन्होंने) क्लेश सहन करने में समर्थ मानकर, इनपर श्रम प्रद पृथ्वी का भार सदैव के लिये न्यस्त कर दिया । अयमेतद्गृहीतेषु गुणवत्सु गुणाधिकम् । आत्मानं गुणवान्पश्यन्नास्थ्यैनमशिश्रियत्¹ ॥ २१६ ॥ २१६. 'उन गृहीत गुणवानों में स्वयं को अधिक गुणवान देखते हुये, इसने आस्था पूर्वक उसका ( नृप का ) आश्रय लिया था । अनन्तरङ्गः कोऽन्योऽस्माद्गुणान्दर्शयतेऽधिकान् । अस्मै गुणवते पूजां यश्चकार किलेदृशीम् ॥ २१७ ॥ २१७. अन्तर को न जानने वाला अन्य कौन इससे अधिक गुणवान ( गुणज्ञ ) हैं । जिसने इस गुणवान् की इस प्रकार पूजा की । पाठभेद : पादटिप्पणियाँ : २१४ ( १ ) राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रह का यह श्लोक संख्या २१४ में 'उपायं यं' का पाठभेद ६५वाँ श्लोक है । २१६ ( १ ) राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रह का यह 'उपायं तं' तथा 'उपायनं' मिलता है । ६६वाँ श्लोक है।
५१४ राजतरंगिणी स शापितोऽस्मद्देहेन यो लेखं वाचयेत्पथि । संविदेषा प्रयत्नेन विस्मर्तव्या न जातुचित् ॥ २०८ ॥ २०८. पथ में जो लेख पढ़े,—"उसे मेरे देह की शपथ है।" प्रतिज्ञा प्रयत्न पूर्वक कभी मत भूलना। अविज्ञाताशयो राज्ञस्तामाज्ञां क्लेशशङ्कितः । सोऽबुद्ध दहनज्वालां न तु रत्नाङ्कुरद्युतिम् ॥ २०६ ॥ २०९. (नृपति के) आशय को न जानकर क्लेश शङ्कित, उसने राजा के उस आज्ञा को अग्नि ज्वाला जाना, न कि रत्नाङ्कुर कान्ति। यथादेशस्तथेत्युक्त्वा मातृगुप्ते विनिर्गते । निर्गर्वः पूर्ववद्राजा तस्थावाप्तैः सहाल्पन् ॥ २१० ॥ २१०. 'जैसी आज्ञा'—कहकर, मातृगुप्त के विनिर्गत हो जाने पर, गर्व रहित नृप पूर्ववत् आप्तजनों के साथ संलाप करता हुआ, स्थिर रहा। अथाक्लेशोचितं क्षाममपाथेयमवान्धवम् । दृष्ट्वा यान्तं मातृगुप्तं निनिन्देति नृपं जनः ॥ २११ ॥ २११. अक्लेशोचित, क्षाम, सम्बल रहित, बन्धु, विहीन, मातृगुप्त को जाते हुए देख कर लोग नृप की निन्दा करने लगे। अहो नरेश्वरस्येयं यत्किंचनविधायिता । पृथग्जनोचिते कर्मण्यर्हतो निदधाति यः ॥ २१२ ॥ २१२. अहो ! 'नरेश्वर की यह यत्किञ्चन विधायिता ? जो कि सामान्य जनोचित काय में योग्यों को नियुक्त करता है। दुराशया धृतक्लेशं सेवमानमहर्निशम् । ध्रुवं क्लेशार्हमेवैनं ज्ञातवान्बुधो नृपः ॥ २१३ ॥ २१३. 'दुराशा से अहर्निश सेवा करते दुःखी इसे निश्चय ही विद्वान् नृप ने क्लेश सहिष्णु (ही) जाना। शासन शब्द का प्रयोग नीलमत पुराण में भी अर्थ में इसका उल्लेख किया गया है। दिया है। वहाँ पर यह शब्द शिव शासन के रूप में व्यवहृत किया गया है। प्राचीन निबन्धों में बुद्ध त्वमह चापि यस्यैव शासने सऽधस्थितौ य । शासन के समान शिव शासन सम्बन्धी निबंधों के नील० १२४७ परिशिष्ट
तृतीय तरंग ५१५ उपायं यं पुरस्कृत्य सेवते सेवकः प्रभुम् । अनन्तरङ्गस्तत्रैव योग्यं तं किल मन्यते¹ ॥ २१४ ॥ २१४. 'सेवक जिस उपाय को अग्रसर करके प्रभु की सेवा करता है, अन्तरङ्ग ( नृप ) उसे उस ( कार्य ) योग्य मानता है। सुखार्थी नागारिप्रतिभयशमात्प्रत्युत सुखं जहौ शेषस्तल्पीकृततनु निषेव्यासुररिपुम् । यतस्तेनामुष्मिन्नधिगतवता क्लेशसहतां श्रमाधायि न्यस्तं निरवधि धराभारवहनम् ॥ २१५ ॥ २१५. 'नागरिपु ( गरुड़ ) के भय शमन से सुखाकांक्षी शेष नाग शरीर की शय्या बना, ( कर ) विष्णु की सेवा करके; प्रत्युत सुख का त्याग ( ही ) कर दिया । क्योंकि (उन्होंने) क्लेश सहन करने में समर्थ मानकर , इनपर श्रम प्रद पृथ्वी का भार सदैव के लिये न्यस्त कर दिया । अयमेतद्गृहीतेषु गुणवत्सु गुणाधिकम् । आत्मानं गुणवान्पश्यन्नास्थ्यैनमशिश्रियत्¹ ॥ २१६ ॥ २१६. 'उन गृहीत गुणवानों में स्वयं को अधिक गुणवान देखते हुये, इसने आस्था पूर्वक उसका ( नृप का ) आश्रय लिया था । अनन्तरङ्गः कोऽन्योऽस्माद्गुणान्दर्शयतेऽधिकान् । अस्मै गुणवते पूजां यश्चकार किलेदृशीम् ॥ २१७ ॥ २१७. अन्तर को न जानने वाला अन्य कौन इससे अधिक गुणवान ( गुणज्ञ ) हैं । जिसने इस गुणवान् की इस प्रकार पूजा की । पाठभेद : पादटिप्पणियाँ : २१४ ( १ ) राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रह का यह श्लोक संख्या २१४ में 'उपायं यं' का पाठभेद ६५वाँ श्लोक है । २१६ ( १ ) राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रह का यह 'उपायं त' तथा 'उपायनं' मिलता है । ६६वाँ श्लोक है ।
५१६ राजतरंगिणी यो नानाद्युतिमत्पदार्थरसिकोऽपारेऽपि शक्रापुधे सप्रेमा स विलोक्य बर्हमिह मे किं किं न कुर्यात्प्रियम् । इत्याविष्कृतवर्हराजि नटते यो बर्हिणेऽम्भोल्वा- न्नान्यन्मुञ्चति तं विहाय जलदं कोऽन्योऽस्ति शून्याशयः ॥२१८॥ २१८. जो अनेकों कान्तिमय पदार्थों का रसिक है, निसार भी इन्द्रधनुष में प्रेम रखता है, वह यहाँ मेरे ( सचित्र ) पंख को देखकर (मेरे लिये) क्या-क्या प्रिय नहीं करेगा ? इस आशय से पिच्छ फैलाकर नृत्य करते मयूर² को जो जल कणों के अतिरिक्त कुछ नहीं देता उस जलद के अतिरिक्त और कौन शून्य हृदय है³। गच्छतो मातृगुप्तस्य निर्दैन्यस्यैव वर्त्मसु । नाभूद्भाव्यर्थमाहात्म्याद्विकल्पः कोऽपि चेतसि ॥ २१९ ॥ २१९. मार्ग में गमन करते दैन्य रहित मातृगुप्त के मन में भावी अर्थ (की प्राप्ति) माहात्म्य से कोई विकल्प नहीं हुआ। अहंपूर्विकयोद्यद्भिर्निमित्तैः शुभशंसिभिः । स वितीर्णकरालम्ब इव न श्रममाददे ॥ २२० ॥ २२०. स्पर्धापूर्वक प्रकट होते शुभ¹ सूचक निमित्तों से हस्तावलम्ब प्राप्त करने तुल्य वह परिश्रान्त नहीं हुआ। पाठभेद : पाठभेद : श्लोक संख्या २१८ में 'बर्हिणे' का पाठभेद श्लोक संख्या २२० में 'लम्ब' का 'लम्भ' और 'बर्हिणो' तथा 'विहाय जलदं' का पाठभेद 'विलोक्य 'माददे' का पाठभेद 'मादधे' मिलता है। जलदमिरम्यमादर्श' मिलता है। २२० (१) शुभसूचक : शकुन ज्ञान स्वतः एक पादटिप्पणियाँ : शास्त्र है। शुभ-अशुभ शकुनों के विचार के लिये २१८ ( १ ) राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रह का यह अनेक स्थानों पर ऐसा उल्लेख मिलते हैं। प्रचलित १७वाँ श्लोक है। शुभाशुभ का लक्षण स्वप्न, पक्षीपतन (चिपकली ( २ ) मयूर : वर्षा ऋतु में मयूर मेषाच्छन्न गिरना), प्रस्थान करते समय विभिन्न वस्तुओं के आकाश में मस्त होकर अपनी प्रेमिका मयूर सम्मुख पड़ने से भावी शुभ एवं अशुभ कार्यों का पता के सम्मुख आत्मविभोर होकर नृत्य करता है। चल जाता है। ( ३ ) शून्याशय शब्द का प्रयोग शून्य हृदय स्वप्न : शुभ-जल में तैरना स्वप्न में देखने पर के लिये किया गया है। यहाँ इन्द्रधनुष के लिये शुभ फलप्रद होता है। आकाश में उड़ना-व्यापार में शून्य हृदय प्रयुक्त किया गया है। इन्द्रधनुष बादल लाभ किंवा शुभ यात्रा, सुवर्ण अंगूठी धारण करना- के कारण बनता है। परन्तु वह धनुष की तरह ठोस वाञ्छित रमणी प्राप्ति, मेवा भक्षण-धन प्राप्ति; ऊँट नहीं अपितु शून्य भूत होता है। उसका आकार मात्र देखना-सम्पत्ति प्राप्ति; सूर्य दर्शन-महान् व्यक्तियों दिखायो पड़ता है। अन्यथा वह किरणों एवं जल से साक्षात्कार; ग्रह नक्षत्र दर्शन-शुभसन्देश प्राप्ति; बाष्प का छाया रूप मात्र है। मेष दर्शन-उन्नति पथ जाना; हाथ में अग्नि लेना-
तृतीय तरंग ५१७
बिना परिश्रम धन प्राप्ति; अश्वारोहण—व्यापार में उन्नति; उद्यान लगाना—शुभसमाचार प्राप्ति, कोठे पर चढ़ना—शुभ समाचार; दर्पण देखना—प्रेमिका मिलन, बिस्तर बिछाना—धनप्राप्ति; पका बाल— दीर्घायु होना, अंडा देखना—पुत्र उत्पत्ति; पर्वता- रोहण—उन्नति; शरीर में विष्ठा पोतना—धनप्राप्ति; विष्ठा भक्षण—प्रचुर धन प्राप्ति; जल पीना—व्यापार मे लाभ; स्वादिष्ट भोजन एवं ताम्बूल खाना—सुन्दर स्त्री प्राप्ति; जल में डूबना—शुभ कर्म; कृपाण देखना— विजय प्राप्ति; हरीसाक तरकारी—शुभ समाचार; धनुष बाण चलाना—आशापूर्ति; सिंहासन पर चढ़ना— प्रतिष्ठा वृद्धि; रोना—प्रसन्नता प्राप्ति; श्वेत वस्त्र धारण—शुभसंवाद और क्रीडा देखने से प्रसन्नता की प्राप्ति होती है। पल्ली पतन या गिरगिट का अवरोहण— शुभ : सोम, बुध, गुरु, शुक्रवारो तथा १, २, ५, ६, १०, ११ तथा १२ तिथियों में पुष्य, अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, उ०फा०, पुनर्वसु, हस्त, स्वाती, अनुराधा, धनिष्ठा, शतभिष, रेवती, नक्षत्रों में पुरुष के दाहिने अंग तथा स्त्रियों के बायें अंग पर छिपकली का गिरना शुभ माना जाता है। सर पर गिरना—राज्य लाभ, ललाट पर—बन्धु दर्शन, भौंह पर—श्रेष्ठ पुरुषो से मित्रता; अधरोष्ठ पर—ऐश्वर्य प्राप्ति; दक्षिण कान पर—आयुवृद्धि; बायें कान—धन लाभ; ग्रीव—धन लाभ; दक्षिणबाहु- नृप तुल्यता; कण्ठ—शत्रुनाश, उदर—भूषण लाभ, घुटने पर शुभागमन, जंघों—शुभ, हाथो—वस्त्र लाभ, कन्धा पर—विजय; नासिका छिद्र—अत्यन्त धन लाभ कटिभाग —अश्व, हस्तो किंवा सवारी का लाभ ; हृदय—धनलाभ ; तथा मुख पर गिरना मिष्ठान्न भोजन की प्राप्ति होती है। छींक—शुभ : शयन, मल मूत्र त्याग, भोजन, स्नान-दान, विद्याध्ययन, युद्धप्रस्थान, विवाह, बीज बोने के समय शुभ होती है । पीछे तथा बायें की छींकमे दोष नही होता । छींक—अशुभ : साधारणतया किसी दिशा की छींक अच्छी नहीं कही गयी है । अपनी छींक स्वयं शुभप्रद नहीं होती । गाय-बैल की छींक अत्यन्त हानिकारक ; सम्मुख छींक—कलहकारिणी ; दाहिने की छींक—धननाशक ; धीरे की छींक— भय दायक ; कुमारी, वैश्या, मालिन, विधवा, धोबिन तथा रजस्वला की छींक—अशुभ ; तथा यात्रा के समय की छींक अशुभ होती है । स्वप्न—अशुभ : अर्धरात्रि के पूर्व का देखा स्वप्न शुभाशुभ फल नही देता । रात्रि के अन्त मे देखे स्वप्न का विचार करना चाहिए । उसके पश्चात् यदि निद्रा न आये तो शुभाशुभ का अवश्य फल होता है । आकाश से गिरना-शारीरिक एवं मानसिक कष्ट , पक्का फल भोजन—निकट सम्बन्धी की मृत्यु, ऊँट पर चढ़ना—अस्वस्थता ; घोड़े से गिरना— धन एवं प्रतिष्ठा की हानि ; नावपर चढ़कर डूबना—पदच्युति ; आधी तूफान —यात्रा में कष्ट ; पर्वत से गिरना—कष्ट, दाहिना बाहु का कटना— कोई भाई की मृत्यु ; बाईं भुजा का कटना ; छोटे भाई की मृत्यु ; बारात में जाना—मृत्यु ; नवीन घर निर्माण—सम्बन्धी की मृत्यु ; मुंडासिर-मृत्यु कारक ; तेल लगाना—स्वास्थ्यहानि ; स्वयं बीमार झंझट ; सूअर देखना—नाराजगी ; भैंस—आपत्ति आगमन ; शेर—राज भय ; राजा की मृत्यु-राष्ट्र पर विपत्ति ; पिंजडा देखना—कारागार मिलता है। पल्लीपतन—अशुभ : जन्म नक्षत्र, मृत्युयोग, दग्धयोग, भद्रा में, पापग्रह, पुण्यलग्न में चन्द्रमा अष्टम हो, तो छिपकली गिरने का फल अशुभ होता है । गिरगिट के अंग पर चढ़ने का फल छिपकली के सदृश ही. होता है । इसके अतिरिक्त, सर्प, जलहीन घट, बिल्ली आदि का यात्रा के समय सम्मुख पड़ना अशुभ तथा पूर्ण घट, शव, तिलकधारी ब्राह्मण, कोखमें बालक
सप्तम तरङ्ग: प्रथम लोहर वंश (संग्रामराज व अनन्त)
५१८ राजतरंगिणी अपश्यत्स फणाकोटौ खञ्जरीटमहेः पथि । स्वप्ने प्रासादमारुह्य स्वं चोल्लङ्घितसागरम् ॥ २२१ ॥ २२१. पथ में उसने देखा—सर्प के फण पर खञ्जरीट बैठा है, और स्वप्न में स्वयं प्रासाद पर आरूढ़ तथा सागर पार किया। अचिन्तयच्च शास्त्रज्ञो निमित्तैः शुभशंसिभिः । एतैर्भर्तुरादेशो ध्रुवं मे स्याच्छुभावहः ॥ २२२ ॥ २२२. उन शुभसूचक निमित्तों से उस शास्त्रज्ञ ने सोचा,—'निश्चय ही राजा का आदेश मेरे लिये शुभावह (सुखप्रद) है। फलं मम तनीयोऽपि कश्मीरेषु भवेद्यदि । अनर्घदेशमाहात्म्यात्किं नातिशयेत तत् ॥ २२३ ॥ २२३. "कश्मीर में यदि मुझे स्वल्प फल भी प्राप्त हो तो वह अनर्घ देश के माहात्म्य से किस किस का अतिक्रमण नहीं करेगा।' लिये सौभाग्यवती स्त्री, आदि का मिलना शुभ होता है। रात्रि में यदि कुत्ता रोता है तो पास पड़ोस तथा कहीं से मृत्युसमाचार मिलता है या कोई मरता है। राजनीति में अत्यन्त प्राचीन काल से शुभाशुभ का विवेचन होता रहा है। वाल्मीकीय रामायण तथा महाभारत में सेनाओं के प्रयाण अथवा किसी कार्य के प्रस्थान अथवा कार्य करने के समय शकुनों के आधार पर भविष्य की घटना की सूचना मिलती मानी गयी है। प्राचीन रोमन लोग भगवान् की इच्छा आकाश में पक्षियों के उड़ने से लगाते थे। वे उनकी गति से भगवान् की चेतावनी भी निकालते थे। रोमन लोग कोई भी कार्य चाहे युद्ध अथवा शान्ति का ही क्यों न हो बिना शकुन निकाले नहीं करते थे। अधिकारियों के चुनाव के समय विशेषतः शकुन देखा जाता था। जिस समय सेनापति युद्ध यात्रा के लिये निकलते थे उस समय विशेष रूप से शकुनों का विचार किया जाता था। भारत में शकुन, ज्योतिष आदि के ग्रन्थ उप- लब्ध हैं। उनमें उनका विशद वर्णन मिलता है। किन्तु कौटिल्य ने शकुनों को महत्त्व नहीं दिया है। उनकी निन्दा की है। वह कहते हैं—सम्पत्ति सरल व्यक्तियों के हाथों से कुटिल व्यक्तियों के हाथों में चली जाती है। वे अत्यधिक नक्षत्रों एवं ग्रहों का आश्रय लेते हैं। सम्पत्ति नक्षत्रों का नक्षत्र है। किस प्रकार तारे उनसे प्रभावित होंगे? कृत निश्चयी व्यक्ति सैकड़ों प्रकार के साधनों से सम्पत्ति प्राप्त करता है। सम्पत्ति से ही सम्पत्ति पर विजय प्राप्ति की जाती है जैसे हाथी द्वारा ही हाथी पाया जाता है। (अर्थशास्त्र ९:४ तथा त ३:२१० तथा ८:७४४, ७४६ द्रष्टव्य हैं।) पाठभेद : श्लोक संख्या २२१ में 'महेः' का पाठभेद 'महो' मिलता है। श्लोक संख्या २२३ में 'कश्मीरे' का पाठभेद 'कार्मीरे' मिलता है।
तृतीय तरंग ५१९ अकृच्छ्रलङ्घ्याः पन्थानो वल्लभातिथयो गृहाः । उपानमन्गच्छतोऽस्य सत्क्रियाश्च पदे पदे ॥ २२४ ॥ २२४. गमन करते हुए इसे सुख पूर्वक लङ्घ्य मार्ग, अतिथि प्रेमी गृह एवं पग-पग पर सत्कार प्राप्त हुये । इत्थं विलङ्घिताध्वा स लोलानोकहशाद्वलम् । मङ्गल्यार्दधेपात्राम ददर्शाग्रे हिमाचलम् ॥ २२५ ॥ २२५. इस प्रकार मार्ग पार कर वह चंचल वृक्षों से हरे एवं मंगल दधि¹ पात्र तुल्य हिमाचल को देखा । सरलस्यन्दसुभगा गङ्गाशीकरवाहिनः । प्रत्युद्ययुस्तं मरुतः पाल्यायाः संस्तुता भुवः ॥ २२६ ॥ २२६. देवदारु वृक्ष के राल से सुभग बालनीय, भूमि से संस्तुत एवं गंगा¹ शीकर वाही काश्मीरी समीरण इसका अभिनन्दन किया । श्लोक संख्या २२५ में 'ध्वा स' का 'काशं', उसके मध्य में रखी हरी दूर्वा से हरीभरी कश्मीर 'श्वास'; तथा 'नोकह' का पाठभेद 'नोकह' उपत्यका की उपमा दी है। मिलता है । किन्तु यहां एक त्रुटि प्रतीत होता है । काव्य- पादटिप्पणियाँ : शास्त्र के नियम के अनुसार उपमा उत्कृष्ट होनी २२५ (१) दधि : जैसे ही बनिहाल पास चाहिये । उपमा मंगल दधि पात्र छोटा है । परन्तु तथा पुराना मुगल मार्ग समाप्त कर मैदान निवासी उपमेय हिमालय विशाल है । बड़ा है । यह पर्यटक कश्मीर उपत्यका का दर्शन करता है तो खटकता है । उसे तुषार मण्डित पर्वत शिखर का अभिराम दर्शन २२६ (१) गंगा-कश्मीर को अनेकानेक मिलता है । उसका वह हिम दर्शन तथा हरीभरी स्रोतस्विनियां तथा नाग गंगा के रूप माने जाते हैं । उपत्यका उसमें अभूतपूर्व चेतना एवं भाव तरंगें कश्मीर की सिन्ध उपत्यका की सींचने और वितस्ता उत्पन्न कर देती हैं । में मिलने वाली सिन्ध नदी को भी गंगा कहा गया यहाँ तुषार की उपमा दधि से दी गयी है । है । पादटिप्पणी 'गंगा' पृष्ट १०० द्रष्टव्य है । उपत्यका के चारों ओर उत्तुंग पर्वत शिखर से परावृत नीलमत पुराण में निम्नलिखित गंगा का है । वे तुषारमण्डित रहते हैं । उपत्यका हरीभरी उदाहरण मिलता है । रहती है । अतएव तुषार की उपमा कल्हण ने दधि जम्बूमागं तथा पुण्यं पुण्यां वाराणसीं तथा । से दी है । दूध जम जाने पर दही बन जाता है । तथैव जाह्नवीं गंगां देवीं गगनमेखलाम् ।। जल जमने पर बर्फ हो जाता है । १०.१३१-१३२॥ दधि पात्र में दूर्वा मंगल कार्यों के समय में × × × रखा जाता है । कल्हण की यह उपमा अनोखी गंगासागरसन्धि च सिन्धुसागरसंगमम् । है । उसकी पैनी दृष्टि की यह द्योतक है । भृगुतुगं विशालां च कुब्ज.कां श्यतं तथा ।।१५:१३६॥ हिम परिवृत गोलाकार उपत्यका दधिपात्र से घोर × × ×
५२० राजतरंगिणी शतद्रुं च ततस्तीर्त्वा ऋषिगंगो च निम्नगाम् । तच्च भक्तस्य विप्रस्य नित्यं धर्मानुनिष्ठतः । भर्तृनाथमथासाद्य देवसुन्दरमेव च ॥132:१०५॥ मोक्षदं मुनयः स्नानं गंगायां स्वर्गदं विदुः ॥ × × × ॥ 311:४१२ ॥ मकरेण ययौ गंगा कूर्मेण यमुना नदी। × × × वृषारूढा शतद्रुश्च महिषेण सरस्वती ॥153:२०५॥ स्वैराजिकानां मन्थेन मात्राणां चैव भागशः । × × × भोगप्रस्थमतिक्रम्य गंगया सह संगता ॥320:४२१॥ कथं सती शची गंगा अदितियँमुना दितिः । × × × सरिद्रूमिह संप्राप्ता या च देवी करीषिणी॥238:३१५॥ अदितिश्च दितिश्चैव शची च मनुजेश्वर । × × × सपत्न्य सुता या च या च गंगा सरिद्वरा॥322:४२३॥ अदितिश्च दितिश्चैव शची गंगा च निम्नगा । × × × एवमस्त्वित्यथारूढवन्तः गोमान् च करीषिणी॥241:३१९ सीता वंक्षुश्च सिन्धुश्च सप्तगंगाश्च मानद । ३२० ॥ सुप्रभा काञ्चनाक्षी च विशाला मानसा हृदा ॥ × × × ॥ 599:७२० ॥ शक्ता हि पावने ब्रह्म त्रैलोक्यस्यापि सा भवेत् । × × × अदितिश्च दितिश्चैव या च गंगा महानदी ॥ गंगा सपूजनं कार्यं तस्मिन्नहनि काश्यप । एवं क्रमेण सा देवी गृह्णात्यथ सरिद्वरा । ब्रह्मलोकात्त्रिपथगा पृथिव्यामवतारयत् ॥681:८०६, जगाम गंगया सार्धं संयोगं सिन्धुना सह॥290:३८८- ८०७ ॥ ३८९ ॥ × × × × × × नमः शशांकलेखांकजटाभार महेश्वर । तस्यस्य सुता देवी गंगास्नेहेन मन्त्रिता । गंगारंगनिर्धूत जटामार नमोऽस्तु ते॥1091:१२८९॥ यदुमानान्मुनेर्भक्त्या स्वेनांशेन व्यवर्धत॥294:३९३॥ × × × वितस्तां तु सरिच्छ्रेष्ठां सर्वकल्मषनाशिनीम् । तत्र गंगा सरिच्छ्रेष्ठा चन्द्रभ्रष्टा प्रतिष्ठिता । × × × यस्यां स्नातस्य पूयन्ते सर्वपापान्संशयम् ॥ गंगा सिन्धुस्तु विज्ञेया वितस्ता यमुना तथा ॥295: ॥ 1243:१४५६-१४५७ ३९४ ॥ × × × × × × राजसूयमवाप्नोति गंगामानुषसंगमे । स प्रयागसमो देशस्तयोर्यत्र तु संगमः । देवतीर्थे नरः स्नात्वा भवत्यमरपूजितः ॥ गंगातोयमथादाय गंगो तु यमुनाऽब्रवीत् ॥296:३९५ ॥ 1244:१४५७-१४५८॥ ३९६ ॥ × × × × × × गंगोद्भेदे नरः स्नात्वा भेदादेवीसमीपतः । तामब्रवीत्ततो गंगा भूय एव मया तव । गंगास्नानफलं प्राप्य स्वर्गलोके महीयते ॥ हनंश्यं नाम सुभगे यदाऽहं सिन्धुसंगिता॥298:३९७- ॥ 1309:१५२२-१५२३ ॥ ३९८ ॥ × × × × × ×
तृतीय तरंग ५२१ क्रमवर्ताभिधाने स प्रदेशे प्राप्तवांस्ततः । ढक्कं काम्बुवनामानं योऽद्य शूरपुरे स्थितः ॥ २२७ ॥ २२७. तदनन्तर वह क्रमवर्त नामक प्रदेश में काम्बुव १ संज्ञक ढक्क २ पहुँचा जो आज शूरपुर ( सोपुर ) में स्थित है । वितस्तातो महीनाथ न गंगा व्यतिरिच्यते । कश्मीर में ढक्क सैनिक चौकी अथवा वाच केवलं जाह्नवीतोये पुरुषस्यास्थिसंभवः ॥ स्टेशन को कहते हैं। कश्मीर के इतिहास में ढक्क ॥ 1373:१५८७ ॥ के प्रबन्ध तथा रक्षा पर राजाओं ने बहुत जोर दिया x - x x है। ढक्क के कारण कश्मीर में अवाञ्छनीय तत्त्वों वितस्तातोऽधिको राजन् स्नानाद्यं तुल्यमेव च । का प्रवेश नही हो सकता था। ढक्क प्रायः दर्रों, भागीरथेन संगत्यं पुरा राज्ञाऽवतारिता ॥ 1374:१५९०॥ प्रवेश स्थान तथा सैनिक महत्त्व के स्थान पर सुरक्षा तथा नियन्त्रण की दृष्टि से बनाये गये थे । x x x अवन्तिवर्मा के मन्त्री शूर ने क्रमवर्त स्थि । गंगानदी शंभुजटाकलापं, चंद्रेण देवेन तथा विभिन्ना । ढक्क को शूरपुर में स्थापित किया था। शूरपुर प्रोक्ता नृलोके नृप चन्द्रभागा, वर्तमान हूरपुर किंवा होरपुर है। रामब्यार नदी आयाति पुण्यं विततां वितस्ताम् ॥ 1391 ॥ की हरी भरी सुहावनी उपत्यका में स्थित है। पाठभेद : ढक्क किंवा द्रंग पर्वतीय दर्रों के प्रवेश मुख पर श्लोक संख्या २२७ में 'वर्ता' का पाठभेद सुरक्षा निमित्त निर्मित किये जाने थे। इसका काम 'वत्ता' मिलता है । बाहर से आने वाले सामान से चुंगी वसूल करना तथा पादटिप्पणियाँ : देश की सुरक्षा दोनों से होता था। शूरपुर के चुंगी २२७ ( १ ) क्रमवर्त : वर्तमान कमेंवन कोठ, का यह स्थान उस जगह देखा जा सकता है जहाँ पीर पंतसल मार्ग पर है । बादशाह ज़ैनुल आबदीन ने अभिसार से आने वालों के लिये शिविर किंवा पड़ाव अथवा छाउनी ( २ ) काम्बुव : वह ढक्क का नाम है। पीर- बनवाया था। पंतसल मार्ग पर है । द्रंग का अर्थ रक्षा स्थान होता है। श्रीवर ढक्क : इस शब्द का अर्थ रणजीत सीताराम ने उसे गुल्म भी कहा है। द्रंगिका, द्रामिका, पण्डित ने डमस्टेशन (नगाड़ा की चौकी ) लगाया द्रंगिन आदि समानार्थक शब्द वल्लभी राजाओं के है। उसे विरोचन किंवा अवलोकन चौकी कहा है। ताम्रपत्रों में प्रयुक्त किया गया है। पुराने मुग़ल स्टीन ने इसका अर्थ सैनिक चौकी किया है। ढक्क बादशाही मार्ग पर यात्री के लिए बाज़ार, निवास शब्द प्राचीन है। नीलमत पुराण में ढक्क शब्द आदि की सुविधा प्राप्त होती थी। यह पर्वतीय मिलता है। वह एक नाग है। उस स्थान पर धुक्क व्यवधान पार करते ही किञ्चित् मैदान के पश्चात् के स्थान पर धुक्क का भी पाठभेद मिलता है। मिलता है। कल्हण ने राजतरंगिणी में इसका वीरभद्रात्तनी नागौ नागौ सारमपुक्ककौ । कई बार उल्लेख किया है। रक्ताकश्च तथा चक्को गौशो चंड जगस्तथा ॥ मंख के कोश में द्रंग रक्षा स्थान का समानवाचक 221 : १०८७-१०८८ कहा गया है। द्रंग का कहीं-कहीं मार्गेश अर्थात् ६६
५२० राजतरंगिणी शतद्रू ं च ततस्तीर्त्वा कपिगंगां च निम्नगाम् । तव नस्तस्य विप्रस्य नित्यं धर्मानुतिष्ठतः । अनुनाथमथायाय देवसुन्दं तथैव च ॥ 132:१०५॥ मोक्षदं मुनयः स्नानं गंगायां स्वर्गदं विदुः ॥ × × × ॥ 311:४१२ ॥ मकरेण ययौ गंगा कूर्मेण यमुना नदी। × × × वृषारूढा शतद्रुश्च महिषेण सरस्वती ॥ 153:२०५॥ स्वैराजिकानां मध्येन मात्राणां चैव भागशः । भोगप्रस्थमतिक्रम्य गंगया सह संगता ॥320:४२१॥ × × × कथं सती शची गंगा अदितियैमुना दितिः । × × × मरिचिमिसंप्राप्ता या च देवी करीपिणी॥238.३१५॥ अदितिश्च दितिश्चैव शची च मनुजेश्वर । तपनन्य सुता या च या च गंगा मरिद्वरा॥322:४२३॥ × × × अदितिश्च दितिश्चैव शची गंगा च निम्नगा । × × × एवमस्त्वित्यथःपन्त नोमान च करीपिणी॥241:३१९ सीता वंक्षुश्च सिन्धुश्च सप्तगंगाश्च मानद । ३२० ॥ सुप्रभा काञ्चनाक्षी च विशाला मानसा हृदा ॥ × × × ॥ 599:७२० ॥ शक्ता हि पावने यज्ञा त्रैलोक्यस्यापि सा भवेत् । × × × अदितिश्च दितिश्चैव या च गंगा महानदी । गंगा सपूजनं कार्यं तस्मिन्नहनि काश्यप । एवं क्रमेण सा देवी गृहात्यथ सरिद्वरा । ब्रह्मलोकात्त्रिपथगा पृथिव्यामवतारयत् ॥681:८०६, जगाम गंगया सार्धं संभोगं सिन्धुना सह॥290:३८८- ८०७ ॥ ३८९ ॥ × × × × × × नमः शशांकलेखांकजटाभार महेश्वर । तस्य सुता देवी गंगास्नेहेन मन्त्रिना । गंगारंगनिर्घूष जटाभार नमोऽस्तु ते॥1091:१२८९॥ बहुमानान्मुनेर्भक्त्या स्वेनांशेन व्यवर्धत॥294:३९३॥ × × × वितस्तां तु सरिच्छ्रेष्ठां सर्वकल्मषनाशिनीम् । तत्र गंगा सरिच्छ्रेष्ठा चन्द्रभ्रष्टा प्रतिष्ठिता । यस्यां स्नातस्य पूयन्ते सर्वपापान्यसंशयम् ॥ × × × गंगा सिन्धुस्तु विज्ञेया वितस्ता यमुना तथा ॥ 295: ॥ 1243:१४५६-१४५७ ३९४ ॥ × × × × × × राजसूयमवाप्नोति गंगायानुससंगमे । स प्रयागसमो देशस्तयोर्यत्र तु संगमः । देवतीर्थे नरः स्नात्वा भवत्यमरपूजितः ॥ गंगानोयमथादाय गंगां तु यमुनाऽब्रवीत् ॥296:३९५ ॥1244:१४५७-१४५८॥ ३९६ ॥ × × × × × × गंगोद्भेदे नरः स्नात्वा भेदादेवीसमीपतः । तामब्रवीत्ततो गंगा भूय एव मया तव । गंगास्नानफलं प्राप्य स्वर्गलोके महीयते ॥ हर्षार्थं नाम सुभगे यदाऽहं सिन्धुसंगिता॥298:३९७- ३९८ ॥ ॥ 1309:१५२२-१२२३ ॥ × × × × × ×
तृतीय तरंग ५२१ क्रमवर्ताभिधाने स प्रदेशे प्राप्तवांस्ततः । ढक्कं काम्बुवनामानं योऽद्य शूरपुरे स्थितः ॥ २२७ ॥ २२७. तदनन्तर वह् क्रमवर्त नामक प्रदेश में काम्बुव १ संज्ञक ढक्क २ पहुँचा जो आज शूरपुर ( सोपुर ) में स्थित है । वितस्तातो महीनाथ न गंगा व्यतिरिच्यते । केवलं जाह्नवीतोये पुरुषस्यास्थिसंभवः ॥ ॥ 1373:१५८७ ॥ × × × वितस्तातोऽधिको राजन् स्नानाद्यं तुल्यमेव च । भागीरथेन गंगेयं पुरा राजाऽवतारिता॥1374:१५९०। × × × गंगानदी शंभुजटाकलापे, चंद्रेण देवेन तथा विमिश्रा । प्रोक्ता नृलोके नृप चन्द्रभागा, आयाति पुण्यं विततां वितस्ताम् ॥ 1391 ॥ पाठभेद : श्लोक संख्या २२७ में 'वर्ता' का पाठभेद 'वत्ता' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २२७ (१) क्रमवर्त : वर्तमान कमेनन कोट, पीर पंतसल मार्ग पर है । (२) काम्बुव : वह ढक्क का नाम है । पीर- पंतसल मार्ग पर है । ढक्क : इस शब्द का अर्थ रणजीत सीताराम पण्डित ने डमस्टेशन ( नगाड़ा की चौकी ) लगाया है । उसे निरीक्षण किंवा अवलोकन चौकी कहा है । स्टीन ने इसका अर्थ सैनिक चौकी किया है । ढक्क शब्द प्राचीन है । नीलमत पुराण में ढक्क शब्द मिलता है । वह एक नाग है । उस स्थान पर धुक्क के स्थान पर धुक्क का भी पाठभेद मिलता है । वीरमद्राशनी नागौ नागौ सारसमुक्ककौ । रक्काकश्च तथा ढक्को गोशो वंश नगस्तथा ॥ 221 : १०८७-१०८८ ६६ कश्मीर में ढक्क सैनिक चौकी अथवा वाथ स्टेशन को कहते हैं । कश्मीर के इतिहास में ढक्क के प्रबन्ध तथा रक्षा पर राजाओं ने बहुत जोर दिया है । ढक्क के कारण कश्मीर में अवाञ्छनीय तत्त्वों का प्रवेश नहीं हो सकता था । ढक्क प्रायः दर्रों, प्रवेश स्थान तथा सैनिक महत्त्व के स्थान पर सुरक्षा तथा नियन्त्रण की दृष्टि से बनाये गये थे । अवन्तिवर्मा के मन्त्री शूर ने क्रमवर्त स्थित ढक्क को शूरपुर में स्थापित किया था । शूरपुर वर्तमान हूरपुर किंवा होरपुर है । रामण्यार नदी की हरी भरी सुहावनी उपत्यका में स्थित है । ढक्क किंवा द्रंग पर्वतीय दर्रों के प्रवेश मुख पर सुरक्षा निमित्त निर्मित किये जाते थे । इसका काम बाहर से आने वाले सामान से चुंगी वसूल करना तथा देश की सुरक्षा दोनों से होता था । शूरपुर के चुंगी का यह स्थान उस जगह देखा जा सकता है जहाँ बादशाह जैनुल आबदीन ने अभिसार से आने वालों के लिये शिविर किंवा पड़ाव अथवा छावनी बनवाया था । द्रंग का अर्थ रक्षा स्थान होता है । श्रीवर ने उसे गुल्म भी कहा है । द्रंगिका, द्रांगिका, द्रविण आदि समानार्थक शब्द वल्लभी राजाओं के ताम्रपत्रों में प्रयुक्त किया गया है । पुराने मुगल बादशाही मार्ग पर यात्री के लिए बाजार, निवास आदि की सुविधा प्राप्त होती थी । यह पर्वतीय व्यवधान पार करते ही किंचित् मैदान के पश्चात् मिलता है । कल्हण ने राजतरंगिणी में इसका कई बार उल्लेख किया है । मंख के कोष में द्रंग रक्षा स्थान का समान वाचक कहा गया है । द्रंग का कहीं-कहीं मार्गेश अर्थात्