राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१६ राजतरंगिणी यो नानाद्युतिमत्पदार्थरसिकोऽपारेऽपि शक्रापुधे सप्रेमा स विलोक्य बर्हमिह मे किं किं न कुर्यात्प्रियम् । इत्याविष्कृतवर्हराजि नटते यो बर्हिणेऽम्भोल्वा- न्नान्यन्मुञ्चति तं विहाय जलदं कोऽन्योऽस्ति शून्याशयः ॥२१८॥ २१८. जो अनेकों कान्तिमय पदार्थों का रसिक है, निसार भी इन्द्रधनुष में प्रेम रखता है, वह यहाँ मेरे ( सचित्र ) पंख को देखकर (मेरे लिये) क्या-क्या प्रिय नहीं करेगा ? इस आशय से पिच्छ फैलाकर नृत्य करते मयूर² को जो जल कणों के अतिरिक्त कुछ नहीं देता उस जलद के अतिरिक्त और कौन शून्य हृदय है³। गच्छतो मातृगुप्तस्य निर्दैन्यस्यैव वर्त्मसु । नाभूद्भाव्यर्थमाहात्म्याद्विकल्पः कोऽपि चेतसि ॥ २१९ ॥ २१९. मार्ग में गमन करते दैन्य रहित मातृगुप्त के मन में भावी अर्थ (की प्राप्ति) माहात्म्य से कोई विकल्प नहीं हुआ। अहंपूर्विकयोद्यद्भिर्निमित्तैः शुभशंसिभिः । स वितीर्णकरालम्ब इव न श्रममाददे ॥ २२० ॥ २२०. स्पर्धापूर्वक प्रकट होते शुभ¹ सूचक निमित्तों से हस्तावलम्ब प्राप्त करने तुल्य वह परिश्रान्त नहीं हुआ। पाठभेद : पाठभेद : श्लोक संख्या २१८ में 'बर्हिणे' का पाठभेद श्लोक संख्या २२० में 'लम्ब' का 'लम्भ' और 'बर्हिणो' तथा 'विहाय जलदं' का पाठभेद 'विलोक्य 'माददे' का पाठभेद 'मादधे' मिलता है। जलदमिरम्यमादर्श' मिलता है। २२० (१) शुभसूचक : शकुन ज्ञान स्वतः एक पादटिप्पणियाँ : शास्त्र है। शुभ-अशुभ शकुनों के विचार के लिये २१८ ( १ ) राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रह का यह अनेक स्थानों पर ऐसा उल्लेख मिलते हैं। प्रचलित १७वाँ श्लोक है। शुभाशुभ का लक्षण स्वप्न, पक्षीपतन (चिपकली ( २ ) मयूर : वर्षा ऋतु में मयूर मेषाच्छन्न गिरना), प्रस्थान करते समय विभिन्न वस्तुओं के आकाश में मस्त होकर अपनी प्रेमिका मयूर सम्मुख पड़ने से भावी शुभ एवं अशुभ कार्यों का पता के सम्मुख आत्मविभोर होकर नृत्य करता है। चल जाता है। ( ३ ) शून्याशय शब्द का प्रयोग शून्य हृदय स्वप्न : शुभ-जल में तैरना स्वप्न में देखने पर के लिये किया गया है। यहाँ इन्द्रधनुष के लिये शुभ फलप्रद होता है। आकाश में उड़ना-व्यापार में शून्य हृदय प्रयुक्त किया गया है। इन्द्रधनुष बादल लाभ किंवा शुभ यात्रा, सुवर्ण अंगूठी धारण करना- के कारण बनता है। परन्तु वह धनुष की तरह ठोस वाञ्छित रमणी प्राप्ति, मेवा भक्षण-धन प्राप्ति; ऊँट नहीं अपितु शून्य भूत होता है। उसका आकार मात्र देखना-सम्पत्ति प्राप्ति; सूर्य दर्शन-महान् व्यक्तियों दिखायो पड़ता है। अन्यथा वह किरणों एवं जल से साक्षात्कार; ग्रह नक्षत्र दर्शन-शुभसन्देश प्राप्ति; बाष्प का छाया रूप मात्र है। मेष दर्शन-उन्नति पथ जाना; हाथ में अग्नि लेना-