भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 696

तृतीय तरंग ५२१ अथ ग्रथयितुं तस्मिन्पुस्तकं प्रस्तुते न्यधात् । लावण्यनिर्याणभिया तदधः स्वर्णभाजनम् ॥ २६१ ॥ २६१. जब वह पुस्तक समेट रहा था—तो उसके नीचे स्वर्णपात्र, लावण्य¹ परिगलन भय से राजा ने रख दिया । अन्तरज्ञतया तस्य तादृश्या कृतसत्कृतिः । भर्तृमेण्ठः कविर्मेने पुनरुक्तं श्रियोऽर्पणम् ॥ २६२ ॥ २६२. नृप की उस प्रकार की अन्तरज्ञता से सत्कृत होकर कवि भर्तृमेण्ठ ने लक्ष्मी का प्रदान पुनरुक्त ( निःप्रयोजन ) माना ।

किया है। उसने अपने पूर्वजन्मों में वाल्मीकि भर्तृमेण्ठ तथा भवभूति होना लिखा है । बभूव वल्मीकभवः पुरा कवि- स्ततः प्रपेदे भुवि भर्तृमेण्ठताम् । स्थितः पुनर्यो भवभूतिरेखया स राजते सम्प्रति राजशेखरः । ( बालरामायण ) विनिर्गतं मानदमात्ममन्दिरा त्स सम्भ्रमेन्द्रद्रुतपातितार्गला । क्षेमेन्द्र ने सुवृत्ततिलक तथा मंख ने श्रीकंठ- चरित ( २:५३ ) में मेण्ठ का उल्लेख किया है। मंख ने उसे सुबन्धु, भारवि तथा बाण के समकक्ष रखा है। सुभाषितावली में मेण्ठ की कविताओं का उद्धरण दिया गया है। हेमचन्द्र ने अलंकार- चूडामणि में हयग्रीव वध को काव्य माना है । काव्यप्रकाश तथा साहित्यदर्पण में मेण्ठ तथा उसके काव्य का उल्लेख मिलता है । डाक्टर श्री भाऊदाजी ने राघव भट्ट के शकुन्तला भाष्य में मेण्ठ के पद्यों को पाया है। कश्मीरी कवियों में मेण्ड अन्यतम कवि हैं । यह प्रबन्ध कवि हैं । राज्यसभा के कवि थे । हयग्रीव वध के श्लोक सूक्ति ग्रन्थों में उद्धृत हैं। राजशेखर ने इन्हें वाल्मीकि का अवतार माना है। अश्वशिरस् तथा हयग्रीव दोनों शब्दों का उल्लेख पुराणों में मिलता है । महाभारत में उल्लेख ६७

आता है कि और्व का क्रोध समुद्र में निक्षेप हुआ तो उसमें हयशिरस् की उत्पत्ति हुई । पुनः उल्लेख मिलता है कि हयग्रीव नरक का सेनापति था। भागवत पुराण के अनुसार विष्णु ने हयग्रीव का वध किया था । ( ११:४:१७ ) विष्णु तथा मारकण्डेय पुराण में उल्लेख है कि भगवान् विष्णु भद्राश्व में हयशिरस् रूप से उत्पन्न हुए थे । ( विष्णु० १:२:५० ; मारक० ५५ ) कालिका पुराण के अनुसार हयग्रीव ने ज्वरासुर को मारा था । ( कालिका० ८१:९६ ) देवी भागवत में विष्णु हयग्रीव ने असुर हयग्रीव का वध किया था ( देवीभागवत १:४ ) । असमी साहित्य में उल्लेख मिलता है कि ऋषि उर्व के कहने पर विष्णु ने हयासुर, जो मणिकूट पर निवास करता था, वध किया था । अन्तिम समय असुर ने प्रार्थना की कि भगवान् स्वयं हयसुर का रूप धारण कर मणिकूट पर निवास करें। नील मत में हयग्रीव अवतार का उल्लेख है । पाठभेद : श्लोक संख्या २६१ में ‘ग्रथयितुं’ का पाठभेद ‘ग्रन्थयितुं’ मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २६१ (१) लावण्य—लावण्य का लौकिक अर्थ पानी है। स्त्री पर पानी है। मोती पर पानी है। इसका अर्थ स्त्री पर लावण्य है किया जाता