भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 703

५३६ राजतरंगिणी त्रिगर्तानां भुवं जित्वा स व्रजन्नथ भूपतिः । विक्रमादित्यमशृणोत्कालधर्ममुपागतम् ॥ २८५ ॥ २८५. त्रिगर्त भूमि विजित कर जाते हुए उसने विक्रमादित्य को दिवंगत हुआ सुना। तस्मिन्नहनि भूभर्त्रा शोकान्निश्वसताऽनिशम् । नास्नायि नाशि नास्वापि स्थितेनावनताननम् ॥ २८६ ॥ २८६. उस दिन अवनतानन (अधोवदन) स्थित राजा ने शोक से निःश्वास लेते हुये; स्नान, भोजन एवं शयन भी नहीं किया। स्थिर रहा। अन्येद्युर्धमुत्सृज्य काश्मीरेभ्यो विनिर्गतम् । शुश्राव मातृगुप्तं स नातिदूरे कृतस्थितिम् ॥ २८७ ॥ २८७. दूसरे दिन उसने सुना—मातृगुप्त भूमि त्याग, कश्मीर से बहिर्गत हो कर, बहुत दूर पर स्थित नहीं (समीप) ही है। कैश्चिन्निर्वासितो मा स्विन्मदीयैरिति शङ्कितः । ययौ प्रवरसेनोऽस्य पार्श्वं मितपरिच्छदः ॥ २८८ ॥ २८८. मेरे किसी पक्षपाती द्वारा निर्वासित कर दिया गया हो, इस शंका से प्रवर- सेन परिमित जनों के साथ उसके पास गया। मैं अपने अनुभव से बता सकता हूँ कि कमल, हाथी दाँत, शशि की उपमा कल्हण ने सत्यता के आधार पर दी है। मेरे पास हाथी था। उसका दाँत बड़ा था। हम प्रायः बालपन में हाथी के पास जाते थे। उसे ईख खाने को दिया जाता था। ईख में ही रोटी मिला दी जाती थी। उन दिनों मेरी हाथी दस सेर आटा की रोटी प्रतिदिन खाता था। रामलीला के पश्चात् अगहन मास में वह जमीन्दारो पर भेज दिया जाता था। मैं भी एक बार गया था। संयोग से मेरे एक बड़े सरोवर में खूब कमल खिला था। हाथी उस ओर जाने के लिये उत्सुक हो गया। मैं उसपर बैठा था। महावत के मना करने पर हमारी जिदपर वह सरोवर में लाया गया। सरोवर में पैठते ही वह कमलों को उखाड़कर फेंकने लगा। बाहर निकला तो सूँड में कमल को उछालता लाया। रात्रि में मैंने एक बार देखा कि महावत चाँदनी रात में दाँत पर कपड़ा लपेट देता था। पूछने पर कोई जवाब नही दे सका। केवल यही कहा कि बाप दादों के समय से यह होता आया है। वह भी करता है। कल्हण का वह श्लोक पढ़ने पर मुझे स्मरण आया कि दाँत चिनक न जाय इसलिये उसपर चाँदनी में कपड़ा लपेट दिया जाता था। परन्तु मैंने देखा है कि हाथी दाँत चिनक जाते हैं। उनको लम्बी चिनक पंक्ति बन जाती है। इससे हाथी दाँत का मूल्य कम हो जाता है। पाठभेद : श्लोक संख्या २८६ में 'निश्र्वस' का 'निश्वस' तथा 'नास्नायि' का पाठभेद 'नाम्नापि' और 'माम्नापि' मिलता है।