भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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५२८ राजतरंगिणी अमारमादिदेशाथ यावद्राज्यं स्वमण्डले । चूर्णीकृत्य सुवर्णादि प्रददौ च करम्भकम् ॥ २५६ ॥ २५६. अपने सम्पूर्ण ( मण्डल ) राज्य में अहिंसा का आदेश दिया और स्वर्ण चूर्ण आदि करम्भक¹ प्रदान किया । करम्भके कीर्यमाणे मातृगुप्तेन भूभुजा । वैतृष्ण्यमुन्मिषत्पोषो न को नाम न्यपेथत ॥ २५७ ॥ २५७. भूभुज मातृगुप्त के करम्भक प्रदान करने पर सन्तुष्ट हुआ कौन असन्तोष ( वितृष्णा ) को प्राप्त किया । गुणी च दृष्टकष्टश्च वदान्यश्च स पार्थिवः । विक्रमादित्योऽप्यासीदभिगम्यः शुगार्थिनाम् ॥ २५८ ॥ २५८. गुणी, कष्टदर्शी, वदान्य यह नृपति शुभाथियों के लिये विक्रमादित्य से भी अधिक अभिगम्य था । विवेचकतया तस्य श्लाघ्यया सुरभीकृताः । लक्ष्मीविलासाः क्ष्माभर्तुरशोभन्त मनीषिषु ॥ २५६ ॥ २५९. उस राजा की श्लाघ्य विवेकशीलता से सुरभित लक्ष्मी विलास मनीषियों से सुशोभित हुई । हयग्रीववधं मेण्ठस्तदग्रे दर्शयन्नवम् । आसमाप्ति ततो नापत्साध्वसाध्विति वा वचः ॥ २६० ॥ २६०. ( जब ) मेण्ठ उसके समक्ष नवीन हयग्रीववध¹ सुना ( प्रदर्शित कर ) रहा था समाप्ति पर्यन्त उससे "साधु या असाधु" वाणी नहीं सुनी ।


[बायाँ स्तम्भ : पादटिप्पणियाँ] पादटिप्पणियाँ : २५६ ( १ ) करम्भक : इसका अर्थ खिचड़ी होता है। कश्मीर में खिचड़ी ब्राह्मणों को देने का प्राचीन रिवाज था। काशी आदि स्थानों में खिचड़ी दरिद्र नारायण का भोजन माना जाता है। इसी प्रकार पुलाक जिसका अपभ्रंश वर्तमान पुलाव है प्राचीन भारत में प्रिय भोजन था। पुलाव सामिष तथा निरामिष दोनों बनता था। निरामिष में मेवा तथा सब्जी डालकर बनाया जाता था। सामिष पुलाव में भोजनीय मांस डाला जाता था। करम्भक का उल्लेख पुनः रा० त० ५.१६ में भी कल्हण ने किया है।

[दायाँ स्तम्भ : पाठभेद एवं पादटिप्पणियाँ] पाठभेद : श्लोक संख्या २५७ में 'वैतृष्ण्य' का पाठभेद 'वैतृष्य' मिलता है। श्लोक संख्या २५८ में 'वदान्य' का पाठभेद 'वदन्य' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २६० ( १ ) हयग्रीव वध : हयग्रीव का उल्लेख कुछ स्थानो पर महाकाव्य तथा अनेक स्थानों पर नाटक रूप में किया गया है। वह अत्यन्त सुन्दर काव्य है। अबतक यह काव्य पूर्ण रूप में नहीं प्राप्त हुआ है। इसको उल्लेख कवि राजशेखर न