राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ५३७ कृतार्हणं सुखासीनं ततः पप्रच्छ तं शनैः । विनयावनतो राजा राज्यत्यागस्य कारणम् ॥२८६॥ मातृगुप्त का राज त्याग २८९. इसके पश्चात् विनयावनत राजा ने नमस्कार कर, सुखपूर्वक बैठे, उससे धीरे से राज त्याग का कारण पूछा । बभाषे तं क्षणं स्थित्वा स निश्वस्य विहस्य च । गतः स सुकृतो राजन् येन भूमिभुजो वयम् ॥२९०॥ २९०. वह कुछ क्षण स्थिर हो, निःश्वास लेकर, विहँसकर, बोला—'हे राजन् ! जिसके द्वारा मैं राजा था वह सुकृती गत हो गया । यावन्मूर्ध्नि रवेः पादास्तावद् द्योतयते दिशः । द्योतयेन्नान्यथा किं न ग्रावैव तपनोपलः ॥२६१॥ २९१. 'जब तक मूर्धा पर सूर्य की किरणें रहती हैं, तब तक सूर्यकान्त मणि दिशाओं का ज्योतिर्मय करती है, अन्यथा नहीं, तो क्या वह पत्थर मात्र नहीं है । अथ राजाऽभ्यधात्केन राजन्नपकृतं तव । यत्प्रत्यपचिकीर्षार्थं तमीशमनुशोचसि ॥२९२॥ २९२. राजा ने कहा—'हे राजन् ! आपका किसने अपकार किया है ? जिसके प्रतिकार करने की इच्छा से उस स्वामी के लिये आप शोक करते हैं ? मातृगुप्तस्ततोऽवादीत्कोपस्मितसिताधरः । अस्मानुत्सहते कश्चिन्नापकर्तुं बलाधिकः ॥२६३॥ २९३. तदनन्तर क्रोध पूर्ण स्मिति से सिताधर मातृगुप्त बोला—'कोई बलाधिक हमारा अपकार करने में समर्थ नहीं है । नयता गण्यतामस्मानन्तरङ्गेन तेन हि । न भस्मनि हुतं सर्पिनोंप्तं वा सस्यमूपरे ॥२६४॥ २९४. 'अन्तरङ्ग उस राजा२ ( विक्रमादित्य ) ने मुझे अधिपति बनाकर निश्चय ही भस्म में घृत का हवन तथा ऊसर में बीज वपन नहीं किया है । पादटिप्पणियाँ : 'यत्प्रत्यय' और 'तत्प्रत्यय' मिलता ह । २९१ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह पादटिप्पणियाँ : ७१वां श्लोक हैं। २९४ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह पाठभेद : ७२वां श्लोक हैं । श्लोकसंख्या २९२ में 'यत्प्रत्यप' का पाठभेद ( २ ) राजा : श्लोक का भावार्थ यह ६८