राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२२ राजतरंगिणी नानाजनपदाकीर्णे स्थाने तत्राथ शुश्रुवान् । काश्मीरिकान्महामात्यान्स्थितान्केनापि हेतुना ॥ २२८ ॥ २२८. वहाँ उसने सुना कि नाना जनपदाकीर्ण स्थान पर किसी कारण से काश्मीरी महामात्य स्थित हैं । ततोऽपनीतप्राग्वेषः प्रावृतो धवलांशुकैः । स जगामान्तिकं तेषां दातुं नृपतिशासनम् ॥ २२६ ॥ २२९. तदनन्तर पूर्ववस्त्र बदल धवल वस्त्र¹ धारण कर वह नृपति शासन देने के लिये उन लोगों के समीप गया । तं प्रयान्तं समुद्यद्भिः शकुनैः सूचितोदयम् । पान्थाः केऽप्यन्वयुर्दृष्टुं निमित्तानां फलोद्गमम् ॥ २३० ॥ २३०. गमन करते इसका कुछ पथिकों ने निमित्तों का फलोद्भव देखने हेतु अनुगमन किया , जिसका प्रकट होते शकुनों से उदय ( उत्थान ) ज्ञात था । मार्ग का अधिकारी के रूप में प्रयोग किया गया है। सम्राट् अकबर के काल में मार्गेश को मलिक कहते थे। कालान्तर में यह अधिकार मौसी अर्थात् आनुवंशिक उत्तराधिकार के रूप में हो गया था। उन्हें जागीर मिलती थी। कश्मीर में सिक्ख राज स्थापित होने पर जागीरें जब्त कर ली गयी थी। इस प्रकार के पूर्व जागीरदारों का पता सुपियान (हूरपुर के नीचे) शाहाबाद आदि स्थानों में मिलता है। क्रमवर्त के प्राचीन ढंग अथवा ढक्क स्थान का पता निश्चयात्मक रूप से मिल गया है। उसका नाम बिगड़कर कमेलन कोठ हो गया है। यह स्थान लगभग साढ़े पाँच मिल हूरपुर से दूर एक अलग पहाड़ी पर जहा पीर पंजाब की स्रोतस्विनियां तथा रूपरी दर्रा मिलता था। यहाँ पहाड़ी बड़ी लगभग दो सौ फिट ऊँची होगी। पहाड़ी पर २००x५० फिट की अधित्यका अर्थात् प्लेटो है। यहा पर दो अष्टपहले बुर्ज बने हैं जो सामरिक प्रकार से सम्बन्धित हैं। इस समय गिर गये हैं। ढक्क को पुलिस चौकी मानने का कुछ लेखकों ने प्रयास किया है। यह ठीक नहीं होगा। "क्रमवर्ताना कोट्टाः" का ही अपभ्रंश 'कमेलन कोठ' हो गया है। पाठभेद : श्लोक संख्या २२८ में 'श्मीरि' का पाठभेद 'श्मोर' मिलता है। श्लोक संख्या २२९ में 'प्रावृतो' का पाठभेद 'प्रवृत्तो' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २२९ (१) धवल वस्त्र : यह प्राचीन आचार एवं परम्परा है कि देवस्थान, यात्रा एवं राजसभा में धवल किंवा नवीन अथवा स्वच्छ वस्त्र धारण कर लोग जाते थे। अन्यधर्मावलम्बियों में भी यही बात देखी जाती है। रविवार के दिन चर्च में ईसाई तथा शुक्रवार के दिन मुसलमान जुमा की नमाज़ में धुला किया स्वच्छ वस्त्र ऋतु के अनुसार धारण कर जाते हैं। पाठभेद : श्लोक संख्या २३० में 'फलोद्गमम्' का पाठभेद 'फलोद्गमे' मिलता है।