भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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तृतीय तरंग ५३३ उपेक्ष्य मोक्षं किं क्ष्माभृद्भोगानिच्छसि भङ्गुरान् । इति जिज्ञासुना भावं शंभुना सोऽभ्यधीयत ॥ २७४ ॥ २७४. 'राजन् ! मोक्ष को उपेक्षित कर क्षण भंगुर भोगों की क्यों इच्छा करते हो ? इस प्रकार भाव जानने के जिज्ञासु शम्भु' ने उससे कहा— स तं बभाषे शंभुं त्वां बुद्ध्वा व्याजतपोधनम् । अभ्यधामिदमद्धा त्वं न स देवो जगद्गुरुः ॥ २७५ ॥ २७५. उसने उनसे कहा—'तुम्हें तपस्वी वेशधारी शम्भु जानकर, यह याचना की थी किन्तु निश्चय ही, वह जगद्गुरु देव तुम नहीं हो। महान्तो ह्यर्थिताः स्वल्पं फलन्त्यल्पेतरत्स्वयम् । उदन्यया वदान्योऽदाद्दुग्धाब्धि स पयोऽर्थिने ॥ २७६ ॥ २७६. स्वल्प पार्थित, महान् जन स्वयं अधिक फल प्रदान करते हैं। उस वदान्य ने पयःप्रार्थी को क्षीरसागर दिया। पादटिप्पणियाँ : २७४ (१) शम्भु : कल्याण सम्पादित करने वाले देव का अर्थ शम्भु होता है। उपक्रमा रुद्र है। शिव कल्याण स्वरूप है। शम्भु रुद्र एवं शिव यद्यपि एक ही शंकर के नाम है, रूप है परन्तु उनका अर्थ भिन्न है। नीलमत पुराण में शम्भु को कालयज्ञोपवीती कहा है। (नी० १०९४, ९००, ९१३, ८८८) पाठभेद : श्लोक संख्या २७६ में 'वदान्ये.' का पाठभेद 'वदन्यो' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २७६ (१) पयःप्रार्थी : कल्हण ने यहाँ महा- भारत वर्णित उपमन्यु की कथा की ओर संकेत किया है। उपमन्यु की कथा वायुपुराण अध्याय ५६ में दी गयी है—वीतमन्यु नामक एक वेद वेदांग पारग गृहस्थ एवं महाभाग्य शाली श्रेष्ठ ब्राह्मण था। उसकी धर्मशीला नामक पत्नी थी। उस पत्नी से उसे उपमन्यु नामक पुत्र प्राप्त हुआ। दूध के अभाव में माता चावल पीस कर उसे पिलाया करती थी। उसका रंग दूध की तरह उज्ज्वल होता था। एक दिन अपने पिता के साथ किसी द्विज के यहाँ उसने सुस्वादु खीर खाया। माता ने दूसरे दिन दूध के व्याज से उसे पिसा चावल का पानी दिया तो उपमन्यु ने पीने से अस्वीकार कर दिया। बालक असली दूध के लिये रोने लगा। माता ने भी रोते हुए कहा बिना शिव की कृपा से दूध कैसे मिल सकता है ? शिव की कृपा कैसे प्राप्त होगी इसका उत्तर माता ने दिया—'विरूपाक्ष त्रिशूलधारी महादेव की आराधना करो।' उपमन्यु के पूछने पर कि विरूपाक्ष कैसे हैं माता ने उत्तर दिया—प्राचीन काल में धौदाम नाम प्रसिद्ध एक महान् असुरपति था। उसने लक्ष्मी को समस्त जगत् अतिक्रान्त कर वशवर्तिनी बना लिया था। उस असुर ने तत्पश्चात् वासुदेव से श्रीवत्स प्राप्त करने का प्रयास किया। भगवान् विष्णु असुर वध की कामना से शिव के पास गये। शिव उस समय हिमालय शिखर के चिकने भूतल पर बैठे थे। तदनन्तर विष्णु जी जगन्नाथ के समीप गये। और अपने द्वारा स्वयं अपनी आराधना की। वे एक सहस्र वर्ष पैर के अँगूठे पर खड़े रह कर तपस्या करने लगे। महादेव ने प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु को सुदर्शन चक्र