भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 689

५२४ राजतरंगिणी कः कोऽत्र संनिधातृणामित्यश्रूयत वाक्कतः । राज्याभिषेकसंभारो दृश्यते स्म च संभृतः ॥ २३७ ॥ २३७. यह वाणी सुनायी पड़ी, "सन्निधाताओं में कौन है ?" तदनन्तर राज्याभिषेक संभार वहाँ पर दिखायी दिया । ततः कलकलोत्तालभूरिलोकसमाकुलः । प्रदेशः क्षणमात्रेण सोऽभूत्क्षुभ्यन्निवाणर्वः ॥ २३८ ॥ २३८. क्षणमात्र में उत्ताल कोलाहल करते लोक समाकुल से व्याप्त वह स्थान क्षुब्ध समुद्र तुल्य हो गया । अथ प्राङ्मुखसौवर्णभद्रपीठप्रतिष्ठितः । संनिपत्य प्रकृतिभिर्मातृगुप्तोऽभ्यषिच्यत ॥ २३९ ॥ मातृगुप्त का अभिषेक १ : २३९. पूर्वाभिमुख २ सुवर्णभद्र पीठ पर बैठे मातृगुप्त को समागत प्रकृतियों ३ ने अभि- षिच किया । तस्य विन्ध्यतटव्यूढवक्षसः परिनिर्लुठत् । सशब्दमभिषेकाम्बु रेवास्रोत इवाबभौ ॥ २४० ॥ २४०. उसके विशाल वक्षस्थल पर लुठित होते सशब्दपूर्ण अभिषेक जल विन्ध्याटट ४ के ढालपर गिरती रेवा ( नर्मदा ) स्रोत तुल्य सुशोभित हुआ । श्लोक सख्या २३७ में 'स्म' का पाठभेद 'स' ( २ ) पूर्वाभिमुख : पूर्व मुख बैठकर मिलता है। प्रातः कालीन सन्ध्या तथा पूजा आदि किया जाता पादटिप्पणियाँ : है । यह शुभ माना गया है । सूर्योदय की दिशा २३९ (१) श्री विल्सन ने राज्याभिषेककाल पूर्व है अतएव पवित्र कार्यों एवं सब प्रकार के सन् ११७ ई० ५ मास तथा समीकृत काल सन् सस्कारों के लिये उत्तम माना गया है। पूर्व के ४०१ ई० एव राज्यकाल ४ वर्ष ९ मास दिया है। अभाव में उत्तर दिशा का स्थान माना गया है। श्री एस. पी. पण्डित ने वह समय सन् ११८ ई० पूर्व दिशा शक्ति प्रद, शुभ उत्थान तथा उदय का तथा राज्य काल ४ वर्ष ९ मास १ दिन दिया है। द्योतक है । सूर्य का उदय पूर्व में होता है अतएव श्री स्टीन ने अभिषेक काल लौकिक संवत् वह दिशा जागृत अवस्था की, उदय की उत्थान की, ३१८४ और २ मास तथा राज्य काल ४ वर्ष ९मास प्रतीक है । १ दिन दिया है। (३) प्रकृतियों : यहाँ पर इसका गज प्रकृतियो श्री वाओ सप्तर्षि संवत् ४०४४ तथा तथा साधारण प्रकृति जनो दोनों हो सकता है । सन् २६९ ई० देते हैं। कलिगताब्द ३२१८ वर्ष ३ मास ड्रायर के मत से सन् ११७ वर्ष ११ मास पाठभेद : तथा कनिघम के अनुसार सन् ४३० ई० आता है । श्लोक सख्या २४० मे 'स्रोत' का पाठभेद प्रबुरुत्रल नाम मेठर वृत्त देता है। 'स्रोता' मिलता है।