भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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५१८ राजतरंगिणी अपश्यत्स फणाकोटौ खञ्जरीटमहेः पथि । स्वप्ने प्रासादमारुह्य स्वं चोल्लङ्घितसागरम् ॥ २२१ ॥ २२१. पथ में उसने देखा—सर्प के फण पर खञ्जरीट बैठा है, और स्वप्न में स्वयं प्रासाद पर आरूढ़ तथा सागर पार किया। अचिन्तयच्च शास्त्रज्ञो निमित्तैः शुभशंसिभिः । एतैर्भर्तुरादेशो ध्रुवं मे स्याच्छुभावहः ॥ २२२ ॥ २२२. उन शुभसूचक निमित्तों से उस शास्त्रज्ञ ने सोचा,—'निश्चय ही राजा का आदेश मेरे लिये शुभावह (सुखप्रद) है। फलं मम तनीयोऽपि कश्मीरेषु भवेद्यदि । अनर्घदेशमाहात्म्यात्किं नातिशयेत तत् ॥ २२३ ॥ २२३. "कश्मीर में यदि मुझे स्वल्प फल भी प्राप्त हो तो वह अनर्घ देश के माहात्म्य से किस किस का अतिक्रमण नहीं करेगा।' लिये सौभाग्यवती स्त्री, आदि का मिलना शुभ होता है। रात्रि में यदि कुत्ता रोता है तो पास पड़ोस तथा कहीं से मृत्युसमाचार मिलता है या कोई मरता है। राजनीति में अत्यन्त प्राचीन काल से शुभाशुभ का विवेचन होता रहा है। वाल्मीकीय रामायण तथा महाभारत में सेनाओं के प्रयाण अथवा किसी कार्य के प्रस्थान अथवा कार्य करने के समय शकुनों के आधार पर भविष्य की घटना की सूचना मिलती मानी गयी है। प्राचीन रोमन लोग भगवान् की इच्छा आकाश में पक्षियों के उड़ने से लगाते थे। वे उनकी गति से भगवान् की चेतावनी भी निकालते थे। रोमन लोग कोई भी कार्य चाहे युद्ध अथवा शान्ति का ही क्यों न हो बिना शकुन निकाले नहीं करते थे। अधिकारियों के चुनाव के समय विशेषतः शकुन देखा जाता था। जिस समय सेनापति युद्ध यात्रा के लिये निकलते थे उस समय विशेष रूप से शकुनों का विचार किया जाता था। भारत में शकुन, ज्योतिष आदि के ग्रन्थ उप- लब्ध हैं। उनमें उनका विशद वर्णन मिलता है। किन्तु कौटिल्य ने शकुनों को महत्त्व नहीं दिया है। उनकी निन्दा की है। वह कहते हैं—सम्पत्ति सरल व्यक्तियों के हाथों से कुटिल व्यक्तियों के हाथों में चली जाती है। वे अत्यधिक नक्षत्रों एवं ग्रहों का आश्रय लेते हैं। सम्पत्ति नक्षत्रों का नक्षत्र है। किस प्रकार तारे उनसे प्रभावित होंगे? कृत निश्चयी व्यक्ति सैकड़ों प्रकार के साधनों से सम्पत्ति प्राप्त करता है। सम्पत्ति से ही सम्पत्ति पर विजय प्राप्ति की जाती है जैसे हाथी द्वारा ही हाथी पाया जाता है। (अर्थशास्त्र ९:४ तथा त ३:२१० तथा ८:७४४, ७४६ द्रष्टव्य हैं।) पाठभेद : श्लोक संख्या २२१ में 'महेः' का पाठभेद 'महो' मिलता है। श्लोक संख्या २२३ में 'कश्मीरे' का पाठभेद 'कार्मीरे' मिलता है।