राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२६ राजतरंगिणी इत्थं स्थिते परं कंचिच्चदीयोऽस्मीति शंसता । न नेया भवता राजन्वयमात्मा च लाघवम् ॥ २४५ ॥ २४५. 'ऐसी स्थिति में हे राजन् ! किसी अन्य से 'तुम्हारा हूँ' यह कहकर आप स्वयं तथा हम लोगों का गौरव लाघव न करें।' इति तैस्तथ्यमुक्तोऽपि संस्मरन्स्वामिसत्क्रियाम् । मातृगुप्तो महीपालः क्षणमासीत्कृतस्मितः ॥ २४६ ॥ २४६. इस प्रकार उनके यथार्थ कहने पर भी महीपाल मातृगुप्त स्वामी के समादर को स्मरण करते हुए क्षण भर सस्मित रहा । दानेन सुदिनं कुर्वन्नवराज्योर्जितेन सः । तत्रैव मङ्गलोदग्रं तदहो निरवर्तयत् ॥ २४७ ॥ २४७. उसने नव राज्योचित प्रचुर दान द्वारा मंगलमय उस दिन को सुदिन करते हुए ( उसे ) वहीं व्यतीत किया । पुरप्रवेशायान्थेद्युरभ्यर्थ्यमानोऽथ मन्त्रिभिः । अद्भुतप्राभृतं दूतं राज्यदातुर्व्यसर्जयत् ॥ २४८ ॥ २४८. दूसरे दिन मन्त्रियों ने पुर प्रवेश हेतु प्रार्थना की। अद्भुत भेंट के साथ दूत को राज्यदाता (विक्रमादित्य) के पास भेजा । देशौन्नत्यानुसारेण स्पर्धामिव च तां विदन् । स्वामिनो मनसि हीतः सागसं स्वममन्यत ॥ २४९ ॥ २४९. देश की समृद्धि के अनुसार उसे स्वामी की स्पर्धा तुल्य जानते हुये, मन में लज्जित हुआ और अपने को अपराधी समझा । अथाहूयपरान्भृत्यान्वक्तुं सेवास्मृतिं प्रभोः । अल्पार्घाण्यपि सात्म्यानि प्राहिणोत्प्राभृतानि सः ॥ २५० ॥ २५०. उसने प्रभु की सेवा स्मृति को कहने के लिये दूसरे भृत्यों को बुलाकर स्वल्प मूल्यों के भी (नृप के) तदनुरूप भेंट भेजा । श्लोक संख्या २४५ में 'परं' का 'अपरं'; 'कंचि' श्लोक संख्या २५० में 'अल्पार्घाण्य' का 'अल्पा- का 'क्वचि' 'किंचि' तथा 'राजन्' का पाठभेद 'राजा' र्ध्याण्य, 'अनर्घ्याण्य' तथा 'सात्म्यानि' का पाठभेद मिलता है । 'साद्यानि' तथा 'स्वात्म्यानि' मिलता है।