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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 701

५३४ राजतरंगिणी अस्य वैक्लव्यकैवल्यलाभनिश्चलचेतसः । नो चेत्स्यभिजनस्याभिभृतिं मर्मव्यथायहाम् ॥ २७७ ॥ २७७. 'कैवल्य प्राप्ति से भी अशान्त चित्त वाले इसके कुल के मर्म व्यथाकारी तिर- स्कार को क्या आप नहीं जानते ?' जगत्परिवृढः प्रौढप्रीतिस्तं सफलार्थनम् । कृत्व। प्रादुष्कृतवपुस्ततो भूयोऽभ्यभाषत ॥ २७८ ॥ २७८. उसे सफल मनोरथ करके अत्यन्त प्रसन्न जगन्नाथ शरीर धारणकर पुनः बोले- मज्जतो राज्यसौख्येषु सायुज्यावाप्तिदूतिकाप् । मदाज्ञयाऽश्वपादस्ते संज्ञां काले करिष्यति ॥ २७९ ॥ २७९. 'अश्वपाद मेरी आज्ञा से समय पर राज सुखों में निमग्न तुम्हें सायुज्य' प्राप्ति का सन्देश वाहिका-संज्ञा प्रदान करेगा । इत्युक्तवाऽन्तर्हिते देवे स कृतव्रतपारणः । अगच्छदश्वपाद तमापृच्छ्याऽभिमतां भुवम् ॥ २८० ॥ २८०. यह कह कर देव के अन्तर्हित हो जाने पर उसने व्रत का पारण किया और अश्वपाद से आज्ञा लेकर अभिमत भूमि की ओर गया । प्रदान किया। सुदर्शन चक्र द्वादश अरो, छह नाभियों, एवं दो युगों से युक्त था। चक्र को अमोघ शक्ति जानने की जिज्ञासा पर शंकर ने विष्णु से अपने ही ऊपर चलाने के लिये कहा । शंकर पर विष्णु ने चक्र चलाया। शंकर के शरीर के तीन भाग हो गये। प्रथम भाग का नाम हिरण्याक्ष, दूसरे का सुवर्णाक्ष तथा तृतीय का विरूपाक्ष नाम पड़ा। विष्णु ने उस चक्र द्वारा दामा का वध किया । उस असुर के वध के पश्चात् विष्णु ने विरूपाक्ष शंकर की उपासना की। तत्पश्चात् क्षीर सागर चले गये। यदि तुम दूध चाहते हो तो विरूपाक्ष शंकर की उपासना करो। उपमन्यु ने शिव विरूपाक्ष की उपासना कर दुग्ध प्राप्त किया । पाठभेद : श्लोक संख्या २७७ में 'वैक्लव्य' का 'वैक्लप' तथा “कैवल्य” का पाठभेद "कैवल्या" मिलता । श्लोक संख्या २७८ में 'म्यभाषत' का पाठभेद 'व्यभाषत' मिलता है। श्लोक सख्या २७९ मे 'मज्जतो' का 'सजमो' तथा 'सायुज्या' का पाठभेद 'सायुग्या' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २७९ (१) सायुज्य : पाँच प्रकार की मुक्ति होती है। सायुज्य में आत्मा परमात्मा मे लीन होकर एकाकार हो जाता है। पाठभेद : श्लोक सख्या २८० 'अगच्छ' का पाठभेद 'आगच्छ' मिलता है।

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