राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः तरंग ५२३ श्रुत्वाऽथ विक्रमादित्यदूतः प्राप्त इति द्रुतम् । द्वाःस्थाः काश्मीरमन्त्रिभ्यस्तमासन्नं न्यवेदयन् ॥ २३१ ॥ २३१. 'विक्रमादित्य के दूत का आगमन सुनकर द्वारपालों ने उसकी उपस्थिति शीघ्र ही काश्मीरी मन्त्रियों से निवेदित की। 'आगच्छत प्रविशतेत्युच्यमानोऽथ सर्वतः । स तान्समस्तसामन्तानाससादानिवारितः ॥ २३२ ॥ २३२. 'आइये, प्रवेश कीजिये'—इस प्रकार सब ओर से लोगों ने कहा। बिना अवरोध वह उन समस्त सामन्तों के पास पहुंचा। यथाप्रधानं सचिवैर्विहितोचितसत्क्रियः । ततः पराध्येमध्यस्त तन्निदर्शितमासनम् ॥ २३३ ॥ २३३. प्रधानतानुसार सचिवों के उचित सत्कार प्राप्त कर (वह) उन लोगों से निर्दिष्ट सर्व श्रेष्ठ आसनपर बैठा। कृताहं गैरथामात्यैराज्ञां पृष्टो महीभुजः । शनैस्तच्छासनं तेभ्यो लज्जमान इवार्पिपत् ॥ २३४ ॥ २३४. सम्मानकारी अमात्यों के पूछने पर 'राजा की क्या आज्ञा है'—लज्जित तुल्य वह धीरे से शासन उन्हें अर्पित किया। तेऽभिवन्द्य प्रभोर्लेखमुपांशु मिलितास्ततः । उन्मुच्य वाचयित्वैतमवोचन्वि नयानताः ॥ २३५ ॥ २३५. उन्होंने प्रभु लेख उपांशु का अभिनन्दन किया। एकान्त में मिले। उसे खोला। और वाँचकर विनयावनत बोले— मातृगुप्त इति श्लाघ्यं भवतामेव नाम किम् । एवमेवैतदित्यूचे सोऽपि तान्विहितस्मितः ॥ २३६ ॥ २३६. 'श्लाघ्य मातृगुप्त' आपही हैं क्या ? सस्मित उनसे कहा—'एवमेव' (ऐसा ही)। पादटिप्पणियाँ : पाठभेद : २३२ (१) बाण के हर्ष चरित में इससे मिलता श्लोक संख्या २३४ में 'वार्पिप' का पाठभेद पद मिलता है— 'वार्पप्' मिलता है। श्लोक संख्या २३५ में 'नातः' का पाठभेद 'सविनयं अभाषत आगच्छत प्रविशत'— 'न्विताः' मिलता है।