भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 702

तृतीय तरंग ५३५ ततो विदितवृत्तान्तो मातृगुप्ताभिषेणनात् । निषिध्य सविधायातानामात्यानब्रवीद्वचः ॥ २८१ ॥ २८१. तदुपरान्त (सब) वृत्तान्त जानकर पूजाहेतु उद्यत हो, आये हुये, अमात्यों को निवारित कर बोला- विक्रमादित्यमुत्सिक्तमुच्छेत्तुं यतते मनः । मातृगुप्तं प्रति न नो रोषेणारूषितं मनः ॥ २८२ ॥ २८२. 'मेरा मन गर्वीले विक्रमादित्य को उच्छेद के लिये प्रयत्नशील है, मातृगुप्त के प्रति क्रोध से मेरा मन रूक्ष नहीं है। अप्रियैरपि निष्पिष्टैः किं स्यात्क्लेशासहिष्णुभिः । ये तदुन्मूलने शक्ता जिगीषा तेषु शोभते ॥ २८३ ॥ २८३. क्लेश न सह सकने वाले एवं निष्पिष्ट शत्रुओं में क्या रखा है ? जो अपने उन्मूलन में समर्थ हैं, उन्हीं में विजयेच्छा शोभित होती है । यान्यब्जान्यदयं द्विषन्ति शशिनः कोऽन्यस्ततोऽसंमत- स्तन्निर्माथिकरीन्द्रदन्तदलनं यन्नाम कोऽयं नयः । सामर्थ्यप्रथनाय चित्रमसमैः स्पर्धां विधूयोन्नता ये तेषु प्रभवन्ति तत्रजहति व्यक्तं प्ररूढा रुषः ॥ २८४ ॥ २८४. 'जो कमल' चन्द्रोदय द्वेषी हैं, उनसे बढ़कर असम्यत (शत्रु) दूसरा कौन है ? उनका निर्मन्थन कर्त्ता करीन्द्र (हाथी) के दन्त का दलन जो चन्द्र करता है, यह कौन आश्चर्य है। उन्नत जन सामर्थ्य प्रख्यात करने के लिये, असम जनों के साथ स्पर्धा त्यागकर, जो उनमें समर्थ हैं, वहाँ उग्र क्रोध का प्रदर्शन करते हैं। श्लोक संख्या २८३ में 'क्लेशास' का पाठभेद होने और सूर्योदय के साथ ही उसकी पंखुड़ी बन्द हो 'क्लेशस' मिलता है। जाती है। इस प्रकार शशी कमल का प्रवृत्तितः श्लोक संख्या २८४ में 'विधूय' का पाठभेद शत्रु है । कल्हण यहाँ शशि की उज्ज्वलता को गज- 'विधाय' मिलता है । दन्त अर्थात् हाथी दांत से तुलना करता दांत की पादटिप्पणियाँ : उज्ज्वलता को श्रेष्ठ बताता है। इस प्रकार शशी २८४ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह को गज विरोधी चित्रित किया गया है। हाथी दाँत ७०वा श्लोक है । शशि रश्मि से चिनक जाता है। गज कमल का (२) कमलः कमल सूर्योदय के साथ शत्रु माना गया है। वह सरोवर में प्रवेश करता मुकुलित होता है और सूर्यास्त के साथ उसके पटल है और कमल दल को नष्ट कर देता है । तरंग बन्द हो जाते हैं। कुमुदिनी रात्रि में चन्द्रोदय के ७:१०९९ तथा ८:२८५६, २८६५ तथा २१४२ साथ मुकुलित होती है। चन्द्र किरणों के तिरोहित द्रष्टव्य हैं।