राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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मिलता है। एक मातृगुप्त का उल्लेख अलंकार एवं नाट्य शास्त्र के प्रणेता के रूप में मिलता है। मातृगुप्त को कालिदास मानने में आधुनिक विद्वानों ने असहमति प्रकट की है। बम्बई के प्रसिद्ध विद्वान् डाक्टर भाण्डा जी का मत है कि मातृगुप्त ही कालिदास है। डाक्टर धो. हूरन्ले का मत है कि पुरा कथा विक्रमादित्य के सम्बन्ध में जो कही जाती है वह राजा यशोधर्धन पर लगती है जो वास्तव में हूण विजेता था। प्रोफेसर पाठक भी इस मत का समर्थन करते हैं। कालिदास कृत रघुवंश में रघु के विजय का वर्णन वस्तुतः हूणों के सम्बन्ध में है जो कश्मीर में रहते थे। क्यो कि कालिदास उसी सन्दर्भ में केसर का वर्णन करता है जो केवल भारत में कश्मीर में ही होता है। सम्राट् समुद्रगुप्त ने मातृगुप्त का उल्लेख किया है। मातृगुप्तो जयति यः कविराजो न केवलम् । कश्मीरराजोऽप्यभवत् सरस्वतीप्रसादतः ॥ सम्राट् समुद्रगुप्त का निधन सन् ३६४ ई० में हुआ था। अतएव मातृगुप्त का उसके पूर्व होना निश्चित प्रतीत होता है। भाइने अकबरी के अनुसार मातृगुप्त एक कश्मीरी ब्राह्मण था। राजा विक्रमादित्य उसके गुणों तथा बुद्धिमत्ता से प्रसन्न होकर उसे कुछ द्रव्य देकर कश्मीर भेजा। उसने कश्मीर के मन्त्रियों तथा कुलीनों के नाम एक पत्र दिया। उसे आदेश दिया कि वह अकेला यात्रा करे। वह कश्मीर आया। आदेशा- नुसार पत्र दिया। पत्र में लिखा था-इसे कश्मीर का राज्य दे दिया जाय। कश्मीर के मन्त्रियों तथा कुलीनों ने पत्र पर विचार करने के लिये परिषद् बुलायी। अन्त में निश्चय किया गया कि राजा के आदेशों का पालन किया जाय। हमन लिखता है- राजा हिरन बे औलाद था। इस लिये हुकूमत का चिराग बे रौनक रहा। यह देखकर आराकीन सल्तनत महाराज विक्रमाजीत की खिदमत में हाज़िर हुए। जो हिन्दुस्तान का ताजदार था। उसने इल्तजा की कि वह सल्तनत कश्मीर अपने कब्ज़ा अकदार मे लाये। इसके पहले एक बहुत बड़ा इजाज़त केश बरहमन मातृगुप्त जो कश्मीर का था महाराज मज़कूर को खिदमत में गया हुआ था। और बादशाह के खास लश्कर में इन्तहाई मुफ़लिसी की हालत में ज़िन्दगी औकात बसर कर रहा था। एक दिन सरदियो के मोसम में राजा विक्रमा- जीत नींद से जागा। शमा हवा के चलने से गुल हो गयी थी। दरबार के मुलाजिमों घोर चौकीदारो को आवाज़ दी। लेकिन वह ग़लबा नींद से होशियार न हो सके। मातृगुप्त महलखाना के बाहर बाग के सहन में इन्तहाई परेशानी की हालत में बैठा हुआ था। उसने राजा की आवाज़ सुन ली और फ़ौरन राजा की ख़िदमत में हाज़िर हो गया। शमा जलाई और राजा के हुजूर में कामयाबो पाली। राजा ने पूछा-'किस कदर रात बाकी है-?' बरहमन ने कहा- 'आध पहर।' राजा ने पूछा 'तुझे कैसे मालूम हुआ कि आध पहर रात बाकी है?' मातृगुप्त ने एक इन्तहाई फ़सीह व बलीग फ़िक़रा नज़्म किया हुआ था। जो राजा के सामने पढ़ दिया। "सरदी की शिद्दत से मेरा जिस्म सीझकर लोविया के दाना की तरह हो गया है। और मेरी आग इस तरह ज़ईफ़ हो गयी है कि साँसों की कसरत से मेरे होंट तड़क गये हैं। और भूख की वजह से मेरा हलक़ और तालू खुश्क हो गया है। ग़म और रंज के दरया में डूब गया हूँ। जिसके बाअस नींद मेरी आँखों से इस तरह जाती रही है जिस तरह कोई औरत को बेइज्ज़त करके निकाल दे। जिस तरह एक बड़े आदमी को जागीर में हो और वह जमीन उगमे कम नहीं होती इस तरह यह स्याह रात मुझसे कम नही होती।"