राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५३० राजतरंगिणी स मातृगुप्तस्वाम्याख्यं निर्ममे मधुसूदनम् । कालेनादत्त यद्ग्रामान्मम्मः स्वगुरसद्मने ॥ २६३ ॥ २६३. उसने मातृगुप्त स्वामी' नामक मधुसूदन ( मन्दिर ) का निर्माण कराया, उनपर लगे ग्रामों को मम्म² ने कालान्तर में अपने देव मन्दिर हेतु ले लिया । इत्यासादितराज्यस्य शासतः क्ष्मां क्षमापतेः । त्रिमासोना ययुस्तस्य मैकाहाः पञ्च वत्सराः ॥ २६४ ॥ २६४. इस प्रकार राज्य प्राप्त कर पृथ्वी का शासन करते उस नृपति का तीन मास एक दिवस कम पाँच वर्ष व्यतीत हुआ । कृतार्थतां तीर्थतोयैराञ्जनेयो नयन्पितॄन् । जातं तादृशमश्रोपीत्स्वस्मिन्देशे पराक्रमम् ॥ २६५ ॥ २६५. आञ्जनेय ( प्रवरसेन ) ने जो कि, तीर्थों में जल से पित्रों¹ को कृत-कृत्य कर रहा था, इस प्रकार सुना—'स्वदेश पर आक्रमण² हुआ है।'
उचित है । लावण्य सौन्दर्य के अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है । शब्दकल्पद्रुम में लावण्य की परिभाषा की गयी है : मुक्ताफलेषु छायायास्तरळत्वमिवान्तरा । प्रतिभाति यदङ्गेषु तल्लावण्यमिहोच्यते ॥ काव्य का यह रस नीचे चू न जाय इसलिए स्वर्णपात्र रख दिया । पाठभेद : श्लोकसंख्या २६३ में 'मम्म' का, 'तन्मः' 'मस्मः', तथा 'श्वसुर' का पाठभेद 'श्वशुर,' तथा 'स्वदेव- गुहाय' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २६३ (१) मातृगुप्त स्वामी—इस मन्दिर का उल्लेख पुनः कहीं नहीं मिलता । यह मन्दिर कहाँ था इसका पता भी नहीं चलता । (२) मम्म—मम्म ने मन्दिर कहाँ बनवाया था उल्लेख नहीं मिलता । मम्म का यह मन्दिर विष्णु मन्दिर था । यह श्लोक नं० ४:६९८ से प्रगट होता है । यह स्पष्ट निर्देश है कि मम्म ने मम्म स्वामी का मन्दिर निर्माण कराया था । स्वामी एवं ईश्वर शब्दों के साथ विष्णु तथा शिव मन्दिर समझना चाहिये । इसके लिये पृष्ठ १४७ की पाद टिप्पणी द्रष्टव्य है । पाठभेद : श्लोकसंख्या २६५ में 'नयन्' का 'अनयत्' तथा 'पराक्रमम्' का पाठभेद 'पराभवम्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २६५ (१) पित्रः यहाँ पित्र तर्पण के अर्थ जो लगाना चाहिये सन्ध्या करते समय तथा श्राद्ध के समय किया जाता है । (२) आक्रमण : कल्हण ने यहाँ पर पराक्रम शब्द का मूलतः प्रयोग किया है । अनुवादको ने उसका अर्थ हरण अर्थात् राज्य का बलात् ले लेना किया है । मैने यहाँ आक्रमण शब्द रखा है । धन, सम्पत्ति, राज्य सभी पर आक्रमण करने के भाव का समावेश हो जाता है ।