भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 656

तृतीयस्तरंग ४२९ स गम्भीरस्य भूर्भर्तुरनुभावं महाद्भुतम् । विविधास्थानसंवृद्धस्तस्याऽप्यूह्य व्यचिन्तयत् ॥१३०॥ १३०. विविध राज्य सभाओं से सम्बान्धित, उस (कवि) ने उस गम्भीर भूपति के महाद्भुत प्रभाव की कल्पना कर सोचा— सोऽयमासादितः पुण्यैः क्षोणिपालो गुणिप्रियः । परभागोपलम्भाय पूर्वेऽमुष्य महीभुजः ॥१३१॥ १३१. 'गुणी प्रिय इस भूपाल को (पूर्व) पुण्यों से प्राप्त किया है, उससे उत्कृष्ट नृप प्राप्ति हेतु पूर्व नृपों में देखना होगा। राजा फसीह व बलीग श्लोक सुनकर बहुत और हकूमत के सरकरद और अरकान को हस्ब महजूज हुआ और इस बरहमन की परेशान हाली पर मदारज के शुमार सोना और जरकार खिलअते गश्त हैरान हुआ इसके सलामें मुल्क कश्मीर उसे अता की। रिशनादारो और मुअल्लकीन को बेहदतहाई इनाम दिया। उसी वक्त उसने कश्मीर के लोगों के निआमत और मुनासिव और लायक दरजे बख्श कर खत के जवाब में मुन्दरजा जैल खत लिखा। सरबुलन्द किया। और कश्मीर की नफीस चीजो 'मातृगुप्त इस मुल्क की हकूमत पर मा बदौलत में से बहुत से उमदः और लतीफ तोहफे मुहय्या की तरफ से सरफराज किया गया है। उसकी करके राजा विक्रमाजीत की खिदमत में भेजे। अताअत और फर्मा बरदारी अपने ऊपर वाजबी रिआया पर बदल व अहसान की तरफ मुतवज्ज होकर और लाजिम जाने।' अपने मुल्क में जानवरों का कतल बन्द कर दिया। दूसरे दिन बरहमन दरबार में पहुँचा तो राजा ने मुल्क की आमदनी से जो कुछ दिन में जमा होता उसके हाथ में लिफाफा देते हुए कहा कि फौरन था रात को फिकरा और मुसाकीन को बख्श कर कश्मीर जाओ और वहाँ के मतकद्दर लोग तुम्हें इस खजाना खाली कर देता था। चार साल और नव लिफाफा को देखकर शाहनशाह बना देंगे। बरहमन माह की मुद्दत हकूमत का जाम पीकर राजा विक्रमा- ने इन्तहाई मामूली की हालत में राजा का रुक्का जीत के इन्तकाल की खबर सुनी। उसी वक्त अपने हाथ में लिया और कश्मीर की तरफ रवाना सल्तनत तर्क करके इबादत कुबूलियत की। काशो हो गया। जिस वक्त होरापुरा पहुँचा तो वहाँ के के मुल्क को गया। सरदारों के हाथ में महाराजा विक्रमाजीत का फरमान दे दिया। खत पढ़ते ही अमीरों में खुशी पाठभेद : के शादयाने बजाये और मातृगुप्त को लिवास शाही श्लोक संख्या १३० में 'महा' का पाठभेद पहना कर तख्त सल्तनत पर जलवः अफरोज़ किया। 'गुणा' मिलता है। तनकीया—इस मुकाम पर महाराजा विक्रमा- श्लोक संख्या १३१ में 'क्षोणि' का 'क्षोणि' जीत के मुख्तसर हालात तारीखी तफसील को मलहूज़ रखते हुए रदीया करिने किये जाते हैं। तथा 'लम्भाय' का पाठभेद 'रंभाय' मिलता है। मातृगुप्त राजा विक्रमादित्य के हुक्म से पादटिप्पणियाँ : संवत् १३० विक्रमी के हकूमत कश्मीर का तख्त १३१ (१) दूसरे पद का अर्थ वास्तव में यह सर पर रख कर सल्तनत के काम में मशगूल हुआ। प्रतीत होता है मातृगुप्त सोचता है—'अमुष्य पूर्व