राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 692, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ५२७ असामान्यान्गुणांस्तस्य स्मरन्पर्यश्रुलोचनः । स्वयं लिखित्वा श्लोकं च स्वकमेकं व्यसर्जयत् ॥ २५१ ॥ २५१. असामान्य उसके गुणों का स्मरण करते हुये उसके नेत्र अश्रुपूर्ण हो गये। स्वयं लिखकर उसने अपना एक श्लोक भेजा। नाकारमुद्वहसि नैव विकत्थसे त्वं दित्सां न सूचयसि मुञ्चसि सत्फलानि । निःशब्दवर्षणमिवाम्बुधरस्य राज- न्संलक्ष्यते फलत एव तव प्रसादः ॥ २५२ ॥ २५२. "हे राजन् ! आप अपना आकार नहीं बदलते, आत्म श्लाघा नहीं करते, दान करने की इच्छा बिना प्रकट किये फल प्रदान करते हैं। जलद के निःशब्द वर्षण तुल्य फलित ही आपकी कृपा दिखायी पड़ती है।" ततः प्रविश्य नगरं सैन्यैः पिहितदिक्तटैः । क्रमागतामिव महीं यथावत्पर्यपालयत् ॥ २५३ ॥ २५३. तदनन्तर दिक्तट को आच्छादित करनेवाले सैनिकों के साथ नगर प्रवेश कर परम्परा प्राप्त तुल्य पृथिवी का यथावत् परिपालन किया। त्यागे वा पौरुषे वापि तस्यौचित्योन्नतात्मनः । क्ष्माभुजस्तर्कुक¹स्येव नाभूत्परमितेच्छता ॥ २५४ ॥ २५४. त्याग या पौरुष में भी औचित्य से उन्नतात्मा वह; याचक (तर्कुक १) के तुल्य परिमित (इच्छा) आकाङ्क्षी नहीं हुआ। यष्टुं यज्ञान्धृतोद्योगस्त्यागी विततदक्षिणान् । पशुबन्धमनुध्याय करुणाकूर्णितोऽभवत् ॥ २५५ ॥ २५५. (उस) त्यागी ने प्रचुर दक्षिणा वाले यज्ञ करने के लिये उद्योग किया किन्तु पशुवध का ध्यान कर करुणापूर्ण हो गया। पादटिप्पणियाँ : २५२ ( १ ) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ६८ वा श्लोक है। पाठभेद : श्लोक संख्या २५४ में 'चित्योन्नतात्मन :' का 'नत्योचित्वात्मनः' तथा 'तर्कुकस्येव' का पाठभेद 'याचकस्येव' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २५४ ( १ ) तर्कुक : कुछ अनुवादकों में तर्कुक का अर्थ तकुवा लगाया है। परन्तु यह अर्थ यहाँ नही बैठता है। इसका पाठभेद 'याचकस्येव' भी मिलता है। वह यहा पर संगत है। पाठभेद : श्लोक संख्या २५५ में 'कूर्णितो' का पाठभेद 'कुञ्चितो' तथा 'कूजितो' मिलता है।